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Monday, April 15, 2024

रिश्तों का सपना (Rishton ka sapna)

Sapna - समाजिक बंधन कविता 
               
Rishton ka sapna
Rishton ka sapna
Image from: pexels.com 


रिश्ते नाते जो भी हों..
अपने अपने से लगे..
संकंट में साथ छोड़ दें अपना..
ऐसे रिश्तों का फिर..
सुख में क्यों देखना सपना..

जब रोज रोज के कष्टों से..
टूट चुका हो तन मन..
तब  मिले सुखों का अम्बर..
तो जीवन लगता आडंबर..

जब वर्षा के इंतज़ार में..
किसान हो हताश और..
और फसल सूख बन बिखरे..
तिनका तिनका ..
तब हो रिमझिम वर्षा..
तो फ़ायदा है किनका..

छोटी छोटी खुशियो के लिये..
जब तरसा हो मन हर क्षण..
फिर किसी भी खुशी का आना.. 
है चित को बहलाने का बहाना ..

दिन रात हो रहे अपमानित..
जीने का ना रहा हो चित..
फिर मिले मान सम्मान का..
क्या रह जाता है औचित्य..

धन्य धान्य से हो संपन्न..
पर रोगों से काया हो छिन्न भिन्न..
ऐसी धन्य संपन्नता से..
मन हो जाता खिन्न ..

ईश्वर ऐसा वर दीजिये..
सब कुछ मिले अनुपात में..
सही समय पर हाथ में..
सभी रिश्ते नाते हो अपने..
हमें उनके और उन्हे हमारे..
निःस्वार्थ आते हो सपने..

सारे जगत को खुशियो से..
भर दीजिये..
सबका हिस्सा बराबर..
सबको दीजिये..
कहीं ना हो तडफ तिरस्कार..
सब हंसी खुशी रहे परिवार..
ऐसा हो प्रभु आपका संसार..!!

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कविता की विवेचना:

रिश्तों का सपना/Rishton ka sapna कविता आज के दुनियावी सत्य पर आधारित है, हर कोई अकेला किसी और दौड रहा है, अपनी मंजिल की ओर, किसकी मंजिल क्या है,दूसरे को पता नहीं. 

एक निर्धारित समय के बात मिली मंजिल खुशी किसी काम की नहीं, जैसे फसल सूख जाने के बाद वर्षा किसी किसान के काम की नहीं, जैसे दुःख में साथ छोड़ चुके रिश्ते सुख में किसी काम के नहीं. 

वैसे तो इंसान इस पृथ्वी पर अकेला ही आया है और उसे अकेले ही वापस जाना है, तब भी कुदरत ने कुछ 
रिश्ते बनाये हैं, इन्हें निभाना ना अनिवार्य है ना जरूरी है. 

मगर इंसान को कुदरत ने दिल दिमाग एहसास दिया है, 
कहीं ये रिश्ते निभाये भी जाते हैं और कहीं नहीं भी. 
निभाये तो स्वर्ग सा एहसास जीवन जिया जाता है. वर्ना एक ख़ामोशी और जीवन की सांसें चलती रहती हैं, ख़ामोश सी और जिन्दगी का दिया बिना अपनी लो बिखराये बुझ जाता है एक दिन. 

"रिश्तों का सपना "काश होता मेरा अपना, सपना भी तो मेरा ना था कभी सपने में रिश्ते मिलते थे जैसे अजनबी. कभी तो कुछ बोलेंगे मेरे जीते जी, वर्ना मौत की ख़ामोशी तो है ही. 

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Saturday, August 5, 2023

अपने का सपना (Apne ka sapna)

Sapna  - समाजिक बंधन-कविता     
Apne ka sapna
Apne ka sapna
Image from: pexels.com 


रिश्तों में..
कोई तो हो अपना..
रहा जिंदगी भर..
यही एक सपना..
अपने से पाने को..
मन तरस गया..
नैनो से नीर..
बरस बरस गया..
तलाश अभी तक..
जारी है..
शायद मेरी ही..
मती मारी है..

काश कोई रिश्ता..
अपना होता..
मैं चैन की नींद सोता..
मेरा जन्म..
अधूरा सा लगाता है..
अपने किसी को..
पा लेता..
तो जन्म सफल होता..
अपने के लिये..
दिल मे जगह..
अभी तक खाली है..
जहां मैंने..
गमी बसा ली है..

मन उदास है..
कभी लगता है..
कोई दिल के..
बहुत पास है..
कह दू उसे..
दिल की कुछ बातें..
नहीं कटती अकेले..
विरान रातें..
आंखे बोझिल हैं..
कोई नहीं दिखता..
अपनी परसाई के अलावा..
अपने कहीं ओझल हैं..

क्या यह जिन्दगी..
एक धोखा है..
या अपनों की..
तलाश का..
एक और मोका है..
सारी उम्र बीत गई..
कई रातें आई..
और रीत गई..
अभी तक ना मिला..
कोई अपनों में अपना..
क्या यू ही..
मर जाऊँगा..
लिये अधूरा सपना..

एक दिन..
भगवन सपने में आये ..
गीता के बचन..
याद दिलाये..
तुम हो मुझमे समाये..
तुम आत्मा हो..
एक किस्सा हो..
जन्मों जन्मों तक..
मेरा ही हिस्सा हो..
रिश्ते नाते..
मैंने ही बनाये और..
कभी जोड़े कभी तोड़े हैं..
जो तुम्हें..
अपने से लगते..
अपने थोडे हैं..

