Saturday, August 29, 2026

प्यार विचित्र है ( Pyar vichitra hai)


प्यार विचित्र है- एक प्रेम कविता 
  
Pyar vichtra hai
Pyar vichtra hai
Image Created by: GemineAI 

मेरा प्यार है आजाद..
किसी नियम से..
बंधा नहीं..
ना कहीं सीखा..
स्वभाविक स्वकेन है..
ईश्वर की देन है..


ना आलिंगन..
ना गुलाब का फूल..
ना हांथ में हांथ..
तुम में खोया खोया..
जैसे हवा में धूल..
तेरा नूरानी चेहरा..
याद है मुझे..
बाकी सब गया भूल..

तुम्हारे पसंद के रंग..
दिल उड़ती पतंग ..
तितलियां रंग बिरंगी..
खुश हैं फूलों के संग..
तेरी पसंद का इत्र..
है ना प्यार विचित्र..

क्या तुम्हें है पता..
मुझे है तुम्हारी..
कितनी परवाह..
तुम्हारी पसंद की काफ़ी..
मुझे भी है भाती..
सोता हू तो..
सपने में भी तुम आती..

मेरी आत्मा..
ढूँढती है परमात्मा..
तुम मिल जाती हो..
तुम से आत्मा को..
कैसे दूर रखूं..
तुमसे मिलने को बेचैन है..
खो ना जाये कहीं..
जो तेरे दिल में चैन है..

मुझे पता है..
तुम्हारी पसंद ना पसंद..
कैसे नियम हैं..
मेरे दिल के..
तुमसे मिलते जुलते..
तेरी यादों की ठौर..
मेरी सांसो की डोर..

मन का ख्याल शांत..
एक सीमित दायरा..
जिसमें डोल रहा..
प्यार हमारा..
घुटन भी ना हो..
और रहे जैसे..
समुद्र का किनारा..

कभी कोई आघात..
पहुँचाया हो तुम्हें..
अनजाने में..
सज़ा के लिये..
हाजिर हूँ मैं सदा..
कभी भी आजमा ले..
ये जान तुम्हारे हवाले..

मेरा दिल भरा पडा है..
तुम्हारी परवाह..
तारीफ़ के सलीको से..
कैसा तुम्हें जहान चाहिये..
चलो बना दूँ मैं..
भरा पूरा रंग बिरंगे ..
फूलों के बगीचों से..

प्यार विचित्र है..
कैसा बना दिल में..
मोहब्बत का चित्र है..
मैं कहता हूँ प्रिया..
तू कहती मुझे मित्र है..
प्रिय कहो..
एक दूसरे के दिल में रहो..!!

🥀Jpsb blog 

'प्यार विचित्र है' कविता प्रेम के उस अलौकिक और अनूठे रूप को दर्शाती है जो पारंपरिक सीमाओं, नियमों और सांसारिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त है।

​कविता की विवेचना:-

​'प्यार विचित्र है' ( Pyar vichtra hai)शीर्षक से रचित यह कविता प्रेम की गहन, स्वाभाविक और अध्यात्म से जुड़ी अनुभूति को अभिव्यक्त करती है। 

कवि का प्रेम शारीरिक आकर्षण, स्पर्श या उपहारों (जैसे आलिंगन या गुलाब) का मोहताज नहीं है; बल्कि यह ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक सहज और निश्छल भावना है। 

प्रेम की यह स्थिति हवा में उड़ी धूल की तरह प्रिय में पूरी तरह लीन हो जाने की है, जहाँ प्रेमी को प्रिय के नूरानी चेहरे के अलावा संसार की अन्य सभी बातें भूल जाती हैं।

​कविता में प्रिय की पसंद-नापसंद, उसके पसंदीदा रंग, कॉफ़ी और इत्र को अपनी जीवनशैली में ढालने का सुंदर वर्णन है। यह समर्पण केवल बाहरी न होकर आत्मिक स्तर पर है।

