Sunday, September 13, 2026

हम दो हवायें (Hum do hawaye)


हम दो हवायें-असीम प्यार की कविता 
Great Love -Poem
    
Hum do hawaye
Hum do hawaye
Image Created by:GemineAI 
     
हम दो हवायें..
मिल गाएँ..
नदिया से दरिया..
दरिया से सागर..
सागर दे पैगाम..
हम रूहें हैं..
प्यार की..
एक दूजे में समाहित..

आत्मा होना भाया..
पवित्र संपूर्ण प्यार..
हममें सदियों से समाया..
ब्रह्मांड हमारा घर..
कितना प्यारा है..
यही संसार हमारा है..
परमात्मा ने दुलारा है..

चाह नहीं हमें..
जन्म लेने की..
अमर अजर है हम..
फिर क्यों जन्मे..
हो अलग अलग..
शरीरों में बांटे जाये..
फिर एक होने की..
कसमें खाये..

फ़िर हो जायेगा..
दायरा सीमित..
एक उम्र और खत्म..
फिर आत्मा ही सत्य है..
फिर इस सत्य से..
क्यों दूर जाना..
ना कोई देश की सीमा..
ना किसी ग्रह की..
ना चिंता विरह की..

आज जानी जान है..
एक दूजे पे कुर्बान हैं..
एक हैं जैसे..
जल की धारा..
विज्ञान कहता है..
जल नहीं दो हवायें..
जो मिली फिर..
एक दूजे में समाहित..
फिर जल बन जाये..

इसमें ही हमें आनंद है..
गहरा सागर अथाह..
नील गगन और..
उसमें उड़ते बादल..
हवा का साथ है..
समझ से परे..
किसी इंसान के..
हवा पानी बादल वर्षा..
अलग अलग हैं..
कि एक ही बात है..

चाह में ही राह..
प्यार की वर्षा ..
सब बंधनों से मुक्त..
एक दूजे में प्रयुक्त..
आत्मा में परमात्मा ..
फिर फिर क्यों..
इंसान बनना..
अपने आप को..
सिद्ध करना एक हो..
प्यार को प्रसिद्ध करना..

एक दूजे में खोए खोए ..
जागते में सोये सोये..
ख़्वाबों के मसीहा..
हममें प्यार का..
अथाह सुख लिया..
ना उम्र की चिंता..
ना जन्मों का बन्धन..
हम हैं अमर..
हमारा प्यार अमर ..
गवाह खुदा..

ना भूख प्यास..
ना किसी की आस..
सब कुछ है अपने पास..
रूहों का जीवन..
अनोखा है..
आत्मा को परमात्मा से ..
मिलने का मौका है..
ब्रह्मांड का नहीं राज..
हमारा घर है आज..

ज्ञान विज्ञान से आगे ..
सब कुछ ज्ञात है..
ब्रह्मांड अनन्त..
उसमें जन्नत..
स्वर्ग नरक..
इंसानो का ज्ञान ..
हर जगह भगवान..
प्यार का वरदान..
हम आत्माओं को..
प्राप्त है..


​अनंत काल की यात्रा ..
हम एक ही रहेंगे अनंत..
न जिस्म न हम काया ..
हमने सब कुछ पाया..
समय, सृष्टि और शून्य ..
कोई नहीं बन्धन..
प्यार हमारा अमर..
रूहों का अनोखा संगम ..!!

Jpsb blog 

कविता की विवेचना:-

​"हम दो हवायें "(Hum do hawaye)कविता आत्मा, प्रेम और ब्रह्मांडीय चेतना का एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक संगम है।

 कवि ने भौतिक शरीर और सांसारिक बंधनों से परे जाकर प्रेम को रूहानी और अमर रूप में स्वीकार किया है। कविता की शुरुआत "दो हवाओं" के रूपक से होती है, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से जल का बनना) और आध्यात्मिक संगम दोनों को एक साथ दर्शाती है।

​कवि सांसारिक सीमाओं, जन्म-मरण के चक्र, और सामाजिक दायरों पर प्रश्न उठाता है। जब प्रेम दो आत्माओं का सत्य है, तो फिर भौतिक शरीर धारण करके विरह और सीमाओं का दुख क्यों सहना? 