अपने अपने से..
लगते जो..
तुम्हारे मन को..
धोखा है वहम है..
तुम एक सच्ची आत्मा हो..
यही बस अहम है..
अकेले आये थे..
अकेले ही जाना है..
फिर क्यों..
तरस तरस..
अपनों को पाना है..
महाभारत में..
अपने अपनों से..
लड मरे..
जब कि स्वयं ईश्वर थे..
 सामने खडे..

अच्छा ही है..
दुनिया में कोई..
अपना नहीं..
अपना सा रिश्ता..
खो गया कहीं..
अपने के..
मिल जाने से..
मोह बढ़ता..
जीने की चाह जगती..
असानी से ना मरता..
विरह अग्नि..
ना होती बाकी..
ईश्वर की..
याद ना आती..
अपने के अभाव में..
एक आस है..
ईश्वर दिल के ..
बहुत पास है..

तेरे आँखों में..
जो सपने हैं..
प्रभु सदा से हैं..
और थे..
वही तेरे अपने हैं ..
उन्हीं ने तुम्हें..
इस धरा पर भेजा ..
निकाल अपना कलेजा ..
क्यों अपने की..
तलाश में..
व्यर्थ समय गवाता है..
तेरा अपना ही है..
जो यह विधाता है..
विधाता की प्रीत में ..
रम जा..
ईश्वर का स्नेह प्यार..
सदा पा..!!


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कविता की विवेचना: 

अपने का सपना/Apne ka sapna कविता आज के व्यवसायिक युग में अपनत्व कहीं खो  गया है, सब कुछ पैसा ही हो गया है. जैसे महौल को इंगित करती है. 

कोई रिश्ता अपना ना रहा, लहू, लहू को नहीं पहचानता पैसा ना हो तो कोई आपको नहीं जानता.

रिश्तों का स्वर्ग सा आनंद कहीं खो गया है, अब सोशल मीडिया अपना हो गया है, सब अपने आप आप मे गुम हैं. 

ऐसे में रिश्तों की क्या जरूरत है, अपना सा दिखता कोई नहीं सब अकेले अकेले निकल पडे, इसलिये  अपने की खोज छोड़ो भगवान से नाता जोड़ों वही हमारे अपने हैं. 

आखिर भगवान के पास ही जाना है, वो ही पक्का ठिकाना है, वही से आये थे ईश्वर ने अपने रिश्ते निभाए हैं. 

इतिहास गवाह है महाभारत में अपने ही अपनों से लड मरे, भाई ने भाई को मारा, पितामह भी अपने प्रिय अर्जुन के हाथों मरे, वहाँ तो श्री कृष्ण भगवान स्वयं मौजूद थे.उन्होंने भी होनी को होने दिया ताकि संदेश जाये यहां कोई नहीं किसी का अपना, अपना बनाना है एक सपना और सपने कभी सत्य नहीं होते. 

"अपने का सपना " कविता निहित करती है, अकेले आये थे अकेले ही जाना है, भगवान के पास ही तुम्हारा ठिकाना है, किसी से कोई आस मत रखो, भगवान पर विश्वास रखो और उनको बना लो अपना, जबकि वो तो पहिले से ही तुम्हारे हैं, थे और अनंत काल तक रहेंगे, तुम खुद समझो वो तुमसे नहीं कहेंगे. 

तो ईश्वर के हो जाओ और जीवन आनंद पाओ. 

...इति...

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Monday, April 3, 2023

बेटी बचाओ(Beti Bachao)

बेटी             - Save Girls child- कविता 
Beti Bachao
Beti Bachao_She is Angel
Image from:pexels.com 

 

मेरी प्यारी बिटिया..
तुझे गर्भ में ही मार दिया..
वो एक खून था..
मैं क्यों अपराधी बना..
क्या मेरे मन में जनून था..

कैसी वो जवानी की..
बेहूदा सोच थी..
खोखला आधुनिक मजबून था..
तुझे गर्भ में मार दिया..
मेरी गुडिया..
वो एक खून था..

तेरी माँ की ममता..
भी तो सूखी थी..
वो क्यों तेरी हत्या रोक ना सकी..
बस पल भर के रूठी थी..
वो क्यों निर्णय लेने में चुकी थी..

बिटिया जन्म लेना..
तेरा मौलिक अधिकार था..
ईश्वर की इच्छा थी..
ईश्वर का वरदान था..
तुझे मार दिया गर्भ में..
मैं क्यों बना भगवान सा..

मार तुझको गर्भ में..
जैसे बड़ा काम किया..
लगता क्यों है..
जीना अपना आशान किया..
मासूम लास पर जिये..
ऐसे जीवन पर धिक्कार है..

मार कर एक मासूम को..
कैसे सर उठाये जीते हो..
तुम बुजदिल पापी हो..
जो मासूमों का खून पीते हो..
क्यों अपने कृत्यों पर..
पश्चाताप नहीं हुआ..
तेरा दिल ना पसीजा ..
कैसे तू है जी रहा..

काश तूने गुडिया को..
जीने दिया होता..
तेरे आगन बहता..
प्रेम का निर्मल श्रोता..
तू भी जीवन के अभिन्न आनंद पाता..
पा नन्हें नन्हें आशिष ..
गद गद हो जाता..

अपने जीवन की..
निर्मल धारा को स्वयं तूने बांटा है..
मासूम कली को..
खिलने पहले काटा है..
कैसा तू माली है..
बीज को पनपने नहीं देता..
बाग की रौनक बढ़ने नहीं देता..

