Friday, August 21, 2026

ये कैसा रिश्ता (Ye kaisa rishta)

ये कैसा रिश्ता 
भारतीय बेटी के बाबुल से रिश्ते पर कविता 
Ye kaisa rishta
Ye kaisa rishta 
Image Created by GemineAI 

बेटी जो है..
दिल का टुकड़ा..
चाँद सा उसका मुखडा..
चिड़िया सी चहचहाये ..
सब का मन लुभाये ..

बेटी जवान हुयी..
घर की आन बान शान हुयी..
शादी के रिश्ते..
आने लगे-कोई जचे..
कोई ना जचे -लडका देखने..
के ही परिवार में चर्चे..

पराये धन की कहावत..
बेटी को अक्सर..
बाबुल सुनाने लगे..
जो बहुत अपने से थे..
अब अनजाने लगे..
बेटी से पीछा लगे ऐसा..
घर वाले छुड़ाने लगे..

मात-पिता भाई-बहन..
की प्यारी थी..
सबकी राज दुलारी थी..
सीने से लगा..
माँ ने नाजो से पाला था..
अब क्यों दे रहे..
देश निकाला सा..

एक अनजान सा इंसान..
सब बोले..
अब यही है तेरा भगवान..
इसकी ही तू अपनी है ..
अब इसकी पत्नी है..
हम हुये पराये..
बेटी पराया धन ..
अपने घर जाये..

बचपन से जवानी तक..
मुझे सहेजा था..
मैं थी बाबुल का कलेजा सा..
किसी पराये की नजर..
कोई अनजाना स्पर्श..
लगा था जहर सा..
बुरी नजर कई बार उतारी थी..

अब एक अनजाने के हवाले..
जो हर तरह मुझे छुएगा..
मेरा मन हो ना हो..
मुझे खुश होना होगा..
उसके साथ सोना होगा..
उसकी सेवा मेरा बनाया फर्ज ..
जैसे पिछले जन्म का कर्ज..

मात -पिता अचानक ..
बदल गये मेरे..
आ गये नये मम्मी-पापा ..
यही है सास-ससुर का नाता..
मैं पतझड़ का बनी पत्ता..
जो अपनी साख से टूटा..
ना जाने कहाँ गिरेगा..
और क्या होगी उसकी दशा..

यही रीत बेटियों के लिये..
सदियों से चली आयी..
मेरी माँ भी..
किसी साख का पत्ता थी..
पिता के ..
परिवार का हिस्सा बनी ..
उसकी माँ से वो टूटी..
इसे कहते हैं गृहस्थी..

मैं भी अपनी बेटी को..
बहुत लाड प्यार कर..
चिड़िया सा पाळूगी ..
फिर जवान होने पर..
समझा बुझा..
घोंसले से निकालूँगी ..
चंद आँसू होंगे उसके..
और मेरे भी..

यही रीत है पुरानी..
हर बेटी की यही कहानी..
अच्छी है या बुरी है..
मगर रीत प्रेम से जुड़ी है..
गर मात-पिता ने..
रीत ना निभाई..
तो प्रेम लेता है अंगड़ाई..

फिर लैला-मजनू..
शिरी-फरहाद ;हीर- राझा..
पैदा होते हैं..
दोनों ही प्रेम में मरते..
मात-पिता रोते हैं..
भावनाओं की नदी बही हैं..
बाबुल के प्यार के बीच..
प्रेमी का प्यार भी सही है..

कभी कभी बेटी..
बाबुल के घर आयेगी..
लगेगी परायी सी..
उसे मेहमान सा एहसास..
कराया जाएगा..
एक औपचारिकता का रिश्ता..
निभाया जायेगा..
वो बेचारी ठगी सी..
 बाबुल को ताकेगी ..
बाबुल की खुशी के लिये..
अपना मुँह सी लेगी..

दर्द चाहे जितना हो भरा.. 
कृत्रिम मुस्कान..
मुँह पर ला..
अच्छी हूँ पापा कह देगी..
बाबुल एहसास करायेगा..
घर अब वही है तेरा..
वही तेरा परिवार..
वहीँ तेरा साँझ सवेरा..