कविता में हवा, पानी, बादल और वर्षा के माध्यम से प्रकृति और रूह के अटूट संबंध को दर्शाया गया है ऑक्सिजन हायड्रोजन का मिलन पानी वर्षा बादल पानी हवा के चक्र को दर्शाता अटूट बन्धन है l 
यह प्रेम किसी मानवीय समझ, उम्र या जन्मों के बंधन में नहीं बंधा है, बल्कि यह परमात्मा की कृपा और ब्रह्मांड की अनंतता में समाया हुआ है।

 कवि ने बड़ी सहजता से यह संदेश दिया है कि सच्चा प्रेम भौतिक आकर्षण न होकर आत्मा का परमात्मा में और एक रूह का दूसरी रूह में विलय है, जो अजर-अमर है।

​कवि का उद्देश्य:-

​"हम दो हवायें "कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य पाठक को सांसारिक और क्षणभंगुर प्रेम से ऊपर उठाकर 'रूहानी और शाश्वत प्रेम' की अनुभूति कराना है। 

कवि समाज द्वारा प्रेम पर थोपी गई सीमाओं, देह के मोह और भौतिकवादी सोच पर चोट करना चाहता है। वह यह समझाना चाहता है कि प्रेम का वास्तविक आनंद और पूर्णता शरीर धारण करने में नहीं, बल्कि आत्माओं के एकत्व में है।

​प्रकृति और विज्ञान के उदाहरणों द्वारा कवि यह सिद्ध करता है कि सच्चा प्यार मुक्‍त, असीम और ईश्वर का ही एक रूप है।

 कवि का ध्येय मनुष्य को यह अहसास कराना है कि आत्मा अमर है और जब प्रेम आत्मिक स्तर पर होता है, तो वह भय, विरह और मृत्यु से मुक्त होकर स्वयं ब्रह्मांड बन जाता है।

जिस्म ढल जाते हैं, मगर रूहें सदा मुस्कुराती हैं
अमर प्रेम की धाराएं, ब्रह्मांड में समाती हैं।

...इति 

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Tuesday, September 1, 2026

जीत तुम्हारी (Jeet Tumhari)



जीत तुम्हारी: A Motivation Poem 
उत्साह वर्धन कविता 
  
Jeet tumhari
Jeet tumhari
Image Created by:GemineAI 


जब जिन्दगी में..
सब गलत होता है..
कोई राह में..
रोड़े अटकाता है..
जब भाग्य..
रास्ता रोक..
खडा हो जाता है..

जब पैसे..
जेब में नहीं होते..
छोटी छोटी..
चीजों के लिये तरसते हैं ..
अपनी इच्छाओं को..
करते दफ़्न..
ओढ लेते कफन..
दिल में सहते..
कई ज़ख़्म..

दोस्त यार रिश्तेदार..
पूछते कैसे हो..
एक चुपी और ..
कमजोर मुस्कान..
चेहरे लायी जाती..
और लुप्त हो जाती..
मन कहता खुद से..
अपने आप से..
लड रहा हूँ..
सपने पकड़ रहा हूँ..

सारे प्रयास असफल..
होता सफलताओं का..
रोज़ कत्ल..
उम्मीदो पर पानी फिरता..
परेशान इंसान..
चारों ओर से घिरता..
जिस रास्ते जाता..
बीच में गड्ढा आता..
सिर पकड़ रह जाता..

हिम्मत ना हारो..
अपने ईश्वर को पुकारो..
वो तो हमेशा..
तुम्हारे साथ है..
उनका तुम्हारे सिर पर..
हमेशा हाथ है..
अंधेरी रात के बाद..
सवेरा जरूर होगा..
करो विश्वाश..

सफ़लता तुम्हारे..
कहीं आस पास ही है..
फिर क्यों उदास है..
विजय का तोहफ़ा..
जल्द तेरे हांथ में होगा..
इंतजार करो आज़..
तेरे ही सिर पर होगा ताज़..
यही तो है..
हार को जीत में..
बदलने का अंदाज..

असफ़लता बस..
एक बड़ी सफलता..
मिलने की निशानी है..
जो आज नहीं तो कल..
जरूर आनी है..
यह बात सब ने..
शदियों से मानी है..
फिर किस बात का रोना..
आग में तप कर ही..
बनता है खरा सोना..