घोर पापी है तू..
मासूम का हत्यारा है ..
पाप अपना मान ले..
अपने आप को सज़ा दे..
अंत में ईश्वर तो..
तेरे पापो का हिसाब करेगा..
तू भी सजा से डरेगा..     

जवानी में किये बेफिक्र पाप..
बुढ़ापे में आते हैं..
एक एक करके याद..
माफ़ी का तू हकदार नहीं..
जीवन तेरा गया बेकार कहीं ..
अपनी अंतिम यात्रा पर जा..
अपने किये पाप पर पश्चाता..!!

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कविता की विवेचना:

बेटी बचाओ /Beti Bachao कविता कुप्रथा लडकी की भ्रूण हत्या को रोकने के प्रयासों में सहयोग है, बेटी को पैदा होने से पहिले ही मार देना, ईश्वर का अपमान है. 

सरकार ने कन्या भ्रुण हत्या कानून बनाया है, तब भी इस कानून का कितना पालन होता है किसे पता,भ्रष्टाचार सब जगह है यहां कितना है जाँच का विषय है. 

बेटी का घर में आगमन लक्ष्मी का आगमन है, सब जानते हैं मगर क्यों मानते नहीं, बेटी से घर की बरकत है रौनक है, बेटी भविष्य की माँ है, किसी की बहन है किसी की पत्नी है. 

बेटी देवी है माँ दुर्गा, माँ काली का स्वरूप है, देवी परम पूज्यनीय है, माँ परमपूज्य आदरणीय है,  फिर कन्या भ्रूण का तिरस्कार क्यों?
उसकी गर्भ में हत्या का विचार क्यों. 

"बेटी बचाओ" कविता लेखन ने एक एक पिता की अनुभूति से लिखी है, 

पिता ना जाने किस आधुनिकता या रूढ़िवाद के जुनून में बेटी की भ्रुण हत्या कर देता है और चिर काल बाद पश्चाताप की आग मे जलता रहता है, अपने आप को सजा देना चाहता है, इस अपराध बोध से निजात पाना चाहता है, उसे भी पता है कि यह अक्षम्य अपराध है. फिर भी पश्चाताप से ईश्वर उसे कभी क्षमा कर दे. 
"बेटी बचाओ _बेटी पढ़ाओ "

..इति..

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Sunday, March 12, 2023

दास्तान (Dastaan)

दास्तान        - प्रेम ज़ज्बात- कविता     
Dastaan
Dastaan
Image from:pexels.com 


दिल जब मचल जाये..
तो फिर क्या करें..
किसी की यादों में खोकर ..
क्यों एकांत में आहे भरें..

किस्से प्यार मोहब्बत के..
कहानियों नाविलो की..
बहुत सुहाने अच्छे लगते हैं..
हम ये किस्से दिल से सुनते हैं..
और मन लगाकर पढ़ते हैं..

प्यार जब हकीकत में हो जाये..
तो बहुत दर्द देता है..
कभी दिल टूटता है..
कभी मन बिखरता है..
ग़म में खुशी है कहीं ,तब ही तो..
मन मोहब्बत में रमता है..

जो ख्वाबों में आते थे, पल दो पल..
सामने उनके आते ही हकीकत में..
क्यों नजरे हम चुराते हैं उनसे..
क्यों हकीकत सच है ,विश्वास नहीं होता..

उनको हँसते हुये देखा था..
हमारा भ्रम था कि हंसी हमारे लिये थी..
वो तो उनका कोई ख्वाब उन्होंने..
हकीकत में सच होते देखा था..

ये प्यार मोहब्बतें क्यों..
एक साज़िश सी लगती है..
जैसे कोई जासूस मेरे दिल में पळता है..
क्या मिला तुम्हें मेरे दिल राज जानकर..
दिल की धडकनो की आवाज़ जानकर..

तेरे ही प्यार में यह दिल धडका था..
तेरी बेवफाई पर बहुत तड़फा था..
ना चाहते हुये भी तेरे ख्याल आते हैं..
दूरिया बनाना चाहता हूँ..
ख्वाब पास चले आते हैं..

जज़्बातों से मैं रोज लडता हूँ ..
तेरी सूरत सामने पाकर..
कमजोर पडता हूँ..
तेरा दगा देना और दूर चले जाना..
खूब मैं समझता हूँ..

जवानी में कदम रखते ही..
प्यार का सन्देशा आता है..
कोई अंजान दिल को बहुत भाता है..
रातों को करवटें बदलना..
और कम सोना किसी की यादों में खोना..

कभी खून से लिख कर..
दिल की बात बताना चाहता हूँ..
कभी ख्वाबों में तेरे करीब आता हूँ..
नहीं रहती मुझे कभी खुद की ख़बर..
मगर तुम्हारी हर बात बताता हूँ..

ईश्वर के सामने प्रार्थना करते हुए..
एक गुनाहगार नज़र आता हूँ..
क्यों मैंने ईश्वर से ना किया सच्चा प्यार..
क्यों परछाई की चाहत में हुया बर्बाद..

मदहोश सा मैं क्या बुदबुदाता हूँ..
बचपन से जवानी की यादों में जाता हूँ..
सोचता हूँ क्यों हुआ पैदा इस धरती पर..
क्यों ना हो सका आबाद इस धरती पर..
बचपन जवानी बुढ़ापा हुआ बर्बाद इस धरती पर..
खाक में मिल जाऊँगा एक दिन इस धरती पर..!!

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कविता की विवेचना: 

दास्तान/Dastaan कविता लेखक की इस दुनिया या  जीव लोक के बारे में परिकल्पना है. कि यह ज़ज्बात प्यार मोहब्बत क्यों बने. 

