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Saturday, August 8, 2026
लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur Chunav aayuk)t
Friday, August 7, 2026
शिक्षा देश निर्माण (Shiksha Desh Nirmad)
शिक्षा देश निर्माण जेन-जी द्वारा शिक्षा सुधार आंदोलन
शिक्षा का अधिकार,
यही है देश निर्माण का हथियार।
शिक्षा व्यवस्था सुधारो,
शिक्षा मांग रहे मासूम बच्चों को
यू ना बेवजह मारो।
शिक्षा में करेंगे सुधार,
बच्चे मानेंगे आभार।
एक अच्छा काम,
जो देश निर्माण से है जुड़ा,
करने में तुम्हें क्यों ऐतराज?
यही काम बनायेगा तुम्हे..
भारत का सरताज,
वोट अपने आप मिलेंगे।
फिर क्यों इधर-उधर की बातें,
बच्चों से युद्ध सी तैयारी,क्यों मत गई मारी?
भारत का सरताज,
वोट अपने आप मिलेंगे।
फिर क्यों इधर-उधर की बातें,
बच्चों से युद्ध सी तैयारी,
बस करना इतना सा काम,
शिक्षा को बनाना आम।
शिक्षा हर बच्चे को मिले,
चाहे अगड़े हो या पिछड़े,
नेता के बच्चे हो या अभिनेता के।
शिक्षा देश में पाये उत्कर्ष,
शिक्षा के लिये ना हो संघर्ष,
शिक्षा के लिये ना हो मोहताज,
उत्तम शिक्षा मिले सबको आज,
यही ही जेन जी का आगाज!
हमने अपने ही बच्चों के प्रति
यह वहम क्यों पाला है?
क्यों उन्हें डराया-धमकाया,
क्यों ना हल की उनकी समस्या,
सीधी बात क्यों इतनी टेढ़ी?
जागेगा जब शासन का ज़मीर,
बदलेगी तब भारत की तक़दीर।
सुन ली मासूमों की पुकार,
अब शिक्षा में होगा नया सुधार।
सस्ती और सुलभ हर शिक्षा होगी,
हर बच्चे की मुकम्मल इच्छा होगी।
सरकारी स्कूल बनेंगे अब मिसाल,
जहाँ पढ़ाई होगी सबसे बेमिसाल।
न नेता, न अभिनेता, न कोई भेदभाव,
हर बच्चे को मिलेगा एक सा प्रभाव।
सबको बराबरी की शिक्षा,
जैसी हो जिसकी पढ़ने की इक्षा !
हर बच्चे को मिलेगा एक सा प्रभाव।
सबको बराबरी की शिक्षा,
जैसी हो जिसकी पढ़ने की इक्षा !
न करना पड़ेगा अब विदेश का रुख़,
देश में ही मिलेगा ज्ञान का सुख,
कलम बनेगी हर हाथ की ढाल,
देश निर्माण में युवा करेगा कमाल.. !
