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Saturday, August 8, 2026

लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur Chunav aayuk)t



लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur EC)
           A poem on election of India 
   
Loktantra aur chunav aayukt
Loktantra aur EC 
Image Created by:Meta AI 

जनता बेबस, लाचार खड़ी ताक,
अन्याय चुनाव का कब होगी बात,
वोट जनता का काटा,
संविधानिक अधिकार पर चांटा,
चुनाव आयोग का तानाशाही रुख ,
लोकतन्त्र पर गहराया संशय का साया,

विपक्ष की सुलगती चीखों में, 
जब गूँज रही थी एक ही पुकार,
ताक रही थी जनता न्याय का द्वार।
लोकतंत्र पर भारी है सरकार,
निष्पक्ष चुनाव पर प्रहार..

सुप्रीम कोर्ट में आस लिए,
जब पहुँची जनता,साथ विपक्ष था,
ख़ामोशी देखकर टूटने लगी उम्मीद,
"क्यों मौन है सर्वोच्च अदालत?" 
बेबस मन में सवाल असंख्य अधीर,
क्या होगी लोकतंत्र की तक़दीर ?

क्या वाकई हार गया लोकतंत्र?
क्या इतना गहरा है यह जाल?
​पर धैर्य की अग्नि में तपकर ही ,
न्याय में आयेगा अभूतपूर्व निखार,
अदालत का हर एक सँभला कदम,
एक गहरा विश्वास जगाता है..
सिहासन संभले जनसैलाब आता है !

सारे साक्ष्यों को तौल, 
 अंततः आया वह ऐतिहासिक हुक्मनामा,
 सत्य की विजय का बिगुल बजा,
 झुका सत्ता का हर झूठा ड्रामा,
 जनता ही मालिक है सत्ता ने माना !

निर्वाचन प्रणाली को साफ़ किया, 
निष्पक्षता को फिर से माँजा,
एक-एक अधिकार को बहाल कर, 
तोड़ा हर शंका का ताना बाना,
ये सपना है या सत्य पूर्व अनुमान! 

सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया,
वही है लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी,
जनता की आकाँक्षाएँ होती हैं यहाँ पूरी,
​मिट गया जन-मन का सारा संताप, 
खिल उठा जनतंत्र का चेहरा,विजय की छाप !

अदालत के न्यायोचित निर्णय से, 
विश्वास हुआ और भी गहरा।
जनता फिर से मुस्कुरा उठी,
मिला लोकतंत्र को नया जीवन,
हटा लोकतंत्र से बंदूक का पहरा,
जहाँ संविधान की सर्वोच्चता,
स्वयं सिद्ध है इस लिये तो,
भारतीय लोकतंत्र विश्व प्रसिद्ध है..!

🥀 Jpsb blog 🥀


यह भावपूर्ण कविता ​भारतीय लोकतंत्र,के लिये एक सपना देखती है चुनावी प्रक्रिया, जन-आकांक्षाओं और न्यायपालिका की भूमिका पर केंद्रित एक सशक्त साहित्यिक रचना है।और लोकतंत्र की जीत का यह सुनहरा सपना सत्य होगा पूर्ण विश्वास है. 

​कविता की विवेचना:-

​"लोकतंत्र और  चुनाव आयुक्त " Loktantra aur EC"को मुख्य रूप से तीन वैचारिक चरणों में बाँटा गया है:

1. ​आक्रोश और निराशा का चरण: शुरुआत में जनता की लाचार स्थिति, मताधिकार पर आघात और चुनाव प्रणाली में कथित पक्षपात को दर्शाया गया है। विपक्ष का विरोध और लोकतंत्र पर गहराते संकट का सजीव चित्रण कवि ने तीखे शब्दों में किया है।

2. ​संशय और धैर्य का चरण: दूसरे चरण में जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचता है, तो शुरुआती मौन और न्याय में विलंब से जनता के मन में निराशा और संशय उत्पन्न होता है। हालाँकि, कवि यहाँ धैर्य की आवश्यकता पर बल देता है और विश्वास जताता है कि अदालत का हर विचारणीय कदम न्याय की ओर ही बढ़ता है।

3. ​न्याय और विजय का चरण:- अंतिम चरण में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से सत्य की विजय होती है। निर्वाचन प्रणाली में सुधार होता है, जनता के अधिकारों की पुनर्स्थापना होती है और सत्ता को जन-शक्ति के आगे झुकना पड़ता है। 

अंततः संविधान की सर्वोच्चता और भारतीय लोकतंत्र की वैश्विक साख स्थापित होती है।

​कवि का उद्देश्य:-

​कवि का मुख्य उद्देश्य केवल राजनैतिक स्थिति पर कटाक्ष करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में जन-विश्वास को पुनर्स्थापित करना है।

• ​जन-चेतना जगाना: कवि पाठक को यह याद दिलाना चाहता है कि लोकतंत्र में असली मालिक 'जनता' ही है, कोई सत्ता या सरकार नहीं।

• ​संविधान और न्यायपालिका की महत्ता रेखांकित करना: कविता यह संदेश देती है कि कठिन से कठिन दौर में भी जब न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) अपने दायित्व का निर्वहन करती है, तो वह लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी के रूप में उभरती है।

• ​सकारात्मकता और धैर्य का संचार: संकट के समय तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन धैर्यपूर्वक न्याय की प्रतीक्षा करने से अंततः सत्य और निष्पक्षता की ही जीत होती है।

​संक्षेप में, "लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त "कविता निराशा के बाद मिलने वाले न्याय, संविधान की शक्ति और भारतीय जनतंत्र के अमिट अस्तित्व की एक सुंदर और प्रेरणादायक अभिव्यक्ति है।

कृपया कविता को पढे और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें,ताकि लोकतंत्र की हमेशा जीत सुनिश्चित करें. 

इति...