ईश्वर को ही मालूम कि उनकी मानव जाती के निर्माण और  मानव जाती में भावनाएं और प्यार भरने के पिछे क्या मूल कारण और उद्देश्य रहा होगा. 

मगर यह सत्य है कि मानव में भावनाएं हैं, जो मानव को बहुत आनंद भी देती हैं और कई बार अथाह दुख भी देती हैं. 

ईश्वर से प्यार तो बहुत अच्छा और आध्यात्मिक माना जाता है और 
इंसान का अपने परिवार से प्यार भाई बहन से प्यार माँ बाप से प्यार सामान्य और स्वाभाविक माना जाता है. 

मगर प्रेमी प्रेमिका का प्यार संशय की दृष्टि से देखा जाता है जब तक कि वो विवाह बंधन में बंध कर एक रिश्ता नहीं बन जाता. 

"दास्तान " कविता जज्बातों की कड़ीयों की एक कड़ी है जो एक इंसान की दास्तान बयान करती है और ईश्वर से अनुत्तरीत सवाल करती है कि उन्होंने मानव को क्यों बनाया और क्यों इतने सारे ज़ज्बात भरे. 

..इति..jpsb blog
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Friday, March 3, 2023

जिन्दगी क्षण भंगुर (Jindgi shand bhangur)

जिंदगी       - Life Philosophy - कविता 
Jindgi shand bhangur
Jindgi shand bhangur
Image from:pexels.com 


क्षण भंगुर है जिन्दगानी..
क्षण भंगुर हैं ख्वाब ..
फिर भी जिंदगी की..
जवानी में होता है रुआब..

कहीं तलाश प्यार की..
कहीं तलाश सपनों की बहार की..
जिन्दगी में अपनापन प्यार मिलता है..
प्रेम का इजहार भी मिलता है..

जिन्दगी के सफर में..
कभी धोखा और कृत्रिम..
संसार भी मिलता है..
मिलते हैं कई ज़ख़्म दिल पे ..
उन ज़ख़्मों पर मरहम..
लगानेवाला यार भी मिलता है..

कुछ लोग होंगे..
बहुत खुश तुमसे..
और कुछ लोग नाराज मिलेंगे..
इस जिन्दगी के सफर में..
कई एहसास मिलेंगे..

कभी बांधे जाएंगे..
तुम्हारी तारीफों के पुल..
कभी झोंकी जायेगी..
तुम्हारी आँखों में धूल..
कई अच्छे बुरे लोग मिलेंगे..
तो मक्कार भी आस पास हिलेंगे ..

अपनों से जाओगे ठुकराए..
और परायों से..
अपनाये जाओगे..
ढेर सारा अपनापन प्यार..
परायों से पाओगे..

धन दौलत की चमक..
जब तक है साथ तुम्हारे..
बहुत सारे यार दोस्त..
और रिस्तेदार हैं तुम्हारे..
जाते ही दौलत..
पहचान हो जाएगी गुल..
सब जाएंगे तुझे भूल..

जिन्दगी में कभी..
ऐसा भी पडाव मिलेगा..
जिन्दगी लगेगी सांसे खोती..
दुनिया लगेगी खिलखिला कर हसती ..
मगर तुम्हें लगेगी रोती..

काश जिंदगी सिर्फ..
खुशहाल होती..
संजोये ख्वाबों को..
हकीकत में संजोती..
प्यार और रिश्तों को..
एक मज़बूत धागे में पिरोती..

मगर सत्य यही है..
कि जिन्दगी है क्षण भंगुर..
पानी के बुलबुले सी..
एक टूटते तारे सी..
जिन्दगी को हमेशा जरूरत है..
ईश्वर के सहारे की..

तो जिन्दगी का यही सार है..
जिन्दगी ईश्वर का..
कुछ पलो के लिये उपहार है ..
करो इस उपहार का सम्मान..
ईश्वर का करो ध्यान..

जिन्दगी संवर जायेगी..
अंतिम क्षण ईश्वर के दर्शन पायेगी..
यह क्षण भंगुर सा..
जिन्दगी का बुलबुला..
हो जायेगा व्योम में लोप ..
रह जायेंगे यू दिन रात..
निकल जायेगी जैसे..
तुम्हारे सपनों की बारात ..!!

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कविता की विवेचना: 

जिन्दगी क्षण भंगुर/Jindgi shand bhangur कविता जिंदगी के विभिन्न आयामों को देखती है और महसूस करती है कि जिंदगी है क्षण भंगुर. 

जिन्दगी की शुरुआत में होती है अनोखे सपनों की बारात, सपने संजोये जिंदगी निकल पडती अपने मनोहारी सफर पर, सफर के 
दोरान कई पडाव सुख दुख के आते हैं. 

कभी नाराज रिश्ते कभी दोस्त भूले बिसरे, कभी-कभी होती है खुशियो से मुलाकात, अचानक फिर ग़मों की बरसात, कभी हंसते हंसते सोता हूं और रोते रोते उठता हूँ, यही तो है जिंदगी की कहानी. 

"जिन्दगी क्षण भंगुर " कविता में ज़िन्दगी को जिया है पानी के बुलबुले सा, आसमान में एक टूटते तारे सा, प्रकृती के सहारे जिंदगी बचा ही लेती है अपना अस्तित्व भले ही हो क्षण भंगुर. 
मगर इस क्षण भंगुर जिंदगी ने संसार का हर रंग देखा भाला और महसूस किया और इस क्षण भंगुर जिंदगी को भी भरपूर जिया.