 कवि अपनी आत्मा को प्रिय में खोजता है और उसे परमात्मा के समान दर्जा देता है। प्रेम यहाँ एक ऐसी स्थिति में है जहाँ न तो घुटन है और न ही असीमित स्वतंत्रता, बल्कि यह 'समुद्र के किनारे' की तरह एक शांत और संतुलित दायरे में बहता है।

​कविता के अंत में एक मार्मिक विरोधाभास सामने आता है—प्रेमी अपने प्रिय को 'प्रिया' मानकर संपूर्ण समर्पण और जीवन न्योछावर करने को तैयार है, जबकि दूसरी ओर से उसे केवल 'मित्र' का संबोधन मिलता है।

 इसके बावजूद, प्रेमी के मन में कोई शिकायत नहीं है, बल्कि वह इस अनूठे रिश्ते में भी एक-दूसरे के दिल में रहने की पवित्र कामना रखता है।

​कविता का उद्देश्य:-

​इस कविता का मुख्य उद्देश्य प्रेम को सांसारिक और औपचारिक बंधनों से ऊपर उठाकर उसकी विशुद्ध, आत्मिक और निस्वार्थ प्रकृति को उजागर करना है।

 कवि यह संदेश देना चाहता है कि सच्चा प्रेम केवल पाने या भौतिक अभिव्यक्तियों (जैसे उपहार या स्पर्श) तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह प्रिय की खुशी, उसकी पसंद-नापसंद की परवाह करने और उसके प्रति पूर्ण समर्पण का नाम है।

​यह कविता प्रेम में स्वतंत्रता और सम्मान के संतुलन को दर्शाती है, जहाँ बिना किसी घुटन के एक दायरा बना रहता है। जब प्रेम में कोई स्वार्थ नहीं होता, तो प्रिय द्वारा 'मित्र' कहे जाने पर भी समर्पण भाव कम नहीं होता।

 अंततः, यह रचना पाठक को यह समझाती है कि प्रेम ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है, जो आत्मा को शांति देता है और रिश्ते की परिभाषा से परे जाकर भी निस्वार्थ बना रहता है।
​स्लोगन

​"नियम और बंधनों से मुक्त जहाँ निष्काम भाव का प्रवाह है, वही सच्चा और विचित्र प्रेम का एहसास है।"

...इति 

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Friday, August 21, 2026

ये कैसा रिश्ता (Ye kaisa rishta)

ये कैसा रिश्ता 
भारतीय बेटी के बाबुल से रिश्ते पर कविता 
Ye kaisa rishta
Ye kaisa rishta 
Image Created by GemineAI 

बेटी जो है..
दिल का टुकड़ा..
चाँद सा उसका मुखडा..
चिड़िया सी चहचहाये ..
सब का मन लुभाये ..

बेटी जवान हुयी..
घर की आन बान शान हुयी..
शादी के रिश्ते..
आने लगे-कोई जचे..
कोई ना जचे -लडका देखने..
के ही परिवार में चर्चे..

पराये धन की कहावत..
बेटी को अक्सर..
बाबुल सुनाने लगे..
जो बहुत अपने से थे..
अब अनजाने लगे..
बेटी से पीछा लगे ऐसा..
घर वाले छुड़ाने लगे..

मात-पिता भाई-बहन..
की प्यारी थी..
सबकी राज दुलारी थी..
सीने से लगा..
माँ ने नाजो से पाला था..
अब क्यों दे रहे..
देश निकाला सा..

एक अनजान सा इंसान..
सब बोले..
अब यही है तेरा भगवान..
इसकी ही तू अपनी है ..
अब इसकी पत्नी है..
हम हुये पराये..
बेटी पराया धन ..
अपने घर जाये..

बचपन से जवानी तक..
मुझे सहेजा था..
मैं थी बाबुल का कलेजा सा..
किसी पराये की नजर..
कोई अनजाना स्पर्श..
लगा था जहर सा..
बुरी नजर कई बार उतारी थी..

अब एक अनजाने के हवाले..
जो हर तरह मुझे छुएगा..
मेरा मन हो ना हो..
मुझे खुश होना होगा..
उसके साथ सोना होगा..
उसकी सेवा मेरा बनाया फर्ज ..
जैसे पिछले जन्म का कर्ज..