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यह कविता देश के भविष्य—बच्चों—के प्रति संवेदनशील सोच और एक मजबूत राष्ट्र निर्माण की भावना को दर्शाती है। इसका मूल संदेश यह है कि शिक्षा केवल एक बुनियादी अधिकार ही नहीं, बल्कि देश के विकास और प्रगति का सबसे सशक्त हथियार है।
कविता का भावविस्तार:-वर्तमान समय में जब मासूम बच्चे अपने अधिकार और बेहतर भविष्य के लिए शिक्षा की मांग करते हैं, तो उनकी आवाज़ को दबाना या उन पर सख्ती बरतना अत्यंत चिंताजनक है।
कविता स्पष्ट करती है कि राजनीति और भाषणबाज़ी से हटकर यदि सरकारें शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार करें, तो जनता और आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा उनका आभार मानेंगी।
सच्चा नेतृत्व और लोकप्रियता सत्ता के दावों से नहीं, बल्कि जनहित के महान कार्य से मिलती है।बच्चों के प्रति कड़ा रुख अपनाने के बजाय उनकी समस्याओं को सहहानुभूति से सुनना और सुलझाना समय की मांग है।
शिक्षा में समाज के हर वर्ग के लिए समानता होनी चाहिए—चाहे बच्चा किसी गरीब का हो, अमीर का, नेता का हो या अभिनेता का। किसी को भी बेहतर पढ़ाई के लिए अपने देश को छोड़कर बाहर न जाना पड़े, यही हमारी व्यवस्था का सबसे बड़ा उत्कर्ष होगा।
सकारात्मक परिणाम एवं निष्कर्ष:-
कविता के अंतिम संदेश तक पहुँचते-पहुँचते सरकार को बच्चों की इस न्यायसंगत पुकार का अहसास होता है। सत्ता में बैठे नीति-निर्माताओं को यह स्पष्ट रूप से समझ आता है कि देश को दिशा देने वाली वास्तविक शक्ति केवल शिक्षित युवा ही हैं।
सरकार एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व निर्णय अगर लेती है, जिसके तहत शिक्षा को अल्प खर्च (न्यूनतम शुल्क) पर हर नागरिक के लिए सुलभ बनाया जाता है।
देश के सभी सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया जाता है ताकि वे निजी संस्थानों से भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर सकें। इस बदलाव से हर बच्चे का सपना साकार होगा और एक सशक्त, शिक्षित और आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत होगी।
कविता की विवेचना:-
"शिक्षा देश निर्माण " ( Shiksha Desh nirmad) कविता भारतीय शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियों, सामाजिक असमानता और व्यवस्था की संवेदनहीनता पर एक तीखा प्रहार करती है।
कविता का मुख्य स्वर आक्रोश और चेतना का है, जो यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे पहली और बुनियादी शर्त है।
कविता की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:-
• अधिकार और संघर्ष: मासूम बच्चों का शिक्षा की माँग करना और उसके बदले तंत्र की सख्ती का सामना करना समाज की एक विडंबनापूर्ण तस्वीर पेश करता है। कविता पूछती है कि जब शिक्षा हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, तो इसके लिए बच्चों को संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?
• राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल: कविता नेताओं और शासन प्रणाली को यह याद दिलाती है कि खोखले दावों या चुनावी वादों से बड़ा काम शिक्षा सुधार है। यदि सरकारें प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करती हैं, तो उन्हें जनता का स्वाभाविक समर्थन और सम्मान मिलेगा।
• समानता का संदेश: शिक्षा में किसी भी प्रकार का सामाजिक या आर्थिक भेदभाव नहीं होना चाहिए। चाहे गरीब का बच्चा हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का, सबको एक समान और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि देश की प्रतिभा को आत्म सम्मान और संतुष्टी मिले पढ़ाई के लिये बाहर (विदेश) न जाना पड़े।
कविता लिखने का उद्देश्य:-
कवि का मुख्य उद्देश्य सोए हुए शासन और समाज को जगाना है। कवि यह संदेश देना चाहता है कि बच्चों की जायज़ माँगों को दबाने के बजाय सरकार को सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारना चाहिए और शिक्षा को अल्प-खर्च पर हर नागरिक के लिए सुलभ बनाना चाहिए।
अंततः" शिक्षा देश निर्माण "कविता एक ऐसे समतावादी भारत के निर्माण का आह्वान करती है जहाँ हर हाथ में सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा रूपी कलम हो।.
कृपया कविता को पढे और शेयर करें.
....इति
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कविता का भावविस्तार:-
कविता के अंतिम संदेश तक पहुँचते-पहुँचते सरकार को बच्चों की इस न्यायसंगत पुकार का अहसास होता है। सत्ता में बैठे नीति-निर्माताओं को यह स्पष्ट रूप से समझ आता है कि देश को दिशा देने वाली वास्तविक शक्ति केवल शिक्षित युवा ही हैं।
सरकार एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व निर्णय अगर लेती है, जिसके तहत शिक्षा को अल्प खर्च (न्यूनतम शुल्क) पर हर नागरिक के लिए सुलभ बनाया जाता है।
कविता की विवेचना:-
"शिक्षा देश निर्माण " ( Shiksha Desh nirmad) कविता भारतीय शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियों, सामाजिक असमानता और व्यवस्था की संवेदनहीनता पर एक तीखा प्रहार करती है।
कविता की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:-
• अधिकार और संघर्ष: मासूम बच्चों का शिक्षा की माँग करना और उसके बदले तंत्र की सख्ती का सामना करना समाज की एक विडंबनापूर्ण तस्वीर पेश करता है। कविता पूछती है कि जब शिक्षा हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, तो इसके लिए बच्चों को संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?
• राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल: कविता नेताओं और शासन प्रणाली को यह याद दिलाती है कि खोखले दावों या चुनावी वादों से बड़ा काम शिक्षा सुधार है। यदि सरकारें प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करती हैं, तो उन्हें जनता का स्वाभाविक समर्थन और सम्मान मिलेगा।
• समानता का संदेश: शिक्षा में किसी भी प्रकार का सामाजिक या आर्थिक भेदभाव नहीं होना चाहिए। चाहे गरीब का बच्चा हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का, सबको एक समान और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि देश की प्रतिभा को आत्म सम्मान और संतुष्टी मिले पढ़ाई के लिये बाहर (विदेश) न जाना पड़े।
कवि का मुख्य उद्देश्य सोए हुए शासन और समाज को जगाना है। कवि यह संदेश देना चाहता है कि बच्चों की जायज़ माँगों को दबाने के बजाय सरकार को सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारना चाहिए और शिक्षा को अल्प-खर्च पर हर नागरिक के लिए सुलभ बनाना चाहिए।
Wednesday, August 5, 2026
महाशक्ति का मुखौटा (Mahashakti ka mukhota)
![]() |
| Mahashakti ka mukhota Image Created by: MetaAI |
कैसी यह परछाईं है?
कहीं प्रतिबंध की बेड़ी है,
कहीं बारूदी तन्हाई है।
अधिकारों को रौंदा जाता,
अपने ही व्यापारिक हित में,
नया युद्ध है थोपा जाता।
इतिहास गवाही देता है,
जिसने बदला रुख हवाओं का,
वह भारी कीमत भरता है।
अमन का पाठ पढ़ाते हैं,
मासूमों की चीखों पर ही,
अपनी सत्ता चमकाते हैं।
ताकत का घमंड भी टूटता है,
जब जागता है जन-मानस तब,
अन्याय का सूरज डूबता है।
महाशक्ति को एहसास हो,
शान्ति क्या होती है भास हो,
ना बनाओ दुनिया को बारूदी,
पता है तूने कितनों की उम्मीदें..
को आग लगा दी.
बस करो अब तुमको है अनुरोध,
तुम्हारे नर संहार का है विरोध ,
धरती को और ना बरबाद करो,
हो विश्व का कल्याण ..
कुछ ऐसा ईजाद करो...!
"महाशक्ति का मुखौटा " कविता एक अत्यंत सशक्त और मुखर काव्य-रचना है, जो आधुनिक वैश्विक राजनीति, भू-राजनीतिक स्वार्थों और विशेष रूप से अमरीकी राष्ट्रपति तथा वहाँ की नीतियों के दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार करती है।
(A poem on International Relation)
कविता का विस्तार:-
वैश्विक मंच पर स्वयं को शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का रखवाला बताने वाला अमरीका हमेशा एक मसीहा के रूप में सामने आता है।
लेकिन इस चमकदार मुखौटे के पीछे का कड़वा सच कुछ और ही है। जहाँ एक तरफ विश्व-कल्याण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कमजोर और संप्रभु देशों पर आर्थिक प्रतिबंधों और बारूद का बोझ थोप दिया जाता है।
'लोकतंत्र की रक्षा' का नारा वास्तव में केवल एक रक्षा कवच है, जिसका इस्तेमाल अमरीका अपने व्यापारिक, सैन्य और ऊर्जा संबंधी हितों को साधने के लिए करता है।
इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वियतनाम से लेकर इराक, अफगानिस्तान और लीबिया तक, जहाँ-जहाँ अमरीकी हस्तक्षेप हुआ, वहाँ केवल तबाही और तन्हाई ही हाथ आई।