..इति..

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Thursday, November 17, 2022

जीने की वज़ह (Jine ki vajah)

जीने की वज़ह  - Life philosophy          
Jine ki vajah
Jine ki vajah
Image from:pexels.com 

जिंदगी है एक सजा..
फिर क्या है..
जीने की वज़ह..
पल दो पल का सुख..
कुछ सुंदर..
खूबसूरत नजारे..
दुख भी हैं..
बहुत बहुत सारे..

कुछ रिश्ते..
खटे मीठे प्यारे..
कुछ पराये से..
जैसे अपने हैं हमारे..
कुछ दिल के पास..
मगर बन्द हैं..
मन के द्वारे..
जिन्दगी से इनका ताल मेल..
लगता है अजीब खेल..

ईश्वर तूने..
जिन्दगी सा अनूठा..
उपहार दिया..
साथ में बहुत सारा..
प्यार दिया..
जिन्दगी के लिये..
यह दुनिया बना दी..
सजाया आसमान..
और ये सारा जहान ..
हर जगह हमने देखा..
इस जिन्दगी का लेखा..

हे ईश्वर तेरी कुदरत  ..
और इसके राज..
ये तेरे बनाये..
रात दिन.. 
कल और आज ..
जिन्दगी से..
समय का जोड़ तोड़..
समय बितने पर..
आते जिन्दगी में..
कई मोड़..
बचपन जवानी और ..
बुढ़ापा और डर ..
मर जाने का सताता..


जिन्दगी क्यों..
लगती है सजा..
फिर क्या है जीने की वज़ह..
बचपन से पचपन का सफ़र..
पहले उमंग जोश से भरा..
फिर चुपके से..
कुदरत ने ..
जोश उमंग को कम करा..
आई अनचाही बीमारियाँ..
दवाओं से भरी अलमारियां..

जिन्दगी के फलसफे में..
ईश्वर की अहम भूमिका..
ईश्वर ही ने तो..
पहले सब कुछ दिया..
और चुपके से..
वापिस लिया..
वो जवानी की अकड ..
और मस्ती..
कहां गयी पता नहीं..
अब जिन्दगी सता रही..
क्यों कि जिंदगी है सज़ा..
फिर क्या जीने की वज़ह.  

ईश्वर तुम याद आते हो..
करते तेरी अर्चना..
समझ ना आई तेरी रचना..
काहे को तूने बनाई..
जिन्दगानी और ..
और दुनिया की कहानी..
क्यों लगती है..
ज़िंदगी बेइमानी..
क्यों दी जिन्दगी की सज़ा..
ढूंढते हैं जीने की वज़ह..

याद आता है एक गाना..
जो है पुराना..
कि दुनिया बनाने वाले..
क्या तेरे दिल में समायी..
तूने काहे को..
ये दुनिया बनाई..
काहे बनाये ये माटी के पुतले..
चेहरे कुछ काले..
कुछ मुखड़े उजले ..
काहे लगाया दुनिया का मेला..
मैं पाता हूं..
खुद को अकेला..
तब ही लगती है..
जिंदगी एक सज़ा..
फिर क्या जीने की वज़ह..!!

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कविता की विवेचना: 

जीने की वज़ह/Jine ki vajah कविता जिन्दगी की उहापोह और 
खुशी दुख तकलीफ कई उतार चढाव को महसूस कर लिखी गई है. 

इंसान की जिन्दगी की कोई तो वज़ह ईश्वर ने सोची होगी तब  ही यह दुनिया बनाई और इंसान बनाया, मगर वो वज़ह इंसान को क्यो आज तक नहीं पता. 

इंसान की ज़िंदगी का सिलसिला पैदा होना बचपन जवानी और बुढ़ापा और अंत में मर जाना, इस बीच क्या काम इंसान ने किया जो कि बहुत जरूरी था जिसके लिये ईश्वर ने यह जिन्दगी दी, काम अंत तक पता नहीं चला और इंसान मर गया. 

या  कि इंसान  वो ईश्वर का काम अनजाने में ही कर गया जो कि उसे स्वयं पता नहीं चल गया ईश्वर की माया ईश्वर ही जाने. 

"जीने की वज़ह "कविता के माध्यम से लेखक अपने जीने की वज़ह तलाश रहा है, मगर वज़ह अभी तक तो नहीं मिली, सांसे चल रहीं है जिंदगी भी चल रही है एक सज़ा की तरह, मगर लेखक जिंदा है और  अपने जीने की वज़ह जानने को उत्सुक है, शायद लेखक को जीने की वज़ह मिल जाये तो अच्छा है. 

..इति..
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Sunday, October 23, 2022

आत्मा की आवाज़ (Aatma ki awaj)

आत्मा         -आध्यात्मिक कविता 
Aatma ki awaj
Aatma ki awaj 
Image from:pexels.com 


सुनो आत्मा की आवाज़..
अपने दिव्य ज्ञान का ..
करो आगाज..
ना इसरो ,ना नासा..
आत्मा को आती है..
ब्रह्मांड की हर भाषा..

जहाँ लगते हैं..
करोड़ों प्रकाश वर्ष जाने में..
आत्मा पहुंचती है वहां..
चुटकी बजाने में..
पृथ्वी जैसे जीवन की तलाश..
पूरी ना हो सकी ..
जो आज तक..
आत्मा को है उस जीवन का..
पूर्ण है आभास..