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Sunday, February 22, 2026

काले अंग्रेज (Kaale Angrej)

Kaale Angrej- Aazadi ki Politics
Kaale Angrej
Kaale Angrej 
Image Generate by AI

अंग्रेज यानि गोरे..
गिनती में थे थोड़े..
तब भी भारत पर..
राज कर गये..
भारतीय क्यों इनसे..
डर गये जीते जी मर गये..

भारत को अपना..
गुलाम बनाया..
हमारे लोगों द्वारा ही..
हम पर चाबुक चलाया..
कुछ ग़द्दार जो इनसे मिले..
भारतीयों पर अत्याचारों के..
जारी रहे सिलसिले..

क्या हम बुजदिल थे ..
या थे स्वार्थी निकम्मे..
कभी मुगल तो कभी अंग्रेज..
हमे झुकाते रहे..
हम पर हुकूम चलाते रहे..
हमारे देश पर अपना ..
परचम लहराते रहे ..

और हमने माना उन्हें..
अपना माई बाप..
अपने पर ही शासन करने में..
दिया उनका साथ..
गुलामी को गौरव माना..
अपने अन्दर के गद्दारों को..
नहीं पहचाना..

सालों लंबी गुलामी..
क्यों सही, क्यों कोई..
जिन्दा साँस ना रही..
गुलामी में सुविधा तलाश ली..
घुट्टी घुट्टी साँस ली..
यही हमारी आदत बनी..
जो अब भी जारी है..

कुछ बहादुर जागे भी थे..
राणा शिवा जी के..
मुगलों को खदेड़ने के..
पक्के इरादे थे..
मगर कुछ ग़द्दार..
जनता सोई रही बेख़बर..
तो बहादुरी भी रही बेअसर..

गुरु तेगबहादुर और..
गुरु गोबिंद सिंह ने..
वार दिया परिवार..
चार साहिब जादे..
माता गुज़री की शहीदी..
मुग़लों की कब्र की..
आखिरी कील थी..

उत्तर भारत में..
बंदा सिंह बहादुर ने..
मुगलों को सबक सिखाया था..
पंजाब में अपना ..
राज बनाया था..
मराठा राज शिवा जी ने..
भगवा फहराया था..

औरंगजेब महाराष्ट्र में..
डफन हुया, मुघल राज..
तभी खत्म हुआ..
किसी तरह मुगलों से..
पीछा छुटा तो..
अंग्रेजों ने गाड़ दीया खूँटा..
दो सौ साल फिर..
अंग्रेजों ने जमकर लूटा..

बुजदिली और थी गद्दारी..
अंग्रेजो की गुलामी स्वीकारी..
अपना गिरेबान अंग्रेजो को..
पेश किया, गुलाम फिर..
ये देश किया, जमीर क्यों..
सोता रहा, देश सिसक सिसक..
रोता रहा, हमारा तिरंगा..
यूनियन जैक का भार..
ढोता रहा, मान खोता रहा..

1857 में ग़ुलामी का..
एहसास हुआ हमारे..
हमारे वीरों को तब..
मंगल पांडे ने सेना में..
चिनगारी सुलगाई थी..
और वीरों के साथ..
झाँसी वाली रानी ने भी..
जान की बाजी लगायी थी..

एक बार फिर जोश से..
वीर भारतीय जागे थे..
करतार सिंह साराभा ने..
आज़ादी की अणख जगायी..
छोटी उम्र में शहीदी पायी..
फिर और वीर आये आगे..
सुभाष, चंद्रशेखर,भगत सिंह..
अंग्रेजों के आड़े आये..

भारत मा पर किया सर्व ..
कुर्बान,  बहादुरी से दी थी..
अपनी जान..
अंग्रेज इनकी बहादुरी देख..
डर से कापे थे..
तभी अपने बिस्तर बांधे थे..
आजाद ना किया भारत तो..
मारे जायेगे..
1947 को अंग्रेज भागे थे..

अंग्रेजो की गुलामी से 
मिली निजात..
फिर सुरू हो गई..
काले अंग्रेजो की बात..
आज़ादी चंद अमीरों..
और नेताओं को ही मिली..
आम आदमी गया ठगा ..
गुलाम ही रहा..

गोरे अंग्रेजो के हथकंडे..
काले अंग्रेजो ने बखूबी अपनाये..
फूट डालो राज करो..
एक अच्छा फंडा था..
पुलिस को जुल्म के अधिकार..
ऐसे ही चलेगी देसी सरकार..
लोकतन्त्र का झुनझुना..
जनता को थमाया..
तुम्हारा ही राज है बताया..

जनता झुनझुना बजा..
खुश होती रही..
अब अच्छा होगा अब अच्छा होगा..
बाँट जोहती रही..
अमीर और अमीर होते गये..
नेता अमीरी के बीज बोते गये..
मिल जुल् अपने हक के..
सब नियम बनाये..
जनता को पंच वर्षी ..
योजना में उलझाये..

आज तक जारी है..
वो ही कहानी पूरानी..
राजनीति,  सत्ता, चुनाव..
संसद में हंगामा..
मौज मस्ती पिकनिक..
जनता उम्मीद से..
बाट जोहती है..
अब कुछ अच्छा होगा..
रोज सोचती है..

गुलामी की जंजीरें..
जारी जारी हैं..
जनता राजनेताओ ..
से हारी है..
उनका है हक पे जोर..
जनता बेवस कमजोर ..
क्या करे बेचारी..
बेरोजगार गरीब..
भूख की लाचारी..
चारों ओर से गयी मारी..

हमारे साथ जो भी देश..
हुये आजाद..
हमसे कई गुना उनकी..
हालत अच्छी है आज..
अच्छी शिक्षा, अस्पताल..
अच्छा प्रशासन ,रोज़गार..
उन में देशों आई जैसे बहार..
सुनहरा है उनका संसार..
हम अंधकार में डूबे..
पता नहीं क्या सत्ता के मनसुबे..


क्या एक बार फिर..
गुलामी की तैयारी है..
पहिले इंग्लैण्ड के थे..
अब अमेरिका की बारी है..
क्यों कि हमारे भेदिओ की..
अमेरिका से यारी है..
अब गुलाम हुये तो..
फिर ना छूटेगे ..
सपने आजाद भारत के..
बुरी तरह टूटेगे ..