मात -पिता अचानक ..
बदल गये मेरे..
आ गये नये मम्मी-पापा ..
यही है सास-ससुर का नाता..
मैं पतझड़ का बनी पत्ता..
जो अपनी साख से टूटा..
ना जाने कहाँ गिरेगा..
और क्या होगी उसकी दशा..

यही रीत बेटियों के लिये..
सदियों से चली आयी..
मेरी माँ भी..
किसी साख का पत्ता थी..
पिता के ..
परिवार का हिस्सा बनी ..
उसकी माँ से वो टूटी..
इसे कहते हैं गृहस्थी..

मैं भी अपनी बेटी को..
बहुत लाड प्यार कर..
चिड़िया सा पाळूगी ..
फिर जवान होने पर..
समझा बुझा..
घोंसले से निकालूँगी ..
चंद आँसू होंगे उसके..
और मेरे भी..

यही रीत है पुरानी..
हर बेटी की यही कहानी..
अच्छी है या बुरी है..
मगर रीत प्रेम से जुड़ी है..
गर मात-पिता ने..
रीत ना निभाई..
तो प्रेम लेता है अंगड़ाई..

फिर लैला-मजनू..
शिरी-फरहाद ;हीर- राझा..
पैदा होते हैं..
दोनों ही प्रेम में मरते..
मात-पिता रोते हैं..
भावनाओं की नदी बही हैं..
बाबुल के प्यार के बीच..
प्रेमी का प्यार भी सही है..

कभी कभी बेटी..
बाबुल के घर आयेगी..
लगेगी परायी सी..
उसे मेहमान सा एहसास..
कराया जाएगा..
एक औपचारिकता का रिश्ता..
निभाया जायेगा..
वो बेचारी ठगी सी..
 बाबुल को ताकेगी ..
बाबुल की खुशी के लिये..
अपना मुँह सी लेगी..

दर्द चाहे जितना हो भरा.. 
कृत्रिम मुस्कान..
मुँह पर ला..
अच्छी हूँ पापा कह देगी..
बाबुल एहसास करायेगा..
घर अब वही है तेरा..
वही तेरा परिवार..
वहीँ तेरा साँझ सवेरा..

इस अनोखे रिश्ते को..
सारी दुनिया ने माना है..
संसार को एक करने बाना है..
बेटी तुम भी मान लो..
यही संसार है..
रिश्तों का व्यवहार है..
खुश रहो तुम सदा..
यही है बाबुल की दुआ..!!

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कविता की विवेचना:-

​"ये कैसा रिश्ता" ( Ye kaisa rishta)  कविता भारतीय समाज में बेटी के जन्म से लेकर उसकी विदाई और विवाह के बाद के जीवन की एक कड़वी, संवेदनशील और व्यावहारिक वास्तविकता को उजागर करती है।

​कविता की शुरुआत में बेटी का अपने मायके में बचपन, उसका प्यार और लाड-प्यार दर्शाया गया है। लेकिन जैसे ही वह बड़ी होती है, "पराया धन" जैसी सदियों पुरानी कहावतें उसके अपने ही घर में बेगानापन घोल देती हैं। 

कवि ने इस मानसिक द्वंद्व को बेहद स्पष्टता से उकेरा है कि जिस बेटी को जीवन भर हर अनजान स्पर्श और बुरी नजर से बचाया गया, विवाह के नाम पर वही बेटी अचानक एक अजनबी को सौंप दी जाती है।

​कविता शाख से टूटे पत्ते के रूप में स्त्री की विवशता को दर्शाती है, जिसे हर स्थिति में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। आगे चलकर यह सामाजिक रीतियों और मानवीय भावनाओं (प्रेम) के बीच के संतुलन को भी रेखांकित करती है। 

यदि समाज परंपरा और प्रेम के बीच तालमेल न बिठाए, तो यह सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाता है।