करोड़ों और ग्रहो पर जीवन है ..
आत्मा को सब है ज्ञात ..
बस आत्मा को..
इस शरीर की कैद से..
छूटने की है बात ..
छूटते ही शरीर से..
आत्मा जा बसती है..
करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर..
सेकेंडो में..

उस ग्रह का..
रहण सहन भाषा..
सब पल में अपना लेती है..
हम जब तक..
पृथ्वी पर दक्ष क्रिया करने में..
व्यस्त होते हैं..
आत्मा करोडों प्रकाश वर्ष दूर..
किसी ग्रह पर..
अपना जन्म दिन..
मना रही होती है ..

बीती ताई बिसार दे..
आगे की सुद्ध ले..
कहावत को चरितार्थ..
कर रही होती है..
हम रोते हैं जब..
याद कर उन्हें..
वो हमारी नादानी पर..
मुस्कुरा रही होती है..
अपनी आजादी की..
खुशी मना रही होती है..

कई बंधन एक साथ..
छूट जाते हैं..
सीमित दायरा असहाय थी..
दम घुटता था..
अब आजाद सब आसान है..
सामने साक्षात भगवान हैं..

जब इतना कुछ पता है..
तो इंसान ..
मरने से क्यों डरता है..
क्यों आत्मा से जीते जी..
नहीं होती कभी बात..
क्यों आत्मा का..
साथ कभी ना भाता है..
क्यों इंसान का..
अपनी ही आत्मा से..
कटा है नाता ..

क्यों अपनी..
दुख तकलीफों को ..
आत्मा को नहीं बतलाता..
मन्दिर मन्दिर मन्नतें..
मगर स्वयं की..
शक्तिशाली आत्मा को..
क्यों है भुलाता..

सेकेंडो में हर समस्या का..
समाधान है..
आत्मा को वो दिव्य ज्ञान है..
शर्त, कि खुद खुद की..
आत्मा को जानो पहचानो..
तो तुम्हारी..
हर समस्या का हल है..
आत्मा में इतना बल है..

आत्म मंथन करने का..
वक़्त आ गया है..
तुम्हारी हर समस्या का..
हल आ गया है..
तो हे इंसान..
ईश्वर में हो जाओ विलीन..
चरम सुख पाओ..
चारों ओर स्वर्ग ही स्वर्ग है..
उस में बस जाओ..!!

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कविता की विवेचना: 

आत्मा की आवाज़/Aatma ki awaj कविता इंसान की ईश्वर द्वारा प्रदत्त दिव्य शक्तियों की ओर इंगित करती है. 

ईश्वर स्वयं आत्मा स्वरुप में हर इंसान में सारे जीवन मौजूद हैं, मगर इंसान अपने अंदर ध्यान ही देता और बाहरी क्षणिक सुख तलाशाता 
मर जाता है. 

मरने के बाद आत्मा को नजदीक पाता है, जीते जी जिससे मिल ना 
पाया शरीर के मोह माया में वक़्त गवाया .

अब आत्मा चुटकी में ही पूरा ब्रम्हांड दिखाती है, करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर किसी ग्रह में बसाती है .

"आत्मा की आवाज़ " कविता एहसास कराती है, काश आत्म चिंतन किया होता तो बहुत पहिले ही आत्मा से बात हो गई होती, जीवन इतना दुर्दांत नहीं होता, ईश्वर से रहती नजदीकियां, समझ आती बहुत पहले ही इस ब्रम्हांड की बारीकिया .

..इति..

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Tuesday, October 18, 2022

खोया हुआ सितारा (Khoya huwa sitara)

सितारा         -  Life philosophy 
Khoya huwa sitara
Khoya huwa sitara 
Image from:pexels.com 

आसमान के करोड़ों..
सितारों में से..
एक मैं भी हूँ..
कभी धुन्ध में खोया सा..
टिमटिमाता रोया सा..

दिख जाता हूँ कभी..
तारों के झुरमुट में..
कभी मिट जाता हूँ..
बादलो, धूल की..
आगोश में खो जाता हूँ..
कभी किसी का..
हो जाता हूँ..

किसने मुझे ढूँढा..
या फिर याद किया..
क्या हूँ मैं..
किसी आंख का तारा..
या अकेला हूँ बेसहारा..

इस नीले अंबर में..
ना किसी की..
खुशी हूँ ,ना किसी का..
ग़म हूँ..
मैं किसी की उम्मीद से..
थोडा कम हूँ..

लगाव, प्यार, यादे..
किसी के वादे..
जैसी भावनाएं..
मुझ से रहती दूर..
ना मैं बहादुर..
ना ही हूँ मजबूर..

मेरी शख्सियत..
कुछ भी नहीं..
पुराने चिराग सा..
खोया पडा हूँ..
सोचता हूँ मैं एक सितारा..
कितना बड़ा हूँ..

समय की गर्त में..
दबा पडा हूँ..
मैं जीवित हूँ..
मगर जैसे मरा पडा हूँ..
मेरा हाल कोई पूछता नहीं..
मैं अपनों से दूर..
खोया हूं कहीं..

मेरी खुद की चमक..
टिमटिमाहत में बदल गई..
ना रही रोशनी बाकी..
जैसे चिराग बुझने पर..
रह जाती है बाती..

मेरे मालिक मेरे ईश्वर की..
कृपा होती है कभी कभी..
तो चमक उठता हूँ..
रोशनी में नहाया सा..
दिखता हूँ खुद को..
अंबर में पराया सा..

तारों के झुरमुट से..
अलग थलग..
कभी रोता हूँ..
कभी हसता हूँ..
मेरी भावनाओं की..
किसी को परवाह नहीं..
मैं किसी की चाह नहीं..

