लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur EC)
A poem on election of India
जनता बेबस, लाचार खड़ी ताक,
अन्याय चुनाव का कब होगी बात,
वोट जनता का काटा,
संविधानिक अधिकार पर चांटा,
चुनाव आयोग का तानाशाही रुख ,
लोकतन्त्र पर गहराया संशय का साया,
विपक्ष की सुलगती चीखों में,
जब गूँज रही थी एक ही पुकार,
ताक रही थी जनता न्याय का द्वार।
लोकतंत्र पर भारी है सरकार,
निष्पक्ष चुनाव पर प्रहार..
सुप्रीम कोर्ट में आस लिए,
जब पहुँची जनता,साथ विपक्ष था,
ख़ामोशी देखकर टूटने लगी उम्मीद,
"क्यों मौन है सर्वोच्च अदालत?"
बेबस मन में सवाल असंख्य अधीर,
क्या होगी लोकतंत्र की तक़दीर ?
क्या वाकई हार गया लोकतंत्र?
क्या इतना गहरा है यह जाल?
पर धैर्य की अग्नि में तपकर ही ,
न्याय में आयेगा अभूतपूर्व निखार,
अदालत का हर एक सँभला कदम,
एक गहरा विश्वास जगाता है..
सिहासन संभले जनसैलाब आता है !
सारे साक्ष्यों को तौल,
अंततः आया वह ऐतिहासिक हुक्मनामा,
सत्य की विजय का बिगुल बजा,
झुका सत्ता का हर झूठा ड्रामा,
जनता ही मालिक है सत्ता ने माना !
निर्वाचन प्रणाली को साफ़ किया,
निष्पक्षता को फिर से माँजा,
एक-एक अधिकार को बहाल कर,
तोड़ा हर शंका का ताना बाना,
ये सपना है या सत्य पूर्व अनुमान!
सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया,
वही है लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी,
जनता की आकाँक्षाएँ होती हैं यहाँ पूरी,
मिट गया जन-मन का सारा संताप,
खिल उठा जनतंत्र का चेहरा,विजय की छाप !
अदालत के न्यायोचित निर्णय से,
विश्वास हुआ और भी गहरा।
जनता फिर से मुस्कुरा उठी,
मिला लोकतंत्र को नया जीवन,
हटा लोकतंत्र से बंदूक का पहरा,
जहाँ संविधान की सर्वोच्चता,
स्वयं सिद्ध है इस लिये तो,
भारतीय लोकतंत्र विश्व प्रसिद्ध है..!
🥀 Jpsb blog 🥀
यह भावपूर्ण कविता भारतीय लोकतंत्र,के लिये एक सपना देखती है चुनावी प्रक्रिया, जन-आकांक्षाओं और न्यायपालिका की भूमिका पर केंद्रित एक सशक्त साहित्यिक रचना है।और लोकतंत्र की जीत का यह सुनहरा सपना सत्य होगा पूर्ण विश्वास है.
कविता की विवेचना:-
"लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त " Loktantra aur EC"को मुख्य रूप से तीन वैचारिक चरणों में बाँटा गया है:
1. आक्रोश और निराशा का चरण: शुरुआत में जनता की लाचार स्थिति, मताधिकार पर आघात और चुनाव प्रणाली में कथित पक्षपात को दर्शाया गया है। विपक्ष का विरोध और लोकतंत्र पर गहराते संकट का सजीव चित्रण कवि ने तीखे शब्दों में किया है।
2. संशय और धैर्य का चरण: दूसरे चरण में जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचता है, तो शुरुआती मौन और न्याय में विलंब से जनता के मन में निराशा और संशय उत्पन्न होता है। हालाँकि, कवि यहाँ धैर्य की आवश्यकता पर बल देता है और विश्वास जताता है कि अदालत का हर विचारणीय कदम न्याय की ओर ही बढ़ता है।
3. न्याय और विजय का चरण:- अंतिम चरण में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से सत्य की विजय होती है। निर्वाचन प्रणाली में सुधार होता है, जनता के अधिकारों की पुनर्स्थापना होती है और सत्ता को जन-शक्ति के आगे झुकना पड़ता है।
अंततः संविधान की सर्वोच्चता और भारतीय लोकतंत्र की वैश्विक साख स्थापित होती है।
कवि का उद्देश्य:-
कवि का मुख्य उद्देश्य केवल राजनैतिक स्थिति पर कटाक्ष करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में जन-विश्वास को पुनर्स्थापित करना है।
• जन-चेतना जगाना: कवि पाठक को यह याद दिलाना चाहता है कि लोकतंत्र में असली मालिक 'जनता' ही है, कोई सत्ता या सरकार नहीं।
• संविधान और न्यायपालिका की महत्ता रेखांकित करना: कविता यह संदेश देती है कि कठिन से कठिन दौर में भी जब न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) अपने दायित्व का निर्वहन करती है, तो वह लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी के रूप में उभरती है।
• सकारात्मकता और धैर्य का संचार: संकट के समय तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन धैर्यपूर्वक न्याय की प्रतीक्षा करने से अंततः सत्य और निष्पक्षता की ही जीत होती है।
संक्षेप में, "लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त "कविता निराशा के बाद मिलने वाले न्याय, संविधान की शक्ति और भारतीय जनतंत्र के अमिट अस्तित्व की एक सुंदर और प्रेरणादायक अभिव्यक्ति है।
कृपया कविता को पढे और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें,ताकि लोकतंत्र की हमेशा जीत सुनिश्चित करें.
इति...
🥀 Jpsb blog
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Author is a member of SWA Mumbai
Copyright of poem is reserved.

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