इस अनोखे रिश्ते को..
सारी दुनिया ने माना है..
संसार को एक करने बाना है..
बेटी तुम भी मान लो..
यही संसार है..
रिश्तों का व्यवहार है..
खुश रहो तुम सदा..
यही है बाबुल की दुआ..!!

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कविता की विवेचना:-

​"ये कैसा रिश्ता" ( Ye kaisa rishta)  कविता भारतीय समाज में बेटी के जन्म से लेकर उसकी विदाई और विवाह के बाद के जीवन की एक कड़वी, संवेदनशील और व्यावहारिक वास्तविकता को उजागर करती है।

​कविता की शुरुआत में बेटी का अपने मायके में बचपन, उसका प्यार और लाड-प्यार दर्शाया गया है। लेकिन जैसे ही वह बड़ी होती है, "पराया धन" जैसी सदियों पुरानी कहावतें उसके अपने ही घर में बेगानापन घोल देती हैं। 

कवि ने इस मानसिक द्वंद्व को बेहद स्पष्टता से उकेरा है कि जिस बेटी को जीवन भर हर अनजान स्पर्श और बुरी नजर से बचाया गया, विवाह के नाम पर वही बेटी अचानक एक अजनबी को सौंप दी जाती है।

​कविता शाख से टूटे पत्ते के रूप में स्त्री की विवशता को दर्शाती है, जिसे हर स्थिति में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। आगे चलकर यह सामाजिक रीतियों और मानवीय भावनाओं (प्रेम) के बीच के संतुलन को भी रेखांकित करती है। 

यदि समाज परंपरा और प्रेम के बीच तालमेल न बिठाए, तो यह सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाता है।

 अंत में, मायके में मेहमान बन जाने का दर्द और चेहरे पर झूठी मुस्कान रखकर "सब ठीक है" कहने की नियति, भारतीय नारी के त्याग को बखूबी बयान करती है।

​कवि का उद्देश्य:-

​"ये कैसा रिश्ता" कविता के माध्यम से कवि का मुख्य उद्देश्य स्त्री जीवन के उस सबसे बड़े दर्द और विरोधाभास को सामने लाना है, जिसे समाज प्रायः "परंपरा" का नाम देकर अनदेखा कर देता है।

​कवि पाठक को यह सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं कि कैसे एक ही पल में अपने ही माता-पिता और घर बेगाने हो जाते हैं।

 कवि समाज की इस दोहरी मानसिकता पर सवाल उठाते हैं कि जो बेटी कभी "दिल का टुकड़ा" थी, वह अचानक "पराया धन" कैसे बन जाती है।

 इसके साथ ही, कवि परंपराओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक संतुलन की पैरवी करते हैं, ताकि वैवाहिक रीतियाँ केवल एक औपचारिकता न बनकर प्रेम और सम्मान का आधार बनें। 

अंततः "ये कैसा रिश्ता"कविता कवि का ध्येय स्त्री के त्याग, उसके मानसिक संघर्ष और एक नए जीवन में ढलने की उसकी अद्भुत क्षमता को सम्मान देना है।बेटियां समाज की आन बान शान हैं, त्याग बलिदान की प्रतिमूर्ति हैं. 

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....इति 

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Sunday, August 16, 2026

प्यार कहाँ है (Pyar kahan hai)

प्यार कहाँ ?💕
प्यार तलाशती कविता..क्या प्यार मिला?
   
Pyar kahan ?
Pyar kahan ?💕
Image Created by: GemineAI 


मिला ना मुझे..
कोई प्यार कभी..
जब कि मैंने..
तलाश बहुत की..

सोचा था..
कभी ना कभी..
मिलेगा कोई ..
जो चाहेगा..
मुझे भी..

मगर सिर्फ ..
प्यार की कदर कहाँ..
प्यार के साथ..
धन का रिश्ता..
क्या वो प्यार है..

चलो कर लो..
एक सुलह..
सौदा कर लो..
प्यार का..
कह दो इसे शादी..

क्या ये सौदा..
कभी निभा..
प्यार इसमें..
कहाँ था..
प्यार का बन्धन..
किसने कहा..

तब भी इससे..
एक परिवार बना..
बेटा-बेटी का..
संसार बना..
हम माता-पिता हुये..