अनंत सालों से..
ऐसे ही निर्थक पडा हूँ..
कई बार जिया..
और कई बार मरा हूँ..
मेरी हस्ती..
मुझ तक ही सीमित..
कुछ नहीं मेरी..
भावनाओं की कीमत 

मेरे होने ना होने सी है..
मेरी हालत..
मगर फिर भी..
मैं इस सृष्टी का..
एक हिस्सा हूँ..
और सितारों से अनजान..
गुमनाम किस्सा हूँ..

हम तारे अनजान..
एक दूजे अलग से..
फिर भी लगे..
जुड़े जुड़े से..
चमक रहें हैं आसमान में..
अन्दर से बुझे बुझे से..

ना हमारा आदि है..
ना अंत है..
सिलसिला यह अनंत है..
ब्रह्मांड में..
हम रसे बसे हैं..
कठिन नियमों में कसे हैं..

मेरा तारे सा..
कोई वज़ूद नहीं..
लगता है मैं मौजूद नहीं..
टिमटिमाना मेरी नियति है..
किसे बताऊ..
क्या मुझ पर बीती है..

यही सृष्टि है..
जो ईश्वर ने बनाई है..
मुझ जैसी कई चीजें..
कुदरत के कैनवास में..
सजाई है..
मैं उस सजावट का..
एक अंश हूँ..

मैं एक खोया सितारा..
कुछ ना होते हुए भी..
तारा समूह का वंश हूँ..
कोई तो चाहे मुझे..
दिल में बसाये मुझे..
उसे मैं मिल जाऊँगा..
चमक से खिल जाऊँगा..!!

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कविता की विवेचना: 

खोया हुआ सितारा/Khoya huwa sitara कविता धरती पर उपेक्षित इंसान की तुलना आसमाँ में तारे से की गई है.

जो अनाम है और तारों के झुंड का हिस्सा हैं. 
अनगिनत उपेक्षित इंसान हमें भी रोज नज़र आते हैं, जिनसे कई नजर बचाते हैं, वो भी इस समाज का हिस्सा हैं.

 जैसे तारों के झुंड में हर तारा तारों के समूह का सदस्य है, मगर निजी रूप से तारा भी अपने आप को उपेक्षित पाता है.

जैसे वह इतने सारे तारों के झुंड में खो गया है. 
उपेक्षा बहुत बड़ा घाव देती है, एक किस्म से जिंदगी का सारा आनंद रस ले लेती है. 

इंशा इंसा से प्यार करे एक दूजे को स्वीकार करे, बुझे हुये दियों में तेल डाल उन्हें प्रज्वलित करने सा काम होगा.

 किसी को जिन्दगी का आनंद मिलेगा किसी को आत्म संतुष्टि सम्मान मिलेगा, जिन्दगी में एक आलोकित शांति और चैन मिलेगा. 

"खोया हुआ सितारा " कविता पृथ्वी पर उपेक्षित सितारों की खोज है जिनमे चमक लानी है, ज़िंदगी में आनंद भरना है उन्हें सुन्दर खिले फूलों सा करना है, खोया तारा खुद खुद से मिल जायेगा एक तारा पृथ्वी पर झूमेगा गायेगा आनंद मनायेगा और आसमान के तारे को भी अपना पता मिल जायेगा , वह भी चमक से खिल जायेगा. 

..इति ..
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Saturday, October 8, 2022

कहानी एक परी की (Kahani ek pari ki)

कहानी परी की    - महिला सुरक्षा     
Kahani ek pari ki
Kahani ek pari ki 
Image from:pexels.com 

एक परी करती अठखेलियाँ..
परी लोक से पृथ्वी पर आयी..
पृथ्वी पर वो रही विचरती ..
पृथ्वी लगी परी को अलग सी..

परी के मन में पृथ्वी के रहस्य..
जानने की उत्सुकता जागी..
परी लोक से इजाजत मांगी ..
कि वह पृथ्वी पर करेगी प्रवास..

प्रवास दौरान जानेगी पृथ्वी के..
खास राज यहां की आबो हवा..
कैसी है, अलग है परी लोक से..
या वैसी की वैसी है..

पृथ्वी वाश दौरान एक राक्षक की..
नज़र परी पर पडी..
लगी वोह उसे खूबसूरत बडी..
राक्षस ने अपना भेस..
एक संजीदा युवक का बनाया..

यू वो भेस बदल ..
परी के सामने आया ..
की परी से अच्छी अच्छी बातें..
परी का दिल बहलाया और लुभाया..

परी उस राक्षस के मायाजाल में..
जा फंसी, राक्षक ने शिकंजे की..
रस्सी और कसी..
परी को देवलोक से सपने दिखाये..

उसकी बातों में आ..
परी ने अपने रेशमी पंख गंवाये..
और गवायी परी लोक की शक्तियां..
परी को पता ही ना चला..
राक्षस के खुनी पंजों में है उसका गला..

परी कब आलोकित से..
साधारण मानव हो गई..
उसे पता ही ना चला ..
कि उसे जा रहा है छला ..

शिकारी परिंदे के खून का प्यासा..
बुझा रहा था अपनी पिपासा..
राक्षक जल्द ही अपने..
असली रूप में आया..
परी को उसने तरह तरह से सताया..

पंख नोचे सुंदर चेहरा बिगाड़ दिया..
सारा दिव्य शृंगार उतार दिया..
और लगा रोज परी को तडफाने ..
होते थे डरावने बहाने..

