Wednesday, August 5, 2026

महाशक्ति का मुखौटा (Mahashakti ka mukhota)

 महाशक्ति का मुखौटा
A poem on super power USA
   
Mahashakti ka mukhota
Mahashakti ka mukhota
Image Created by: MetaAI

शांति दूत का चोला ओढ़े,
कैसी यह परछाईं है?
कहीं प्रतिबंध की बेड़ी है,
कहीं बारूदी तन्हाई है।
लोकतंत्र का नाम भुनाकर,
अधिकारों को रौंदा जाता,
अपने ही व्यापारिक हित में,
नया युद्ध है थोपा जाता।
वियतनाम से लेकर इराक तक,
इतिहास गवाही देता है,
जिसने बदला रुख हवाओं का,
वह भारी कीमत भरता है।
बमों की बारिश करके जो,
अमन का पाठ पढ़ाते हैं,
मासूमों की चीखों पर ही,
अपनी सत्ता चमकाते हैं।
पर वक्त हमेशा बदलता है,
ताकत का घमंड भी टूटता है,
जब जागता है जन-मानस तब,
अन्याय का सूरज डूबता है।

महाशक्ति को एहसास हो,
शान्ति क्या होती है भास हो,
ना बनाओ दुनिया को बारूदी,
पता है तूने कितनों की उम्मीदें..
को आग लगा दी. 

बस करो अब तुमको है अनुरोध,
तुम्हारे नर संहार का है विरोध ,
धरती को और ना बरबाद करो,
हो विश्व का कल्याण ..
कुछ ऐसा ईजाद करो...!

Jpsb blog 

"महाशक्ति का मुखौटा " कविता एक अत्यंत सशक्त और मुखर काव्य-रचना है, जो आधुनिक वैश्विक राजनीति, भू-राजनीतिक स्वार्थों और विशेष रूप से अमरीकी राष्ट्रपति तथा वहाँ की नीतियों के दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार करती है।

(A poem on International Relation)

कविता का विस्तार:-

​वैश्विक मंच पर स्वयं को शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का रखवाला बताने वाला अमरीका हमेशा एक मसीहा के रूप में सामने आता है।

 लेकिन इस चमकदार मुखौटे के पीछे का कड़वा सच कुछ और ही है। जहाँ एक तरफ विश्व-कल्याण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कमजोर और संप्रभु देशों पर आर्थिक प्रतिबंधों और बारूद का बोझ थोप दिया जाता है।

 'लोकतंत्र की रक्षा' का नारा वास्तव में केवल एक रक्षा कवच है, जिसका इस्तेमाल अमरीका अपने व्यापारिक, सैन्य और ऊर्जा संबंधी हितों को साधने के लिए करता है।

​इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वियतनाम से लेकर इराक, अफगानिस्तान और लीबिया तक, जहाँ-जहाँ अमरीकी हस्तक्षेप हुआ, वहाँ केवल तबाही और तन्हाई ही हाथ आई। 

जो भी देश या नेतृत्व अमरीका की भू-राजनीतिक योजनाओं के आगे झुकने से इनकार करता है, उसे 'भारी कीमत' चुकानी पड़ती है।

 बेकसूर मासूमों की चीखों और लहू की नींव पर शक्ति का यह साम्राज्य खड़ा किया जाता है। बमों और मिसाइलों के साए में शांति का पाठ पढ़ाना एक भयावह विरोधाभास है। 

किंतु इतिहास का यह भी नियम है कि सत्ता और ताकत का अहंकार स्थायी नहीं होता। जब पीड़ित जनता का जन-मानस जागता है, तो इतिहास का रुख बदलता है और किसी भी अन्यायी महाशक्ति का सूरज अस्त होकर ही रहता है।

कविता की विवेचना:-

​"महाशक्ति का मुखौटा " ( Mahashakti ka Mukhota)
कविता अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कड़वे यथार्थ और महाशक्तियों की आक्रामक विदेश नीति का एक यथार्थवादी विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
  • ​विषय-वस्तु एवं प्रतीक विधान: कविता में 'शांति दूत का चोला' और 'मुखौटा' जैसे प्रतीकों के माध्यम से अमरीकी राष्ट्रपति की उस कूटनीति पर व्यंग्य किया गया है, जो मानवता का नाम लेकर युद्ध और तबाही को बढ़ावा देती है। 'वियतनाम से लेकर इराक' के उल्लेख से कविता को एक ऐतिहासिक और प्रामाणिक धरातल मिलता है।
  • ​शिल्प और भाषा-शैली: कविता की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। इसमें रोष, आक्रोश और क्रांति का स्वर है। 'बमों की बारिश' और 'मासूमों की चीखें' जैसे शब्द बिंब सीधे पाठक की चेतना को झकझोरते हैं।
  • ​मूल संदेश एवं उद्देश्य: "महाशक्ति का मुखौटा "कविता का मुख्य उद्देश्य महाशक्ति (USA) के दंभ को आईना दिखाना और यह चेताना है ,कि वास्तविक महाशक्ति वह नहीं जो विनाश करे, बल्कि वह है जो अपनी अकूत सामर्थ्य, धन और तकनीक का उपयोग विश्व-कल्याण, गरीबी मिटाने और वास्तविक शांति स्थापना में करे। महाशक्ति का कर्तव्य विश्व में विनाश फैलाना नहीं, बल्कि मानवता का संरक्षण करना है।

​"महाशक्ति का  मुखौटा "कविता अंतिम पंक्तियों में आशावादी दृष्टिकोण अपनाती है कि अंततः न्याय और जन-शक्ति की ही विजय होती है।

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www.jpsb.blogspot.com 
Author is a member of SWA Mumbai 
Copyright of poem is reserved 

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