जब मंजिल..
दूर और कठिन..
नजर आती है..
रुको मत-झुको मत..
रुको मत..
मंजिल की ओर बढ़ो..
संघर्ष और तेज़ करो..
अपने आप को परखो..
समझो..
तुम जीत के बहुत करीब हो..

आखिर तुम्हारी..
मेहनत रंग लाई..
किस्मत ने ली अंगड़ाई..
विजय रथ..
तुम्हारे सामने खडा है..
तुम्हारी उम्मीद से..
बहुत बड़ा है..
जीत का जश्न मनाओ..
सारी पीड़ाओं को..
अब भूल जाओ सदा के लिये..!!

🥀Jpsb blog 



कविता की विवेचना :-

'जीत तुम्हारी' (Jeet Tumhari)कविता  जीवन के गहन संघर्ष, निराशा और अंततः विजय की एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायी यात्रा को दर्शाती है। 

कवि ने कविता को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया है: परिस्थिति, संघर्ष और सफलता।
​प्रारंभिक पंक्तियों में जीवन के कठिन दौर का सजीव चित्रण है—जब आर्थिक तंगी होती है, सपने टूटते हैं, अपनों के सामने झूठी मुस्कान पहननी पड़ती है और हर प्रयास निष्फल प्रतीत होता है।

'इच्छाओं को दफ़्न करना' और 'कफ़न ओढ़ना' जैसे बिंब संघर्ष की चरम सीमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाते हैं।

​इसके बाद कविता में एक सकारात्मक मोड़ आता है, जहाँ कवि ईश्वर में अटूट विश्वास, धैर्य और निरंतर प्रयास का संदेश देता है।

 "आग में तप कर ही बनता है खरा सोना" जैसी पंक्तियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि जीवन की चुनौतियाँ हमें तोड़ने नहीं, बल्कि निखारने आती हैं। कवि का मानना है कि असफलताएँ वास्तव में एक बड़ी सफलता की पूर्वपीठिका होती हैं।

​अंतिम पंक्तियों में संघर्ष का सुखद परिणाम दिखाई देता है। मेहनत रंग लाती है, किस्मत बदलती है और व्यक्ति जीत के रथ पर सवार होता है। यह कविता हर गिरकर उठने वाले इंसान की अदम्य इच्छाशक्ति का उत्सव मनाती है।

​कविता लिखने का कवि का उद्देश्य:-

​इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य हतोत्साहित और निराश मन में आशा की नई किरण जगाना है। 

कवि समाज के उस वर्ग को संबोधित कर रहा है जो जीवन की विषमताओं, आर्थिक तंगी और बार-बार मिलने वाली असफलताओं से टूट चुका है।

​कवि का उद्देश्य पाठक को यह अहसास कराना है कि संघर्ष जीवन का स्थायी भाव नहीं है, बल्कि यह सफलता से ठीक पहले की परीक्षा है। 

वह मनुष्य को सिखाना चाहता है कि कठिन समय में अपनी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और ईश्वर पर विश्वास रखते हुए प्रयास जारी रखने चाहिए। 

कवि हमें समझाता है कि असफलता से डरने की बजाय अपने संघर्ष को और तेज़ करना चाहिए, क्योंकि अंधेरी रात के बाद ही सुनहरा सवेरा आता है। संक्षेप में, कवि हर गिरते हुए व्यक्ति को उठाकर उसे उसकी असीम क्षमताओं और अंतिम विजय का ध्यान दिलाना चाहता है।

​"जीत तुम्हारी " कविता का सार-
​संघर्षों की आँच में तपकर, तू सोना बनके उभरेगा,
धैर्य रख ऐ मुसाफ़िर, कल ताज तेरे ही सिर सजेगा!

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...इति 

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Saturday, August 29, 2026

प्यार विचित्र है ( Pyar vichitra hai)


प्यार विचित्र है- एक प्रेम कविता 
  
Pyar vichtra hai
Pyar vichtra hai
Image Created by: GemineAI 

मेरा प्यार है आजाद..
किसी नियम से..
बंधा नहीं..
ना कहीं सीखा..
स्वभाविक स्वकेन है..
ईश्वर की देन है..


ना आलिंगन..
ना गुलाब का फूल..
ना हांथ में हांथ..
तुम में खोया खोया..
जैसे हवा में धूल..
तेरा नूरानी चेहरा..
याद है मुझे..
बाकी सब गया भूल..