भगवान पर है..
जनता का पूरा भरोसा..
सुनहरा पल होगा कौनसा..
जब राम फिर अवतार लेगे..
एक एक अपराधी का..
हिसाब है उनके पास..
नरक बनाया है..
उनके लिये खास..
जन्मों जन्म सड़ना होगा..
खामियाजा अपराधों का..
भरना होगा..
 

माफी की गुंजाईश..
अभी भी बाक़ी है..
गलतियों का कर ले सुधार..
भगवान शायद हो जाये उदार..
देश और जनता की..
निस्वार्थ करें सेवा..
देश को विश्व का बेहतरीन..
देश बनाने का करें काम..
जैसे अमेरिका, चीन,जापान ..


भारत का भी होगा सम्मान..
अगर भ्रष्टाचार ख़त्म हो..
राजनीति से ऊपर उठ..
वतन का हो ध्यान..
पक्ष विपक्ष मिल करे काम ..
एक दूजे का सम्मान करें..
ईमानदारी से देश हित साधे..
गलत को गलत कहे..
भारत माता की मिल जय कहे..
भिन्न भाषा धर्म तब भी ..
सब भारतीय मित्र हैं..
इसी में हम सबका अस्तित्व है..!!


कविता की विवेचना:-

काले अंग्रेज/Kaale Angrej कविता आजादी के संजोये सपनों की टूटती दास्तान है. 
आजादी के दिवानों ने सोचा था, अंग्रेज जाएंगे तो हम अपने देश को दुनिया का सबसे अच्छा देश स्वर्ग बनायेंगे, देश का आखरी नागरिक भी संपन्न होगा, गरीबी का इस देश में नामों निशान ना होगा.
 
मगर सपना टूटा आजादी के बाद सत्ता गिने चुने अमीर और राजनेताओं ने हथिया ली, आम नागरिक को अलग कर सिर्फ अपने बारे में ही सोचा अपने लिये ही योजनाएँ बनायी. 

सत्ता पर कैसे काबिज रहना है  अंग्रेजों की नीतियां ही अपनायी, ब्लकि अंग्रेजों की राज करने की नीतियों का गहन अध्ययन किया. 
जैसे फूट डालो राज करो, शिक्षा को नाम मात्र की डिग्री तक रखो मगर क्लर्क से आगे का ज्ञान मत दो, पुलिस के अधिकार अंग्रेजो वाले ही रहने दो जो कि आम जनता को कुचलते हैं, चाहें पुलिस किसी को जान से मारे जो आज भी जारी है. 

देश की सारी सम्पदा पूंजीपतियों के हाथ रहें, पूंजीवाद को आज़ादी के बाद अपनाया गरीब का सारा हक खाया,  आज़ादी का गरीब को कोई लाभ नहीं मिला पहेले भी जलालत झेलता था आज भी झेलता है. 

जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सच होती नजर आती है, 
आपराधिक पर्वती के लोग राजनीति में पैठ जमा मंत्री बन रहे हैं.
मीडिया न्याय व्यवस्था, प्रशासन सब सत्ता पक्ष के पैरोकार हैं. 

अमेरिका जैसे अमीर देश अपना हुक्म मनवा रहे हैं और हम मजबूरी में मान भी रहें हैं, आज के AI जुग में हमारा सारा डिजिटल संसार अमेरिका पर निर्भर है, वह चाहें तो हमारी सारी व्यवस्था जब चाहें ठप्प कर दे,गूगल, फेस बुक, मेल, व्हॉट ऐप सब उनका है, कॉम्प्युटर ऑपरेटिंग सिस्टम उनका हैं, हमारा क्या है, अब तो हमारी रक्षा प्रणाली पर भी उनकी निगरानी है. 

"काले अंग्रेज " कविता भारत के आम जनता की विवशता दर्शाती है कि कि कैसे पहिले भी आम जनता गुलाम थी आज भी गुलाम है, गरीबी और जलालत की जिंदगी जीने को मजबूर उसकी आज़ादी अनंत काल के लिये हो गयी दूर. 

हा भारत की जनता का भगवान पर अटूट विश्वास है, एक दिन राम भगवान, कृष्ण भगवान जरूर आयेंगे बेइमानो भ्रस्टाचारियो को नर्क पहुचा कठोर सज़ा देंगे माफ़ी भी ना होगीं नसीब. 

भगवान आने से पहिले ही जमीर जाग जाये सब अच्छा हो जाये तों कितना अच्छा हो.

भारत खनिज सम्पदा, उपजाऊ भूमी, समुद्री तट से भरपुर सभी प्राकृतिक सम्पदा से लबालब देश है, ईमानदारी हो, भ्रस्टाचार ख़त्म हो जाये तो विश्व का नंबर 1 देश बनने से कोई नहीं रोक सकता.

सही नीतियां होती तो बन जाता था, चीन हमारे समकक्ष था हमसे सालों आगे जा चुका है, विश्व की मॅन्युफॅक्चरिंग हब बन गया है, अमरीका जैसे देश को आंख दिखाने की स्थिति में है, हम भी ज्यादा तर समान चीन का वापर रहें हैं. 

अब भी हम अंदरुनी राजनीति से निकल कर देश के लिये काम करें तो बहुत जल्दी आये हुये गैप को भर सकते हैं. आओ भगवान से सब मिलकर प्रार्थना करें और अपने देश को विकास की ओर ले जाये...सभी देश वासियों को हार्दिक शुभकामनाएं..!!

...इति..

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Thursday, April 20, 2023

सिखी (Sikhi)

Sikh         - धर्म की आजादी  - कविता      
Sikhi
Sikhi
Image from:pexels.com 


एक कौम होई ऐ सिखी..
जिहन्ना नु आजादी ना दिठी ..
सबने ऐश कौम नु सत्ताऱ्या ऐ..
अपना गुलाम बनाया ऐ..