प्यार का रिश्ता..
हमारी संताने..
प्यार को पहचाने..
माता-पिता का प्यार..
उन पर था सरोबार..

यह प्यार तो..
सच्चा था..
प्यार हमारा बच्चा था..
बच्चों के सपने..
कितने लगे अपने..

लंबी दूरी..
लंबा इंतजार..
कहाँ प्यार का इजहार..
क्या हम दोनों में था..
बच्चों के रूप में पनपा..

आज बच्चे ही..
हमारा प्यार है..
यही तो..
संसार है..
प्यार कहाँ?
घूम फिर जवाब मिला..!

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कविता की विवेचना:-

​"प्यार कहाँ है "( Pyar kahan hai)कविता मानव जीवन की एक गहरी और व्यावहारिक सच्चाई को उजागर करती है। कवि की यह यात्रा रोमांटिक प्रेम की असफलता से शुरू होकर वात्सल्य (माता-पिता के प्रेम) की पूर्णता तक पहुँचती है।

​शुरुआत में, कवि जीवनसाथी के रूप में सच्चे प्रेम की तलाश में भटकता है, लेकिन उसे केवल निराशा हाथ लगती है। 

कवि इस कड़वे सच पर चोट करता है कि आधुनिक समाज में प्रेम की कदर कम और धन-संपत्ति का मोल अधिक है। 

जब सच्चा भावनात्मक लगाव नहीं मिलता, तो विवाह महज़ एक "सौदा" या "समझौता" बनकर रह जाता है।

 कवि यहाँ समाज में विवाह की गिरती मर्यादा और उसमें मौजूद व्यावसायिकता पर सवाल उठाता है।

​लेकिन कविता का असली सौंदर्य और मोड़ इसके दूसरे भाग में आता है। भले ही दो आत्माओं के बीच वह रोमांटिक प्रेम न पनप पाया हो, लेकिन उस समझौते (विवाह) के परिणामस्वरूप संतान का जन्म होता है। 

बच्चे के रूप में जब माता-पिता को निस्वार्थ प्रेम देने का अवसर मिलता है, तब उन्हें प्रेम की वास्तविक परिभाषा समझ आती है।
 जो प्यार वे दुनिया या साथी में खोज रहे थे, वह वात्सल्य के रूप में उनके अपने बच्चों में प्रस्फुटित होता है। 

बच्चे ही माता-पिता का संसार बन जाते हैं। कविता यह संदेश देती है कि प्रेम केवल दो प्रेमियों के बीच का आकर्षण नहीं है, बल्कि त्याग, निस्वार्थ सेवा और अपने बच्चों के प्रति समर्पण ही प्रेम का सबसे पवित्र और सच्चा रूप है।

​कवि का उद्देश्य:-

​इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य पाठक को प्रेम के सच्चे और वास्तविक रूप से परिचित कराना है। 

कवि समाज को यह समझाना चाहता है कि धन और स्वार्थ पर टिके विवाह या संबंध कभी आंतरिक तृप्ति नहीं दे सकते। 

सच्चा प्रेम बाहर की दुनिया में ढूँढने के बजाय निस्वार्थ रिश्तों में झलकता है। कवि का उद्देश्य निराश दिलों को यह दिलासा देना भी है कि यदि जीवनसाथी के रूप में रोमांटिक प्रेम न भी मिले, तो भी जीवन खाली नहीं रहता—माता-पिता का बच्चों के प्रति निष्काम वात्सल्य ही ईश्वर का सबसे सच्चा और महान प्रेम है।

"प्यार कहाँ है " कविता प्यार तलाशती है,प्रेमी प्रेमिका तो नहीं मिला मगर वात्सल्य प्रेम सच्चा मिला जो प्यार की तलाश का जवाब था.

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...इति 

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Saturday, August 8, 2026

लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur Chunav aayuk)t



लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त (Loktantra aur EC)
           A poem on election of India 
   
Loktantra aur chunav aayukt
Loktantra aur EC 
Image Created by:Meta AI 

जनता बेबस, लाचार खड़ी ताक,
अन्याय चुनाव का कब होगी बात,
वोट जनता का काटा,
संविधानिक अधिकार पर चांटा,
चुनाव आयोग का तानाशाही रुख ,
लोकतन्त्र पर गहराया संशय का साया,

विपक्ष की सुलगती चीखों में, 
जब गूँज रही थी एक ही पुकार,
ताक रही थी जनता न्याय का द्वार।
लोकतंत्र पर भारी है सरकार,
निष्पक्ष चुनाव पर प्रहार..