तुम्हारे पसंद के रंग..
दिल उड़ती पतंग ..
तितलियां रंग बिरंगी..
खुश हैं फूलों के संग..
तेरी पसंद का इत्र..
है ना प्यार विचित्र..

क्या तुम्हें है पता..
मुझे है तुम्हारी..
कितनी परवाह..
तुम्हारी पसंद की काफ़ी..
मुझे भी है भाती..
सोता हू तो..
सपने में भी तुम आती..

मेरी आत्मा..
ढूँढती है परमात्मा..
तुम मिल जाती हो..
तुम से आत्मा को..
कैसे दूर रखूं..
तुमसे मिलने को बेचैन है..
खो ना जाये कहीं..
जो तेरे दिल में चैन है..

मुझे पता है..
तुम्हारी पसंद ना पसंद..
कैसे नियम हैं..
मेरे दिल के..
तुमसे मिलते जुलते..
तेरी यादों की ठौर..
मेरी सांसो की डोर..

मन का ख्याल शांत..
एक सीमित दायरा..
जिसमें डोल रहा..
प्यार हमारा..
घुटन भी ना हो..
और रहे जैसे..
समुद्र का किनारा..

कभी कोई आघात..
पहुँचाया हो तुम्हें..
अनजाने में..
सज़ा के लिये..
हाजिर हूँ मैं सदा..
कभी भी आजमा ले..
ये जान तुम्हारे हवाले..

मेरा दिल भरा पडा है..
तुम्हारी परवाह..
तारीफ़ के सलीको से..
कैसा तुम्हें जहान चाहिये..
चलो बना दूँ मैं..
भरा पूरा रंग बिरंगे ..
फूलों के बगीचों से..

प्यार विचित्र है..
कैसा बना दिल में..
मोहब्बत का चित्र है..
मैं कहता हूँ प्रिया..
तू कहती मुझे मित्र है..
प्रिय कहो..
एक दूसरे के दिल में रहो..!!

🥀Jpsb blog 

'प्यार विचित्र है' कविता प्रेम के उस अलौकिक और अनूठे रूप को दर्शाती है जो पारंपरिक सीमाओं, नियमों और सांसारिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त है।

​कविता की विवेचना:-

​'प्यार विचित्र है' ( Pyar vichtra hai)शीर्षक से रचित यह कविता प्रेम की गहन, स्वाभाविक और अध्यात्म से जुड़ी अनुभूति को अभिव्यक्त करती है। 

कवि का प्रेम शारीरिक आकर्षण, स्पर्श या उपहारों (जैसे आलिंगन या गुलाब) का मोहताज नहीं है; बल्कि यह ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक सहज और निश्छल भावना है। 

प्रेम की यह स्थिति हवा में उड़ी धूल की तरह प्रिय में पूरी तरह लीन हो जाने की है, जहाँ प्रेमी को प्रिय के नूरानी चेहरे के अलावा संसार की अन्य सभी बातें भूल जाती हैं।

​कविता में प्रिय की पसंद-नापसंद, उसके पसंदीदा रंग, कॉफ़ी और इत्र को अपनी जीवनशैली में ढालने का सुंदर वर्णन है। यह समर्पण केवल बाहरी न होकर आत्मिक स्तर पर है।

 कवि अपनी आत्मा को प्रिय में खोजता है और उसे परमात्मा के समान दर्जा देता है। प्रेम यहाँ एक ऐसी स्थिति में है जहाँ न तो घुटन है और न ही असीमित स्वतंत्रता, बल्कि यह 'समुद्र के किनारे' की तरह एक शांत और संतुलित दायरे में बहता है।

​कविता के अंत में एक मार्मिक विरोधाभास सामने आता है—प्रेमी अपने प्रिय को 'प्रिया' मानकर संपूर्ण समर्पण और जीवन न्योछावर करने को तैयार है, जबकि दूसरी ओर से उसे केवल 'मित्र' का संबोधन मिलता है।

 इसके बावजूद, प्रेमी के मन में कोई शिकायत नहीं है, बल्कि वह इस अनूठे रिश्ते में भी एक-दूसरे के दिल में रहने की पवित्र कामना रखता है।