जद कदी वी सिखी दे..
हक दी आवाज उठाई ऐ..
बदले विच सूली पाई ऐ..
वाहे गुरु जी तुहडा की भांडा ऐ ..
क्यों सिख हो के..
सिर्फ मर जाणा ऐ..

हर कोई सिख तौ ..
कुर्बानी मंगे..
ज़द वी हक दी गल आवे..
सूली ते टंगे..
गुरु जी दे लाल..
कंदा विच  चिडाये ..
सिख योद्धे..
चर्खडिया ते चडाये ..

क्यों सिखी च सिर्फ..
मरना लिखया ऐ..
भांवे भगत सिंह, उधम सिंह हो..
अते शहीद सराभा..
मर गये ये सिख बोल के..
जय भारत माता..

बदले विच सिखां नु..
पहला 47 च फ़िर ..
84 च चुन चुन कतळ किता..
देश दा बटवारा..
सिखां दी लासाँ ते किता..
देश कि ..
यह पंजाब दा बटवारा सी..

सिखां की पाया..
सारा कुछ गवाया ..
सिखां दे होम लैंड पंजाब नु..
चार टुकड़ियां विच वड दिता ..
सिखां दा स्वाभिमान..
खंड खण्ड किता..

सिख भारत विच..
दूजे दर्जे दे नागरिक हो रह गये..
सारा सिखा दा मान सम्मान..
बेज्जती विच बह गया..
सिख देश च..
चुटकला बन रह गया..

दशमेश पिता..
तेरी कौम ने क्यों किता समझोता..
जो अत्याचार मुगल कर रहे सन..
सिख स्वाभिमान लयी ..
लड रहे सन..
स्वाभिमान किथे रह गया बाकी..

सिखां दे धार्मिक निशान खो लय..
सिखां दे पहले पातशाह ..
बाबा नानक दे स्थान..
जो सीखीं लयी मक्का सन..
सिखां तो अँड कित्ते..
जिस तरह सिखां दे अंग वड दिते ..

ता वी सिख जिंदा ने..
अरदास विच आपणिया ..
भावनावश दस..
आपने आप तो शर्मिन्दा ने..
होली होली सिखी स्वरूप..
लोप हो रिहा ऐ..
कोण ऐ जो सीखी दी..
हालत ते रो रिहा ऐ..

सीखी दी हून पहचान की..
मन मसोस बैठ..
होर ग़म दे अश्रू पी..
सिख अनमना जिहा ..
जी रिहा ऐ..
वाहेगुरु तेरा भाणा साचा लागे..
कह अपने आप नु..
तसली दे रिहा ऐ..

अज सरकार विच..
सिख दा कोई नुमाइंदा नहीं..
सिखा नु गुंठे ला सडीया ऐ..
ज़द वी कोई मंग मंगे..
84 दे हसर द डर दिखोदे ने..
सिखा नु बदनाम कर..
खून दे अश्रू रुलादे ने..
राज नेता वी सिखा ते..
वार करण तो बाज नहीं ओदे ..

ता वी सिखी तेरे ते नाज़ ऐ..
सिखी सच दी आवाज़ ऐ..
सिखा दिया कुर्बानीया ..
एक दिन रंग दीखोंण गिया..
सिखा नु बुलन्दिया ते..
जरूर पहचोंण गिया..!!

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कविता दी विवेचना:

सिखी/Sikhi कविता सिखा दे कुर्बानी दे इतिहास होर भारत नू आजाद करन लयी दितीया सिख कौम दिया कुर्बानिया नू underline करके लिखी गई है. 

कुर्बानिया दे बदले सिखी नू की मिलिया ऐ, देश विच दूजे दर्जे दे नागरिक दी हेसीयत .सिख नु चुटकला बना छडीया ऐ, पंजाब दे चार तोटे कीते, 1947 ते 1984 ते सीखा दा कळलेआम होया .

किसे नु सज़ा नहीं होई, जद की सब  नू पता ऐ कातळ कोन ने, होली होली  सिखा दा सिख स्वरुप गायब हो रिहा ऐ. 

सिखा दे पवित्र स्थान सिखा तो खो के पाकिस्तान नू
 दीते जो कि नही सी होना चाहिदा ,ननकाना साहिब, पंजा साहिब, करतारपूर  साहिब सिखा कोल होणे 
चाहीदे सन जो कि नही हन .

सिखा नू न्याय कद मिलेगा पता नहीं, या कदी मिलेगा 
कि नही,मुघल काल तो आज तक सिखा तो कुर्बानीया  ही मगीया जा रहीया ने.

सिखा नु सतया जा रिहा ऐ, मजबूर हो  अपनी पहचान लुकोण लग पये ने. 

कि सिखी स्वरुप  नु हमेसा लयी गायब करण दी साज़िश ऐ. सिखी बहुत बुरे दौर तौ गुजर रही ऐ  कोण ऐ सिखी दी इस हालत ते रोन वाला. 

सचे पातशाह वाहेगुरु यह किसतरह दा तुहडाॅ भाडय़ा ऐ. वाहेगुरु मेहर बखसे ,तेरा भाना साचा लागे. 

वाहेगुरु जी दा खालसा ,वाहेगुरु जी की फतेह !

...अधूरी दास्तान  ...

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Tuesday, August 9, 2022

गरीब की आजादी (Garib ki aajadi)

गरीब आजादी-समाजिक असमानता-कविता 
Garib ki aajadi
Garib ki aajadi
Image from:pexels.com 


गरीब को मिलेगी..
कब आजादी..
जो है सदियों से..
गुलामी का आदी..
अंग्रेज चले गये..
उसकी जगह..
पूंजी पति आ गये..
गरीब की..
दाल रोटी खा गये..

किया अमीरों ने..
बहुत शोध..
क्या ज़रूरी है..
गरीब को जीने के लिये..
की उसकी खोज..
दाल, प्याज, नमक..
चटनी रोटी..
बाजरी रोटी..
मक्के की रोटी..
सारी रोटियां..
गरीब से हथिया ली..

यह सत्य है कटू..
गरीब के लिये..
ना छोड़ा सत्तू..
गरीब की खाने की..
एक एक वस्तू..
पूंजी पति के है ..
मुनाफे की वस्तू..