जो भी देश या नेतृत्व अमरीका की भू-राजनीतिक योजनाओं के आगे झुकने से इनकार करता है, उसे 'भारी कीमत' चुकानी पड़ती है।
बेकसूर मासूमों की चीखों और लहू की नींव पर शक्ति का यह साम्राज्य खड़ा किया जाता है। बमों और मिसाइलों के साए में शांति का पाठ पढ़ाना एक भयावह विरोधाभास है।
किंतु इतिहास का यह भी नियम है कि सत्ता और ताकत का अहंकार स्थायी नहीं होता। जब पीड़ित जनता का जन-मानस जागता है, तो इतिहास का रुख बदलता है और किसी भी अन्यायी महाशक्ति का सूरज अस्त होकर ही रहता है।
कविता की विवेचना:-
कविता अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कड़वे यथार्थ और महाशक्तियों की आक्रामक विदेश नीति का एक यथार्थवादी विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
- विषय-वस्तु एवं प्रतीक विधान: कविता में 'शांति दूत का चोला' और 'मुखौटा' जैसे प्रतीकों के माध्यम से अमरीकी राष्ट्रपति की उस कूटनीति पर व्यंग्य किया गया है, जो मानवता का नाम लेकर युद्ध और तबाही को बढ़ावा देती है। 'वियतनाम से लेकर इराक' के उल्लेख से कविता को एक ऐतिहासिक और प्रामाणिक धरातल मिलता है।
- शिल्प और भाषा-शैली: कविता की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। इसमें रोष, आक्रोश और क्रांति का स्वर है। 'बमों की बारिश' और 'मासूमों की चीखें' जैसे शब्द बिंब सीधे पाठक की चेतना को झकझोरते हैं।
- मूल संदेश एवं उद्देश्य: "महाशक्ति का मुखौटा "कविता का मुख्य उद्देश्य महाशक्ति (USA) के दंभ को आईना दिखाना और यह चेताना है ,कि वास्तविक महाशक्ति वह नहीं जो विनाश करे, बल्कि वह है जो अपनी अकूत सामर्थ्य, धन और तकनीक का उपयोग विश्व-कल्याण, गरीबी मिटाने और वास्तविक शांति स्थापना में करे। महाशक्ति का कर्तव्य विश्व में विनाश फैलाना नहीं, बल्कि मानवता का संरक्षण करना है।
"महाशक्ति का मुखौटा "कविता अंतिम पंक्तियों में आशावादी दृष्टिकोण अपनाती है कि अंततः न्याय और जन-शक्ति की ही विजय होती है।
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Saturday, July 25, 2026
कॉकरोच ( Kackroch)
छात्रों के द्वारा delhi में मौजूदा विरोध प्रदर्शन, उनकी पीड़ा और भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को शामिल करके यहाँ कॉकरोच कविता में विस्तार दिया गया है:
KACKROCH-A Hindi Poem on Student protest
![]() |
| Kackroch Protest Image Created by:GemineAI |
जज साहब ने आकलन किया,
छात्रों को कॉकरोच कह दिया।
कॉकरोच अपना हक मांगने लगे,
लगता है उन्हें वो गए ठगे।
उनके भविष्य का हो रहा सौदा,
मुरझा रहा बचपन रूपी पौधा।
इनके भविष्य के साथ हो रहा खिलवाड़,
सुन ले अंधी-बहरी सरकार इनकी पुकार!
सड़कों पर आज उतरे हैं वो युवा,
जिनके सपनों का हर पन्ना हुआ धुआँ ,
धांधली, पेपर लीक..
और भ्रस्टाचार की मार,
कब तक सहेगा देश का होनहार?
हाथों में तख्तियाँ,
आँखों में अश्क और ज्वाला है,
यह सिर्फ विरोध नहीं,
समझे बात सरकार,
छात्र मांग रहे अपना अधिकार ..
हक की लड़ाई ही आजादी है।
सरकार की अव्यवस्था ने ही,
यह स्थिति ला दी है,
लाठियाँ की बौछार,
आशु गैस की मार,
नन्हें मासूम बच्चे बच्चियों का ..
क्यों रहे सर फाड़ ..
जुल्म अंग्रेजों सा अपनों से ..