 अंत में, मायके में मेहमान बन जाने का दर्द और चेहरे पर झूठी मुस्कान रखकर "सब ठीक है" कहने की नियति, भारतीय नारी के त्याग को बखूबी बयान करती है।

​कवि का उद्देश्य:-

​"ये कैसा रिश्ता" कविता के माध्यम से कवि का मुख्य उद्देश्य स्त्री जीवन के उस सबसे बड़े दर्द और विरोधाभास को सामने लाना है, जिसे समाज प्रायः "परंपरा" का नाम देकर अनदेखा कर देता है।

​कवि पाठक को यह सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं कि कैसे एक ही पल में अपने ही माता-पिता और घर बेगाने हो जाते हैं।

 कवि समाज की इस दोहरी मानसिकता पर सवाल उठाते हैं कि जो बेटी कभी "दिल का टुकड़ा" थी, वह अचानक "पराया धन" कैसे बन जाती है।

 इसके साथ ही, कवि परंपराओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक संतुलन की पैरवी करते हैं, ताकि वैवाहिक रीतियाँ केवल एक औपचारिकता न बनकर प्रेम और सम्मान का आधार बनें। 

अंततः "ये कैसा रिश्ता"कविता कवि का ध्येय स्त्री के त्याग, उसके मानसिक संघर्ष और एक नए जीवन में ढलने की उसकी अद्भुत क्षमता को सम्मान देना है।बेटियां समाज की आन बान शान हैं, त्याग बलिदान की प्रतिमूर्ति हैं. 

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....इति 

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Sunday, August 16, 2026

प्यार कहाँ है (Pyar kahan hai)

प्यार कहाँ ?💕
प्यार तलाशती कविता..क्या प्यार मिला?
   
Pyar kahan ?
Pyar kahan ?💕
Image Created by: GemineAI 


मिला ना मुझे..
कोई प्यार कभी..
जब कि मैंने..
तलाश बहुत की..

सोचा था..
कभी ना कभी..
मिलेगा कोई ..
जो चाहेगा..
मुझे भी..

मगर सिर्फ ..
प्यार की कदर कहाँ..
प्यार के साथ..
धन का रिश्ता..
क्या वो प्यार है..

चलो कर लो..
एक सुलह..
सौदा कर लो..
प्यार का..
कह दो इसे शादी..

क्या ये सौदा..
कभी निभा..
प्यार इसमें..
कहाँ था..
प्यार का बन्धन..
किसने कहा..

तब भी इससे..
एक परिवार बना..
बेटा-बेटी का..
संसार बना..
हम माता-पिता हुये..

प्यार का रिश्ता..
हमारी संताने..
प्यार को पहचाने..
माता-पिता का प्यार..
उन पर था सरोबार..

यह प्यार तो..
सच्चा था..
प्यार हमारा बच्चा था..
बच्चों के सपने..
कितने लगे अपने..

लंबी दूरी..
लंबा इंतजार..
कहाँ प्यार का इजहार..
क्या हम दोनों में था..
बच्चों के रूप में पनपा..

आज बच्चे ही..
हमारा प्यार है..
यही तो..
संसार है..
प्यार कहाँ?
घूम फिर जवाब मिला..!

🥀Jpsb blog 🥀


कविता की विवेचना:-

​"प्यार कहाँ है "( Pyar kahan hai)कविता मानव जीवन की एक गहरी और व्यावहारिक सच्चाई को उजागर करती है। कवि की यह यात्रा रोमांटिक प्रेम की असफलता से शुरू होकर वात्सल्य (माता-पिता के प्रेम) की पूर्णता तक पहुँचती है।

​शुरुआत में, कवि जीवनसाथी के रूप में सच्चे प्रेम की तलाश में भटकता है, लेकिन उसे केवल निराशा हाथ लगती है। 

कवि इस कड़वे सच पर चोट करता है कि आधुनिक समाज में प्रेम की कदर कम और धन-संपत्ति का मोल अधिक है। 

जब सच्चा भावनात्मक लगाव नहीं मिलता, तो विवाह महज़ एक "सौदा" या "समझौता" बनकर रह जाता है।