अभी भी नज़र है..
गरीब की..
हर एक छह पर..
गरीब जिंदा है..
क्यों कर..
जीएसटी की छुरी..
तेज की..
गरीब के पेट में..
घोंप दी..

आटा दाल चावल..
दूध दही..
भी गरीब खाता है..
जैसे ही..
पूंजी पति..
इसका पता लगाता है..
यह सब भी..
गरीब की पहुच से..
अचानक दूर हो जाता है..

एक एक कर..
गरीब से..
हर चीज़ छीनेगे..
गरीब कचरे से..
खाना बिनेगे ..
उस पर भी..
लग जायेगी जीएसटी..
कमाएगा व्यापारी..
गरीब को मारने की..
है पूरी तैयारी..

गरीब की खाल के..
जल्द ही..
जुते मिलेंगे..
गरीब के शरीर को..
जलाना दफनाना ..
गुनाह होगा..
शरीर नीलाम होगा..
उसे लगेगी जीएसटी..
यह देश है..
पूजी पतियों की बस्ती..

गरीब भेड़ बकरी..
गाय भैंस की..
तरह बिकेगा..
नोच नोच कर..
गरीब की बोटी बोटी..
पूजी पति कमायेंगे..
एक रकम मोटी..

ये नेता अभिनेता ..
चाहते हैं..
गरीब को चारों ओर से..
घेर घेर कर मारे..
चूस ले..
गरीब के खून का..
कतरा कतरा..
पूजी पतियों को..
लगता है गरीब है..
उनकी अमीरी के लिए..
बहुत बड़ा खतरा..!! 

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कविता की विवेचना: 

गरीब की आजादी/Garib ki Aajadi कविता आजादी की  75 वी वर्ष गांठ पर गरीब को भी क्या आजादी का लाभ मिला की समीक्षा है. 

अंग्रेज चले गये कहने को भारत स्वतंत्र हुआ और इसका लाभ चंद पूंजी पतियों तक सीमित रह गया, गरीब पूर्ववत गरीब ही रहा. 

लोकतंत्र में गरीब मात्र एक वोट बँक बनकर रह गया, पूंजी पतियों ने चतुरता से राजनीतिक गिरोह बनाये जिनका नाम राजनैतिक पार्टी रखा.

चतुरता से इन तथा कथित गिरोहों को संविधान की परिभाषा में बिठाया और लोकतंत्र के नाम राजा बन बैठे और भोली भाळी गरीब जनता को झूठे सपने दिखा जी भर कर लूटा. 

महात्मा गांधी, नेताजी, भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद के आजादी के सपने को तोड़ कर स्वाहा कर दिया गया, उनका सपना था आजादी का लाभ गरीब से गरीब देश वासी तक पहुंचेंगा .

सभी ख़ुशहाल होंगे अच्छी शिक्षा स्वास्थ्य लाभ अच्छा जीवन यापन सभी को समान रूप से वितरित होगा मगर हुआ उलट, शिक्षा स्वास्थ्य गरीब से कोसों दूर हो गई, शिक्षा स्वास्थ्य तो दूर रोजी रोटी तक गरीब की पहुच से दूर कर दी गई. 

"गरीब की आजादी "कविता इंगित करती है कि गरीब के लिये तो आजादी आई ही नहीं, आजादी दिलाने वाले अपनी जान की आहुति देकर चले गये, मगर उनकी कुर्बानी साकार ना हुयी क्या उन शहीदों की आत्मा चैन से होगी. 
किसने किया यह धोखा अभी भी है मौका गरीब को भी आजादी का हक दो गरीब को आजाद कर दो. 

...इति  ..

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Tuesday, June 28, 2022

जान की कीमत (Jaan ki kimat)

जान कीमत  - अग्नि वीर-कविता        
Jaan ki kimat
Jaan ki kimat 
Image from:pexels.com 

आबादी है बढ़ी हुयी..
खाना कम,खाने वाले ज्यादा..
नौकरियां कम, चाहने वाले ज्यादा..
इतनी ज्यादा जनसंख्या में..
क्या करेगा किसी का वायदा..

राजनेताओ को अपना..
रोजगार बनाये रखने के लिये..
करना ही होगा झूठा वायदा..
मजबूरी है..
वर्ना जनता को रोजगार..
दे नहीं पा रहे..
अपना रोजगार भी  गावायंगे ..

नेताओ का दोष नहीं है..
उनका भी हक है..
रोजगार पाने का..
कोई ठेका तो नहीं लिया..
वायदा निभाने का..

तुम्हें भी ऐसा रोजगार चाहिये..
तो तुम भी नेता बन जाओ..
ना पढ़ाई ना उम्र की सीमा..
फ्री कई सुविधाएं और ता उम्र बीमा..
चाहे जितना झूठ बोलो..
और धन कमाओ..

तुमको किसने रोका है..
माना राजनीति एक धोखा है..
मगर इसी में आज के समय..
रोजगार पाने का मौका है..

आबादी ज्यादा रोजगार कम..
सप्लाय डिमांड के सिद्धांत से..
जान की कीमत भी होगी कम ..
जान जोखिम की कीमत..
दस लाख,सस्ती है जिंदगी..

सेना की चिंता ना करे..
अब आम जनता..
अब सेना भी पूंजीपति संभालेंगे..
फौजिया से जान का सौदा..
कोई बड़ा नहीं है मसौदा..

अगर युद्ध हुआ तो..
दुश्मन के सैनिक को भी..
खरीदा जायेगा..
जीत सुनिश्चित करने के लिये..
उचित मुआवजा दिया जायेगा..

पहले भी तो हमने..
सेना का खर्च कम किया था..
चीन को अक्साई चीन दिया था..
तब भी हमने..
अपनी पीठ थपथपाई थी..
एक बंजर जमीन थी..
जो हारी हुई जीत के..
बदले गंवाई थी..

अब भी हम कोई रास्ता..
निकाल ही लेंगे..
बंजर जमीन बहुत है पडी..
उसे किसी जीत पर वार ही देंगे ..