परी राक्षक की हकीकत जान..
बहुत पस्ताई अब उसकी..
जान पर बन आई..
फंसी जैसे पिंजरे में मैना फडफाडयी..

राक्षक के खूनी पंजे..
परी की नाजुक गर्दन पर कसे..
बेबस परी की आखों में आंसू..
और चेहरे पर बेबसी..
प्राण पखेरू  उड़ गए ..
गर्दन जैसे और कसी ..

राक्षक का परियों का..
शिकार करने का सिलसिला..
अब तक जारी है..
ना जाने कितनी मासूम परियां ..
इस राक्षक ने मारी हैं..

राक्षक के पापों का घडा..
ऊपर तक भरा है..
फिर भी बेखौफ गुनाह कर रहा है..
ईश्वर से है परियों की है..
पुरजोर पुकार..
हे प्रभु इस राक्षक का..
करो जल्दी संहार ..!!

_Jpsb blog 

कविता की विवेचना: 

कहानी एक परी की/Kahani ek pari ki कविता हमारी नन्ही मुन्नी मासूम अबोध बच्चियाँ जो परियां हैं तितलियां हैं को इस जमाने के खुंखार राक्षसों से सावधान करती है. 

मासूम परियों के पंख नोचे जा रहें हैं, तितलियों के पंखों की रंगत जा रही है, उनके लिये वो खुला आसमान ना रहा, कहाँ हैं वो बाग बगीचे कहाँ है वो फूल सुंदर से .

इन राक्षसों को सज़ा कौन देगा राम,कृष्ण कब जन्म लेंगे इंतजार है, इंतजार की घडीया पड रही भारी ना जाने कितनी परियां अपनी जंग हारी, हर रोज़ है किसी ना किसी के मरने की बारी.

मधु मक्खियों को मार शहद खाया जा रहा है, तितलियों को फूलों से जुदा कर तड़फाया जा रहा है. 

"कहानी एक परी की "ना जाने कितनी परियों की घुटन हैं, सिसकियाँ हैं, आहे हैं, मासूम आँसू भरी निघाहे हैं, न्याय की ईश्वर से आश है, मन उदास है, उम्मीद की किरण सिर्फ ईश्वर के पास है. 

...इति नहीं अभी बाकी है..

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Friday, September 16, 2022

शर्म (Sharm)

शर्म  -  भारतीय संस्कृती-संस्कार-कविता    
Sharm
Sharm 
Image from:pexels.com 

शर्म हम भारतीयों ..
का गहना है..
हमें खुलेआम..
नाजुक बातों को..
नहीं कहना है..
खुलापन बेहेयायी..
कौन इस..
आधुनिकता के हैं..
अनुयायी..

फटे कपड़े..
फटी जीन्स..
अमीरों में..
गरीबी का शौक..
एक फैशन है..
गरीबी के दर्द का..
भी एक घूंट पियो..
एक पल के लिए..
गरीब को जिओ..

शायद सह ना पाओ..
जिन्दा ना रह पाओ..
दर्द से छटपटा..
मर जाओगे..
गरीब का दर्द..
ना सह पाओगे ..
शर्म हमे ..
आनी चाहिये..
अपने देश की..
गरीबी पर..
जिसे हम मिटा ना पाये..

शर्म हमे आनी चाहिए..
शब्दों और कपड़ों की..
मर्यादा पर..
झूठ कपट बेईमानी पर..
धर्म के नाम..
दो फाड़ दंगे फसादों पर..
अमीर गरीब की..
बढ़ती खाई पर..
गलत नीतियों के कारण..
बढ़ती महंगाई पर..

शर्म हमे आनी चाहिए..
आधुनिकता के नाम..
नंगई पर..
अपने संस्कारों की..
रिहाई पर..
शर्म हया..
हमारी संस्कृति का..
खूबसूरत राज है..
भारत की सभ्यता..
विश्व में..
सर्वोच्च आज है..

हे पूर्व वालों..
अपने आप को..
पश्चिम में..
मत ढालो..
पूर्व के तुम..
उगते सूरज हो..
विश्व में..
उजाळा करो..
पश्चिम में सूरज..
डूबने से घोर अँधियारा है..
हमें सात घोड़ों वाला..
सूर्य देवता प्यारा है..

शर्म पूर्व का..
पवित्रता का गहना है..
बेशर्मी को..
पश्चिम में रहना है..
पश्चिम में ही रहने दो..
तुम पूर्व का..
आंचल थाम लो..
शर्म हया सम्भाल लो..
इसे हवा में मत उछालो..
यही तुम्हारा गहना है..
इसके साथ तुम्हें..
सदा रहना है..!!

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कविता की विवेचना:

शर्म/Sharm कविता भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा शर्म, हया, मर्यादा को रेखांकित करती है. 

शर्म एक नयी नवेली दुल्हन है, शर्म पवित्रता का अह्सास है, शर्म भारतीय परंपरा और सभ्यता है, 
शर्म बड़ो का आदर है, रिश्तों की मर्यादा है. इसे भारत में ही समझा और महसूस किया जा सकता है. 

आधुनिकता के नाम पर भारत में अमीर वर्ग पश्चिम की  नंग्याता अपना कर अपने आप को प्रगतिशील आधुनिक मान बैठे हैं. 

"शर्म " कविता आधुनिकता के नाम पर बेशर्मी का विरोध दर्ज करती है और भारतीय सभ्यता को सर्वोच्च ठहराती है और शर्म, हया, मर्यादा भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है, इसका हमेशा हम भारतीयों को गर्व है और हमेशा रहेगा. 

..इति..
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