 कवि यहाँ समाज में विवाह की गिरती मर्यादा और उसमें मौजूद व्यावसायिकता पर सवाल उठाता है।

​लेकिन कविता का असली सौंदर्य और मोड़ इसके दूसरे भाग में आता है। भले ही दो आत्माओं के बीच वह रोमांटिक प्रेम न पनप पाया हो, लेकिन उस समझौते (विवाह) के परिणामस्वरूप संतान का जन्म होता है। 

बच्चे के रूप में जब माता-पिता को निस्वार्थ प्रेम देने का अवसर मिलता है, तब उन्हें प्रेम की वास्तविक परिभाषा समझ आती है।
 जो प्यार वे दुनिया या साथी में खोज रहे थे, वह वात्सल्य के रूप में उनके अपने बच्चों में प्रस्फुटित होता है। 

बच्चे ही माता-पिता का संसार बन जाते हैं। कविता यह संदेश देती है कि प्रेम केवल दो प्रेमियों के बीच का आकर्षण नहीं है, बल्कि त्याग, निस्वार्थ सेवा और अपने बच्चों के प्रति समर्पण ही प्रेम का सबसे पवित्र और सच्चा रूप है।

​कवि का उद्देश्य:-

​इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य पाठक को प्रेम के सच्चे और वास्तविक रूप से परिचित कराना है। 

कवि समाज को यह समझाना चाहता है कि धन और स्वार्थ पर टिके विवाह या संबंध कभी आंतरिक तृप्ति नहीं दे सकते। 

सच्चा प्रेम बाहर की दुनिया में ढूँढने के बजाय निस्वार्थ रिश्तों में झलकता है। कवि का उद्देश्य निराश दिलों को यह दिलासा देना भी है कि यदि जीवनसाथी के रूप में रोमांटिक प्रेम न भी मिले, तो भी जीवन खाली नहीं रहता—माता-पिता का बच्चों के प्रति निष्काम वात्सल्य ही ईश्वर का सबसे सच्चा और महान प्रेम है।

"प्यार कहाँ है " कविता प्यार तलाशती है,प्रेमी प्रेमिका तो नहीं मिला मगर वात्सल्य प्रेम सच्चा मिला जो प्यार की तलाश का जवाब था.

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...इति 

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Saturday, August 8, 2026

लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur Chunav aayuk)t



लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur EC)
           A poem on election of India 
   
Loktantra aur chunav aayukt
Loktantra aur EC 
Image Created by:Meta AI 

जनता बेबस, लाचार खड़ी ताक,
अन्याय चुनाव का कब होगी बात,
वोट जनता का काटा,
संविधानिक अधिकार पर चांटा,
चुनाव आयोग का तानाशाही रुख ,
लोकतन्त्र पर गहराया संशय का साया,

विपक्ष की सुलगती चीखों में, 
जब गूँज रही थी एक ही पुकार,
ताक रही थी जनता न्याय का द्वार।
लोकतंत्र पर भारी है सरकार,
निष्पक्ष चुनाव पर प्रहार..

सुप्रीम कोर्ट में आस लिए,
जब पहुँची जनता,साथ विपक्ष था,
ख़ामोशी देखकर टूटने लगी उम्मीद,
"क्यों मौन है सर्वोच्च अदालत?" 
बेबस मन में सवाल असंख्य अधीर,
क्या होगी लोकतंत्र की तक़दीर ?

क्या वाकई हार गया लोकतंत्र?
क्या इतना गहरा है यह जाल?
​पर धैर्य की अग्नि में तपकर ही ,
न्याय में आयेगा अभूतपूर्व निखार,
अदालत का हर एक सँभला कदम,
एक गहरा विश्वास जगाता है..
सिहासन संभले जनसैलाब आता है !

सारे साक्ष्यों को तौल, 
 अंततः आया वह ऐतिहासिक हुक्मनामा,
 सत्य की विजय का बिगुल बजा,
 झुका सत्ता का हर झूठा ड्रामा,
 जनता ही मालिक है सत्ता ने माना !