भारत संयुक्त परिवार है..
खाने वाले ज्यादा कमाई कम..
तो मुखिया को पूरा अधिकार है..
कि खर्च कम करे..
और सबका समान रूप से..
पालन पोषण करे..

मुखिया के कुछ लाडले बेटे हैं..
जो गरीब देश में..
विलासिता के महलों में लेटे हैं..
परिवार के कुछ सदस्य..
कर रहे अति मौज..
और ज्यादातर कर रहे..
रोजी रोटी की खोज..

उन्हें रोटी का टुकड़ा दिखा..
ललचाया जाता है..
फिर मनचाहा काम कराया जाता है..
देश की जनता को..
वफादार कुकुर बना दिया गया है..
कितना सक्षम प्रशासन है..
जो अंग्रेज मुगल नहीं कर पाये थे..
अब आसानी से हो रहा है..

प्रजा गुलामी का पट्टा..
खुशी से स्वीकार रही है..
कितना भी रोदे जाने पर..
जय जय पुकार रही है..

धार्मिक उन्माद रोजी रोटी..
पर भारी है..
कुछ लोग चख रहे हैं..
सत्ता का स्वाद..
आम जनता है अपवाद..
वो गरीबी बेरोजगारी महंगाई से..
जुझ रही है..
गरीब गरीबी रेखा के दबाव से..
बेमौत मर रहा है..

हमारे परिवार का मुखिया..
बहुत मेहनत कर रहा है..
परिवार के कुछ सदस्यों को..
अमीर कर रहा है..

अमीर बड़े भाई हैं..
अमीर हो कर अपने ..
अपने गरीब भाई बहनो को..
पालेंगे..
और जो नालायक, कामचोर हैं..
उन्हें देश से निकालेंगे..

तो अमीर बड़े  भाइयों की..
गरीब करे  तिमांनदारी ..
परिवार के मुखिया के उदेश्य में है..
पूरी ईमानदारी..

तो परिवार के मुखिया का..
पुरजोर साथ  दो..
उसे उम्र भर  मुखिया..
बने रहने  के लिए आवाज़ दो..

मुखिया में ही परिवार का हित है..
जो करते हैं शंका उनका मिथ है..!!

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कविता की विवेचना: 

जान की कीमत/ Jaan ki kimat कविता भारत की बढ़ी हुई जनसंख्या और उसमे बेरोजगार युवाओं की बहुत ज्यादा तादाद.

नौकरिया बहुत ही कम नोकरी चाहने वाले ज्यादा, डिमांड सप्लाय के सिधांत अनुसार नोकरी चाहने वालों की कीमत कम हो जाएगी.

 कीमत यांनी उनकी सैलरी और नौकरी में मिलने वाली अन्य सुविधाएँ जैसे पेंशन, कार्य अवधि और भी अन्य सुविधाएँ कम हो जायेंगी यांनी घट जायेंगी. 

इस बढ़ी आबादी के कारण प्रशासन को मजबूर होना पडा कि सेना जैसे अति मह्त्वपूर्ण आधारे के साथ छेड छाड़ करनी पडी.

 युद्ध और देश की सुरक्षा के लिये देश को सेना चाहिये मगर देश का बजट कम है तो यहां बहुत ज्यादा बेरोजगारी को अवसर के रूप में देखा गया कि बेरोजगार युवाओं के समक्ष एक अनोखा सेना में नौकरी का प्रस्ताव रखा गया जिसमें पैसे भी बचे और कुछ समय के लिए रोजगार भी उपलब्ध हो जाये और बाद में भी कोई जुमेवारी जैसे पेंशन ना रहे. 

अगर देश की जनता से विचारा जाये तो जनता देश की सेना के लिये और महंगाई सह लेगी.

पहले भी नेताओ की  एक से अधिक पेंशन और अन्य खर्च जनता सहन कर रही है.

तो सैनिक क्यो नहीं जो हर समय देश पर अपनी कुर्बानी देने को तैयार हैं.

सेना कर लगा कर सेना के बजट को बढ़ाया जाए मगर सैनिक की सुविधाएं कम ना की जाये. 

मगर इसमें सेना का गौरव, शक्ति,  कुर्बानी का ज़ज्बा और मनोबल कम होगा क्यों नहीं सोचा गया .

सेना की नौकरी सैनिक से जान की कुर्बानी का वायदा मांगती है और सैनिक इस बात को स्विकार कर ही सेना में आता है.

अब उस सैनिक की जान की कीमत को कमतर क्यो आंका गया यह सैनिक और उसके देश प्रेम के जज्बे का अपमान है. 

ऐसे प्रयोग सामान्य कई विभाग हैं उनमे किये जा सकते है ऑलरेडी शिक्षा सेवक, आगन वाडी ,मनरेगा, होम  गार्ड आदि में पैसे बचाने की योजनाएं चल ही रही हैं.

 इन सेवाओं की गुणवत्ता कैसी है सबको भली भांति ज्ञात है, फिर भी ऐसी सेवाओं का सेना में प्रयोग करना देश की सुरक्षा के साथ बहुत बड़ा जोखिम है, इस पर पुनर्विचार किया जाना अति आवश्यक है. 

आशा है देश प्रेमी राष्ट्रवादी प्रशासन अवश्य इस ओर ध्यान देगा और देश की सेनाओं को और गौरवसाली और सशक्त बनायेगा. 

"जान की कीमत " कविता में जान की बाजी लगाने वाली सेवा में कीमत कमतर क्यों आंकी गई कोरेखांकित किया गया है.

यही बेरोजगार इतने ज्यादा ना होते और जनसंख्या सीमित होती तो शायद ऐसा ना होता, जो सेना की सेवा में क्रीम प्रतिभा आती थी उनको सेना से विमुख किया गया है.

अब मजबूरी में सेना में युवक आयेंगे, क्यों सेना को सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा नहीं चाहिये. 

कृपया कविता को पढे और शेयर करें. 