​कविता का उद्देश्य:-

​इस कविता का मुख्य उद्देश्य प्रेम को सांसारिक और औपचारिक बंधनों से ऊपर उठाकर उसकी विशुद्ध, आत्मिक और निस्वार्थ प्रकृति को उजागर करना है।

 कवि यह संदेश देना चाहता है कि सच्चा प्रेम केवल पाने या भौतिक अभिव्यक्तियों (जैसे उपहार या स्पर्श) तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह प्रिय की खुशी, उसकी पसंद-नापसंद की परवाह करने और उसके प्रति पूर्ण समर्पण का नाम है।

​यह कविता प्रेम में स्वतंत्रता और सम्मान के संतुलन को दर्शाती है, जहाँ बिना किसी घुटन के एक दायरा बना रहता है। जब प्रेम में कोई स्वार्थ नहीं होता, तो प्रिय द्वारा 'मित्र' कहे जाने पर भी समर्पण भाव कम नहीं होता।

 अंततः, यह रचना पाठक को यह समझाती है कि प्रेम ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है, जो आत्मा को शांति देता है और रिश्ते की परिभाषा से परे जाकर भी निस्वार्थ बना रहता है।
​स्लोगन

​"नियम और बंधनों से मुक्त जहाँ निष्काम भाव का प्रवाह है, वही सच्चा और विचित्र प्रेम का एहसास है।"

...इति 

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Friday, August 21, 2026

ये कैसा रिश्ता (Ye kaisa rishta)

ये कैसा रिश्ता 
भारतीय बेटी के बाबुल से रिश्ते पर कविता 
Ye kaisa rishta
Ye kaisa rishta 
Image Created by GemineAI 

बेटी जो है..
दिल का टुकड़ा..
चाँद सा उसका मुखडा..
चिड़िया सी चहचहाये ..
सब का मन लुभाये ..

बेटी जवान हुयी..
घर की आन बान शान हुयी..
शादी के रिश्ते..
आने लगे-कोई जचे..
कोई ना जचे -लडका देखने..
के ही परिवार में चर्चे..

पराये धन की कहावत..
बेटी को अक्सर..
बाबुल सुनाने लगे..
जो बहुत अपने से थे..
अब अनजाने लगे..
बेटी से पीछा लगे ऐसा..
घर वाले छुड़ाने लगे..

मात-पिता भाई-बहन..
की प्यारी थी..
सबकी राज दुलारी थी..
सीने से लगा..
माँ ने नाजो से पाला था..
अब क्यों दे रहे..
देश निकाला सा..

एक अनजान सा इंसान..
सब बोले..
अब यही है तेरा भगवान..
इसकी ही तू अपनी है ..
अब इसकी पत्नी है..
हम हुये पराये..
बेटी पराया धन ..
अपने घर जाये..

बचपन से जवानी तक..
मुझे सहेजा था..
मैं थी बाबुल का कलेजा सा..
किसी पराये की नजर..
कोई अनजाना स्पर्श..
लगा था जहर सा..
बुरी नजर कई बार उतारी थी..

अब एक अनजाने के हवाले..
जो हर तरह मुझे छुएगा..
मेरा मन हो ना हो..
मुझे खुश होना होगा..
उसके साथ सोना होगा..
उसकी सेवा मेरा बनाया फर्ज ..
जैसे पिछले जन्म का कर्ज..

मात -पिता अचानक ..
बदल गये मेरे..
आ गये नये मम्मी-पापा ..
यही है सास-ससुर का नाता..
मैं पतझड़ का बनी पत्ता..
जो अपनी साख से टूटा..
ना जाने कहाँ गिरेगा..
और क्या होगी उसकी दशा..

यही रीत बेटियों के लिये..
सदियों से चली आयी..
मेरी माँ भी..
किसी साख का पत्ता थी..
पिता के ..
परिवार का हिस्सा बनी ..
उसकी माँ से वो टूटी..
इसे कहते हैं गृहस्थी..

मैं भी अपनी बेटी को..
बहुत लाड प्यार कर..
चिड़िया सा पाळूगी ..
फिर जवान होने पर..
समझा बुझा..
घोंसले से निकालूँगी ..
चंद आँसू होंगे उसके..
और मेरे भी..

यही रीत है पुरानी..
हर बेटी की यही कहानी..
अच्छी है या बुरी है..
मगर रीत प्रेम से जुड़ी है..
गर मात-पिता ने..
रीत ना निभाई..
तो प्रेम लेता है अंगड़ाई..