निर्वाचन प्रणाली को साफ़ किया, 
निष्पक्षता को फिर से माँजा,
एक-एक अधिकार को बहाल कर, 
तोड़ा हर शंका का ताना बाना,
ये सपना है या सत्य पूर्व अनुमान! 

सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया,
वही है लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी,
जनता की आकाँक्षाएँ होती हैं यहाँ पूरी,
​मिट गया जन-मन का सारा संताप, 
खिल उठा जनतंत्र का चेहरा,विजय की छाप !

अदालत के न्यायोचित निर्णय से, 
विश्वास हुआ और भी गहरा।
जनता फिर से मुस्कुरा उठी,
मिला लोकतंत्र को नया जीवन,
हटा लोकतंत्र से बंदूक का पहरा,
जहाँ संविधान की सर्वोच्चता,
स्वयं सिद्ध है इस लिये तो,
भारतीय लोकतंत्र विश्व प्रसिद्ध है..!

🥀 Jpsb blog 🥀


यह भावपूर्ण कविता ​भारतीय लोकतंत्र,के लिये एक सपना देखती है चुनावी प्रक्रिया, जन-आकांक्षाओं और न्यायपालिका की भूमिका पर केंद्रित एक सशक्त साहित्यिक रचना है।और लोकतंत्र की जीत का यह सुनहरा सपना सत्य होगा पूर्ण विश्वास है. 

​कविता की विवेचना:-

​"लोकतंत्र और  चुनाव आयुक्त " Loktantra aur EC"को मुख्य रूप से तीन वैचारिक चरणों में बाँटा गया है:

1. ​आक्रोश और निराशा का चरण: शुरुआत में जनता की लाचार स्थिति, मताधिकार पर आघात और चुनाव प्रणाली में कथित पक्षपात को दर्शाया गया है। विपक्ष का विरोध और लोकतंत्र पर गहराते संकट का सजीव चित्रण कवि ने तीखे शब्दों में किया है।

2. ​संशय और धैर्य का चरण: दूसरे चरण में जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचता है, तो शुरुआती मौन और न्याय में विलंब से जनता के मन में निराशा और संशय उत्पन्न होता है। हालाँकि, कवि यहाँ धैर्य की आवश्यकता पर बल देता है और विश्वास जताता है कि अदालत का हर विचारणीय कदम न्याय की ओर ही बढ़ता है।

3. ​न्याय और विजय का चरण:- अंतिम चरण में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से सत्य की विजय होती है। निर्वाचन प्रणाली में सुधार होता है, जनता के अधिकारों की पुनर्स्थापना होती है और सत्ता को जन-शक्ति के आगे झुकना पड़ता है। 

अंततः संविधान की सर्वोच्चता और भारतीय लोकतंत्र की वैश्विक साख स्थापित होती है।

​कवि का उद्देश्य:-

​कवि का मुख्य उद्देश्य केवल राजनैतिक स्थिति पर कटाक्ष करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में जन-विश्वास को पुनर्स्थापित करना है।

• ​जन-चेतना जगाना: कवि पाठक को यह याद दिलाना चाहता है कि लोकतंत्र में असली मालिक 'जनता' ही है, कोई सत्ता या सरकार नहीं।

• ​संविधान और न्यायपालिका की महत्ता रेखांकित करना: कविता यह संदेश देती है कि कठिन से कठिन दौर में भी जब न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) अपने दायित्व का निर्वहन करती है, तो वह लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी के रूप में उभरती है।

• ​सकारात्मकता और धैर्य का संचार: संकट के समय तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन धैर्यपूर्वक न्याय की प्रतीक्षा करने से अंततः सत्य और निष्पक्षता की ही जीत होती है।

​संक्षेप में, "लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त "कविता निराशा के बाद मिलने वाले न्याय, संविधान की शक्ति और भारतीय जनतंत्र के अमिट अस्तित्व की एक सुंदर और प्रेरणादायक अभिव्यक्ति है।

कृपया कविता को पढे और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें,ताकि लोकतंत्र की हमेशा जीत सुनिश्चित करें. 

इति...

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