...इति...
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Sunday, May 22, 2022

कमर तोड़ महंगाई(Kamar tod mahngai)

महगाई   - भारत की समस्या- कविता        
Kamar tod mahgai
Kamar tod mahgai 
Image from:pexels.com 

अगर जिंदा रहना है तो..
घर का हर सदस्य करे..
अपने हिस्से की कमाई..
वर्ना ना पूछेंगे बच्चे और..
ना पूछेगी लुगायी ..
उनका भी दोष नहीं..
कमर तोड़ हो गई महंगाई..

सेवानिवृत्त हो कर दिमाग..
हो गया है शून्य..
अब चाहिये ख़र्चे के लिये पैसे ..
हर समय पैसे कमाने की धुन..
कमाई के मामले में..
कोई सुनवाई नहीं है..
सरकार या किसी और से..
कोई  आश मत पालो..
करो  खुद कड़ी मेहनत..
और पैसे कमा लो..

कुदाल लेकर मेहनत से..
जो मिट्टी खोदनी है ,खोद डालो..
बुढ़ापे का बहाना ना करो..
बिल्कुल नहीं चलेगा..
जब तक तू  जिंदा है..
सिर्फ काम ही करेगा..
वैसे काम ही पूजा है..
काम ईश्वर का नाम दूजा है..
काम से है बरकत..
साथ ही हो जाती है कसरत..

कसरत से स्वास्थ्य भी..
अच्छा रहता है, बुढ़ापे में भी..
मन बच्चा रहता है..
स्वाभिमान सम्मान..
बना रहता है ..
तो क्या महंगाई ..
जारी रहनी चाहिए..
क्या महंगाई..
स्वास्थ्य के लिए अच्छी है..
महंगाई से निपटने के लिये..
कमाई की दूसरी पारी..
शुरू कर दे मेरे भाई..
अगर तुमने सेवा से..
अभी अभी निवृति पायी..
इसके फायदे ही हैं..
नुकसान नहीं है..

महंगाई से करो लड़ाई..
मजा मस्ती आराम हराम है..
महंगाई से जीत का एक ही..
औज़ार, और वो काम है..
तो करो काम..
अब बहाना कैसा..
खूब कमाओ पैसा..
निरंतर काम जारी..
रहना चाहिये..
क्यों कि तुम्हें जीना है..
जहर जिंदगी का पीना है..
ज़हर भी हो गया महंगा है..

इस महगाई में मरना भी..
बहुत बड़ा पंगा है..
कफन ज़हर के लिये..
भी चाहिये पैसा ..
फिर ऐसा महंगा..
मरना कैसा..
तो चलो काम करो..
बेरोज़गारी का..
कोई समाधान करो ..
सरकारी सहारा छोड़ो..
दृढ़ निश्चय से उम्मीदें जोड़ों..
मेहनतकस की कभी..
हार नहीं होती..
मिल ही जाती है..
सफलता की कोई ज्योति..


तुम्हारा पसीना..
बहुत किमती है ..
जहाँ गिरेगा बनेगा..
एक अमूल्य मोती..
महंगाई तो जब से..
होश संभाला है ..
बढ़ती ही आयी है..
कोई  भी सरकार..
इसे रोक ना पायी है..
अमीरों पर नहीं होता..
इसका कोई असर ..
बल्कि चीजें महंगे होने पर..
उन्हें होता है फ़क्र ..


मरता है सिर्फ़ गरीब..
और मध्यम वर्गीय..
खर्चों में कटौती..
गरीब की तो कट जाती है..
आधी रोटी, दाल सब्जी..
कभी भूखे ही होता है सोना..
भले ही कितना भी..
कठिन काम करो ना ..
पैसे कम होते हैं..
गरीब ठेला खिंच..
रिक्शा चला, रोड बना..
आधे पेट ही सोते हैं..


कौन सुनेगा गरीब की पुकार..
गरीब के लिये तो है..
अंधी बहरी हर सरकार..
उनका तो भगवान ही ..
एक मात्र सहारा है..
गरीबो ने भगवान को ..
ही पुकारा है ..
भगवान ने पुकार सुन ली है..
अचानक प्रकट होने की..
भविष्य वाणी की है..
महंगाई बढ़ाने वाले..
अत्याचारी सम्भले तो ठीक है..
वर्ना इनकी ईश्वर द्वारा छुट्टी है..!!


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कविता की विवेचना: 

कमर तोड़ महंगाई/Kamar tod mahgai कविता अनंत की तरह बढ़ती महंगाई पर है, इस महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है. 

महंगाई अंतहीन है या अनंत है जब से होश संभाला है, महंगाई की गाथा सुनते आये हैं, महंगाई के नाम पर सरकार बदल जाती है. 

सत्ता में आते ही नयी  सरकार मंहगाई और बढ़ाती है, एक नया रिकार्ड बनता है, जैसे कि अब पेट्रोल डिझेल और  खाद्य पदार्थों का बना है. 

कोई भी सरकार आखिर इतने वर्षों से  महंगाई को क्यों नहीं रोक पायी, अमीर जरूर दिन दोगुनी रात चौगुनी गति से आगे बढ़ रहे हैं और अमीर होते जा  रहें हैं और गरीब और  भी गरीब होते जा रहें हैं.

देश की कुल पूंजी का ज्यादातर पैसा अमीरों के पास चला गया है. लोकतंत्र में भी एक तरह से अमीर राजा और गरीब निरीह प्रजा के रूप मे परावर्तित हो रहें हैं. 

कहां दोष रह गया है लोकतंत्र को लागू करने में कि लोकतंत्र कथित हो कर रह गया है. लोकतंत्र को प्रभाव शाली लोगों ने अपनी लाभ की सुविधा अनुसार लागू कर लिया है. 

लोकतांत्रिक सारे नियम काग़ज़ में लगते हैं कि निभाये जा रहें हैं मगर वो चमत्कारी रूप से सिर्फ अमीर की मदत कर रहें हैं, गरीब पिस रहा है या ठगा सा ख़ुद को पा रहा है.