फिर लैला-मजनू..
शिरी-फरहाद ;हीर- राझा..
पैदा होते हैं..
दोनों ही प्रेम में मरते..
मात-पिता रोते हैं..
भावनाओं की नदी बही हैं..
बाबुल के प्यार के बीच..
प्रेमी का प्यार भी सही है..

कभी कभी बेटी..
बाबुल के घर आयेगी..
लगेगी परायी सी..
उसे मेहमान सा एहसास..
कराया जाएगा..
एक औपचारिकता का रिश्ता..
निभाया जायेगा..
वो बेचारी ठगी सी..
 बाबुल को ताकेगी ..
बाबुल की खुशी के लिये..
अपना मुँह सी लेगी..

दर्द चाहे जितना हो भरा.. 
कृत्रिम मुस्कान..
मुँह पर ला..
अच्छी हूँ पापा कह देगी..
बाबुल एहसास करायेगा..
घर अब वही है तेरा..
वही तेरा परिवार..
वहीँ तेरा साँझ सवेरा..

इस अनोखे रिश्ते को..
सारी दुनिया ने माना है..
संसार को एक करने बाना है..
बेटी तुम भी मान लो..
यही संसार है..
रिश्तों का व्यवहार है..
खुश रहो तुम सदा..
यही है बाबुल की दुआ..!!

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कविता की विवेचना:-

​"ये कैसा रिश्ता" ( Ye kaisa rishta)  कविता भारतीय समाज में बेटी के जन्म से लेकर उसकी विदाई और विवाह के बाद के जीवन की एक कड़वी, संवेदनशील और व्यावहारिक वास्तविकता को उजागर करती है।

​कविता की शुरुआत में बेटी का अपने मायके में बचपन, उसका प्यार और लाड-प्यार दर्शाया गया है। लेकिन जैसे ही वह बड़ी होती है, "पराया धन" जैसी सदियों पुरानी कहावतें उसके अपने ही घर में बेगानापन घोल देती हैं। 

कवि ने इस मानसिक द्वंद्व को बेहद स्पष्टता से उकेरा है कि जिस बेटी को जीवन भर हर अनजान स्पर्श और बुरी नजर से बचाया गया, विवाह के नाम पर वही बेटी अचानक एक अजनबी को सौंप दी जाती है।

​कविता शाख से टूटे पत्ते के रूप में स्त्री की विवशता को दर्शाती है, जिसे हर स्थिति में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। आगे चलकर यह सामाजिक रीतियों और मानवीय भावनाओं (प्रेम) के बीच के संतुलन को भी रेखांकित करती है। 

यदि समाज परंपरा और प्रेम के बीच तालमेल न बिठाए, तो यह सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाता है।

 अंत में, मायके में मेहमान बन जाने का दर्द और चेहरे पर झूठी मुस्कान रखकर "सब ठीक है" कहने की नियति, भारतीय नारी के त्याग को बखूबी बयान करती है।

​कवि का उद्देश्य:-

​"ये कैसा रिश्ता" कविता के माध्यम से कवि का मुख्य उद्देश्य स्त्री जीवन के उस सबसे बड़े दर्द और विरोधाभास को सामने लाना है, जिसे समाज प्रायः "परंपरा" का नाम देकर अनदेखा कर देता है।

​कवि पाठक को यह सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं कि कैसे एक ही पल में अपने ही माता-पिता और घर बेगाने हो जाते हैं।

 कवि समाज की इस दोहरी मानसिकता पर सवाल उठाते हैं कि जो बेटी कभी "दिल का टुकड़ा" थी, वह अचानक "पराया धन" कैसे बन जाती है।

 इसके साथ ही, कवि परंपराओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक संतुलन की पैरवी करते हैं, ताकि वैवाहिक रीतियाँ केवल एक औपचारिकता न बनकर प्रेम और सम्मान का आधार बनें। 

अंततः "ये कैसा रिश्ता"कविता कवि का ध्येय स्त्री के त्याग, उसके मानसिक संघर्ष और एक नए जीवन में ढलने की उसकी अद्भुत क्षमता को सम्मान देना है।बेटियां समाज की आन बान शान हैं, त्याग बलिदान की प्रतिमूर्ति हैं. 

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....इति 

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