सह कर भी न्याय की उम्मीद ,
उन्होंने नहीं छोड़ी है ..
सरकार अपनी है ,
अंग्रेजों की थोड़ी है ..
करो बच्चों से अच्छा व्यवहार..
शिक्षा का व्यापार ना होने दे ,
सपने मासूमों के नीलाम ना होने दे ,
छात्र नीव है इस देश की ..
इसे कमजोर ना होने दे,
ना बिछाये कांटे इनकी राह में..
इन्हें सुनहरे सपनों में खोने दे ..
कोचिंग माफिया चारो ओर..
और दलालों का जाल है,
मेहनती छात्रों का आज बुरा हाल है।
डिग्रियाँ बिक रही हैं क्या मोल ?
प्रतिभाएँ रो रही भविष्य डावं डोल ..
स्कूल धडा धड बंद कर ..
व्यवस्था चैन की नींद सो रही है।
बच्चे किये शिक्षा से वंचित..
ताज्जुब कोई नहीं चिंचित..
कह रहे अनपढ़ भारत होगा विकसित..
विश्व गुरु होने का सपना..
बिना शिक्षा के कैसे होगा अपना..
क्या यह किसी ने विचारा है..
या यह सिर्फ एक खोखला नारा है..
नारे को सार्थक करें ..
शिक्षा सुधार ईमानदारी से करे..
अभी भी समय है..
हुक्मरान होश में आएं,
युवाओं के जनाक्रोश को समझ जाए..
और राजनीति से उठकर..
सार्थक कदम देशहित में उठाये..
अपने भारत देश को महान बनाये..!!!
जय हिंद!
Jpsb blog
भारत शिक्षा सुधार का अब एक ही नारा हो:
• शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाज़ारीकरण पूरी तरह बंद हो!
• आज़ाद भारत में हर नागरिक के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बिल्कुल मुफ्त या नाममात्र (न्यूनतम) खर्च पर उपलब्ध हो!
जब पढ़ेगा देश का हर बच्चा बिना किसी आर्थिक बोझ के,तभी सही मायने में भारत महान और सशक्त बनेगा।
कविता की विवेचना:-
कॉकरोच कविता की मुख्य संवेदनाएँ एवं संदेश:-
• सड़कों पर उतरा आक्रोश: "कॉकरोच कविता" सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं के जज्बे को सलाम करती है। लाठियों आंसू गैस पानी की बौछारों के बीच भी उनका यह संघर्ष सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है।
• शिक्षा का बाज़ारीकरण: "शिक्षा कोई व्यापार नहीं" पंक्तियों के माध्यम से कवि ने उस व्यावसायिक तंत्र पर कड़ा प्रहार किया है जहाँ चंद रुपयों के खातिर प्रतिभाओं का सौदा होता है और डिग्रियाँ नीलाम की जाती हैं।
• समाधान और दृष्टि:"कॉकरोच कविता "केवल समस्या को नहीं रेखांकित करती, बल्कि इसका अंत भारत में एक बुनियादी और क्रांतिकारी सुधार के नारे के साथ होता है!
विम्बों और भाषा की दृष्टि से "कॉकरोच कविता" में "मुरझा रहा बचपन रूपी पौधा" तथा "आँखों में अश्क और ज्वाला" जैसे प्रयोग कविता को गहरा और प्रभावशाली बनाते हैं।
लेखक का कविता लिखने का उद्देश्य:-
"कॉकरोच कविता" को लिखने का मुख्य उद्देश्य देश की लचर और भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को आवाज़ देना है।
छात्रों को Kackroch कहना वो भी भारत की संविधान रक्षा करने वाली संस्था द्वारा, युवाओं और देश के भविष्य साथ घृणित मज़ाक है!
आखिर इनका सार्थक जवाब हमारे देश की इसी संस्था,संसद और सिस्टम को जिम्मेदारी से देना चाहिये.
याद रहे आप भी कभी युवा थे, युवाओं को आशीर्वाद प्यार और स्नेह के साथ सही मार्गदर्शन और शिक्षा का अधिकार दे ,यही उनका मूल भूत हक है..
...इति
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