जब से देश आजाद हुआ है, गरीब ने उम्मीद पाल रखी है कि आजादी का आंशिक लाभ उसे भी मिलेगा, इस उम्मीद में हर चुनाव में वो बहुत बड़ी भीड़ बन के जाता है नेताओ के भाषण सुनने वादे सुनने फिर अपना वोट देता है.

और उम्मीद करता है कि अबकी बार की आयी सरकार उसका भाग्य बदल ही देगी मगर कुछ भी चमत्कार नहीं होता, यही सिलसिला देश की आजादी से आज तक चलता आ रहा है, आगे भी चलता रहेगा किसी को पता नहीं कि गरीब की आशा कब पूरी होगी, कब राम राज्य आयेगा. 

"कमर तोड़ महंगाई "कविता इस अंतहीन महंगाई पर लिखी गई जो कभी भी कम नहीं हुयी  बढ़ती का नाम दाड़ी की तर्ज़ पर  बढ़ती का नाम महंगाई. 

अमीरों ने काट खाई महंगाई की कमाई, प्रभावित हुआ सिर्फ गरीब और मद्धम वर्ग. यह बढती महंगाई कैसे रुकेगी किसी को पता नहीं, जिनको पता है उनकी क्या मजबूरी है कि इसे रोक नहीं पा रहे या क्यों रोकना नहीं चाहते. 

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Sunday, March 27, 2022

काश्मीर फाइल न्याय को आवाज़ (Kashmir file nyay ko aawaz)

                
Kashmir file nyay ko aawaz
Kashmir file nyay ko aawaz
Image from: pexels.com

लहू  का कतरा कतरा बहा..
कश्मीरी पंडितों के खून का..
उग गया एक पौधा नया..
आजादी के जनूंन का..

अपने ही वतन में..
खानाबदोश किया ..
किन किन लोगों ने..
कश्मीरी पण्डितों का..
खून किया..
उजागर हुआ यह..
वर्षों बाद  जाकर..

राजनीति इतनी स्वार्थी हो गई है..
कि चल रही है..
अपने ही हमवतनों को मरवा कर..
रोशन चेहरे स्याह हुए..
जो कई वर्षो तक थे राज लिए..

भारत  के गुलस्थान के..
रंग  बिरंगे फूल..
क्या  बिखर जाएंगे गुलदस्ते से..
बागवान ही क्यों उजाड रहे..
अपने ही सुन्दर बगीचे  को..

कश्मीरी  पंडितों ने बहुत कुछ  सहा..
पर किसी से कुछ ना कहा..
चुपचाप चल दिये फिर जिंदगी की..
जद्दोजहद से लड़ने..
अपने ही वतन में बेघर होकर..
फिर से खडे होने की कोशिश करने.. 

सफल भी हुए हम कश्मीरी पंडित..
जिंदगी लग गए फिर से जीने..
मगर जख्म हरे हैं अभी भी..
नासूर बन कर चुभते हैं..
हम अपनी जन्म भूमि से प्यार करते हैं..
   
छीन लिया कुछ लोगों ने हमसे..
अपनी मातृ भूमि को चूमने का अधिकार..
आंसू बनके छळक रहा है हमारा..
अपनी जन्म भूमि से प्यार..
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है..
न्याय होना है जरूर इसी धरा पर..

गुनाहगारों को सजा होगी ही..
भगवान का भेजा फरिश्ता आएगा ही..
हमे  भी आशा का दीया..
जलता हुआ दिख रहा है..
जो अवश्य सूर्य सा चमकेगा एक दिन..
कश्मीर सूना सुना है..
कश्मीरी पंडितों के बिन..

लौटेंगे हम अपने प्यारे आशिया में..
भटके हैं बहुत इधर उधर..
जैसे आश का पक्षी असमान में..
मुकाम हमारा  कश्मीर..
प्यार हमारा कश्मीर..
जान हमारा कश्मीर..
कश्मीर की रूह हैं हम..
कश्मीरी पंडित, कश्मीर को हम फिर..
जिंदादिल करेंगे, वहाँ जाकर..!! 

_Jpsb 

कविता की विवेचना: 

कश्मीर फाइल न्याय को आवाज/Kashmir file nyay ko aawaz कविता कश्मीरी पंडितों पर 32 वर्ष पूर्व हुए अत्याचार पर एक फिल्म चर्चा में है.

फिल्म कश्मीरी पंडितों  पर हुए  अत्याचारों पर प्रकाश डालती है और कई सत्य घटनाओं को दर्शाकर कश्मीरी  पंडितों के दर्द को उजागर करती है.

उस समय के राजनीतिक पैरोकारों का चरित्र चित्रण  भी करती है कि  कैसे  अपने राजनीतिक  स्वार्थों के लिए लोगों को उनके हाल  पर छोड़ दिया जाता है. 
चाहे देश का नुकसान हो और लोग मौत के मुह में  चले जाए. 

देश में ऐसा अक्सर होता है और गुनहगारों  का कुछ नहीं होता, चाहे वो 1947 के  दंगे हो, गोधरा हो या 1984 का सिख समुदाय का कत्लेआम हो. सबको सब पता है मगर किसको सजा है.

जब कोई सजा नहीं होती तो एक तरह से गुनहगारों को मंजूरी मिल जाती है और अगली बार वो और ज्यादा अत्याचार करते हैं, कौन हैं ये लोग और कौन रोकेगा इन्हें. 

अब तो हम आजाद हैं किसी को दोष भी नहीं दे सकते
हमारे अपने ही हम पर जुल्म कर रहें हैं, वो भी मौत की हद तक जाकर, यह तो अराजकता है. 

"कश्मीर फाइल न्याय को आवाज " कविता कश्मीरी  पंडितों के  न्याय के लिए आवाज बनकर आयी फिल्म "कश्मीर फाइलस" का आभार व्यक्त करती है जो कि कश्मीरी हिन्दुओं के लिए भगवान का फरिश्ता बनकर आई  है.स्वागत है ऐसी अन्याय के खिलाफ कोशिश के लिए. 

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...इति...
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