सुप्रीम कोर्ट में आस लिए,
जब पहुँची जनता,साथ विपक्ष था,
ख़ामोशी देखकर टूटने लगी उम्मीद,
"क्यों मौन है सर्वोच्च अदालत?" 
बेबस मन में सवाल असंख्य अधीर,
क्या होगी लोकतंत्र की तक़दीर ?

क्या वाकई हार गया लोकतंत्र?
क्या इतना गहरा है यह जाल?
​पर धैर्य की अग्नि में तपकर ही ,
न्याय में आयेगा अभूतपूर्व निखार,
अदालत का हर एक सँभला कदम,
एक गहरा विश्वास जगाता है..
सिहासन संभले जनसैलाब आता है !

सारे साक्ष्यों को तौल, 
 अंततः आया वह ऐतिहासिक हुक्मनामा,
 सत्य की विजय का बिगुल बजा,
 झुका सत्ता का हर झूठा ड्रामा,
 जनता ही मालिक है सत्ता ने माना !

निर्वाचन प्रणाली को साफ़ किया, 
निष्पक्षता को फिर से माँजा,
एक-एक अधिकार को बहाल कर, 
तोड़ा हर शंका का ताना बाना,
ये सपना है या सत्य पूर्व अनुमान! 

सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया,
वही है लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी,
जनता की आकाँक्षाएँ होती हैं यहाँ पूरी,
​मिट गया जन-मन का सारा संताप, 
खिल उठा जनतंत्र का चेहरा,विजय की छाप !

अदालत के न्यायोचित निर्णय से, 
विश्वास हुआ और भी गहरा।
जनता फिर से मुस्कुरा उठी,
मिला लोकतंत्र को नया जीवन,
हटा लोकतंत्र से बंदूक का पहरा,
जहाँ संविधान की सर्वोच्चता,
स्वयं सिद्ध है इस लिये तो,
भारतीय लोकतंत्र विश्व प्रसिद्ध है..!

🥀 Jpsb blog 🥀


यह भावपूर्ण कविता ​भारतीय लोकतंत्र,के लिये एक सपना देखती है चुनावी प्रक्रिया, जन-आकांक्षाओं और न्यायपालिका की भूमिका पर केंद्रित एक सशक्त साहित्यिक रचना है।और लोकतंत्र की जीत का यह सुनहरा सपना सत्य होगा पूर्ण विश्वास है. 

​कविता की विवेचना:-

​"लोकतंत्र और  चुनाव आयुक्त " Loktantra aur EC"को मुख्य रूप से तीन वैचारिक चरणों में बाँटा गया है:

1. ​आक्रोश और निराशा का चरण: शुरुआत में जनता की लाचार स्थिति, मताधिकार पर आघात और चुनाव प्रणाली में कथित पक्षपात को दर्शाया गया है। विपक्ष का विरोध और लोकतंत्र पर गहराते संकट का सजीव चित्रण कवि ने तीखे शब्दों में किया है।

2. ​संशय और धैर्य का चरण: दूसरे चरण में जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचता है, तो शुरुआती मौन और न्याय में विलंब से जनता के मन में निराशा और संशय उत्पन्न होता है। हालाँकि, कवि यहाँ धैर्य की आवश्यकता पर बल देता है और विश्वास जताता है कि अदालत का हर विचारणीय कदम न्याय की ओर ही बढ़ता है।

3. ​न्याय और विजय का चरण:- अंतिम चरण में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से सत्य की विजय होती है। निर्वाचन प्रणाली में सुधार होता है, जनता के अधिकारों की पुनर्स्थापना होती है और सत्ता को जन-शक्ति के आगे झुकना पड़ता है। 

अंततः संविधान की सर्वोच्चता और भारतीय लोकतंत्र की वैश्विक साख स्थापित होती है।

​कवि का उद्देश्य:-

​कवि का मुख्य उद्देश्य केवल राजनैतिक स्थिति पर कटाक्ष करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में जन-विश्वास को पुनर्स्थापित करना है।

• ​जन-चेतना जगाना: कवि पाठक को यह याद दिलाना चाहता है कि लोकतंत्र में असली मालिक 'जनता' ही है, कोई सत्ता या सरकार नहीं।

• ​संविधान और न्यायपालिका की महत्ता रेखांकित करना: कविता यह संदेश देती है कि कठिन से कठिन दौर में भी जब न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) अपने दायित्व का निर्वहन करती है, तो वह लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी के रूप में उभरती है।

• ​सकारात्मकता और धैर्य का संचार: संकट के समय तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन धैर्यपूर्वक न्याय की प्रतीक्षा करने से अंततः सत्य और निष्पक्षता की ही जीत होती है।

​संक्षेप में, "लोकतंत्र और चुनाव आयुक्त "कविता निराशा के बाद मिलने वाले न्याय, संविधान की शक्ति और भारतीय जनतंत्र के अमिट अस्तित्व की एक सुंदर और प्रेरणादायक अभिव्यक्ति है।

कृपया कविता को पढे और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें,ताकि लोकतंत्र की हमेशा जीत सुनिश्चित करें. 

इति...

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Friday, August 7, 2026

शिक्षा देश निर्माण (Shiksha Desh Nirmad)


शिक्षा देश निर्माण जेन-जी द्वारा शिक्षा सुधार आंदोलन 

Protest by Student for Educational Improvement. 

Shiksha Desh Nirmad
Shiksha Desh Nirmad
Image Created by:MetaAI 

शिक्षा का अधिकार,
यही है देश निर्माण का हथियार।
शिक्षा व्यवस्था सुधारो,
शिक्षा मांग रहे मासूम बच्चों को
यू ना बेवजह मारो।


शिक्षा में करेंगे सुधार,
बच्चे मानेंगे आभार।
एक अच्छा काम,
जो देश निर्माण से है जुड़ा,
करने में तुम्हें क्यों ऐतराज?


यही काम बनायेगा  तुम्हे..
भारत का सरताज,
वोट अपने आप मिलेंगे।
​फिर क्यों इधर-उधर की बातें,
बच्चों से युद्ध सी तैयारी,
क्यों मत गई मारी?

बस करना इतना सा काम,
शिक्षा को बनाना आम।
​शिक्षा हर बच्चे को मिले,
चाहे अगड़े हो या पिछड़े,
नेता के बच्चे हो या अभिनेता के।


शिक्षा देश में पाये उत्कर्ष,
शिक्षा के लिये ना हो संघर्ष,
शिक्षा के लिये ना हो मोहताज,
उत्तम शिक्षा मिले सबको आज,
यही ही जेन जी का आगाज!


हमने अपने ही बच्चों के प्रति
यह वहम क्यों पाला है?
क्यों उन्हें डराया-धमकाया,
क्यों ना हल की उनकी समस्या,
सीधी बात क्यों इतनी टेढ़ी?


जागेगा जब शासन का ज़मीर,
बदलेगी तब भारत की तक़दीर।
सुन ली मासूमों की पुकार,
अब शिक्षा में होगा नया सुधार।


सस्ती और सुलभ हर शिक्षा होगी,
हर बच्चे की मुकम्मल इच्छा होगी।
सरकारी स्कूल बनेंगे अब मिसाल,
जहाँ पढ़ाई होगी सबसे बेमिसाल।


न नेता, न अभिनेता, न कोई भेदभाव,
हर बच्चे को मिलेगा एक सा प्रभाव।
सबको बराबरी की शिक्षा,
जैसी हो जिसकी पढ़ने की इक्षा !

न करना पड़ेगा अब विदेश का रुख़,
देश में ही मिलेगा ज्ञान का सुख,
​कलम बनेगी हर हाथ की ढाल,
देश निर्माण में युवा करेगा कमाल.. !


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यह कविता देश के भविष्य—बच्चों—के प्रति संवेदनशील सोच और एक मजबूत राष्ट्र निर्माण की भावना को दर्शाती है। इसका मूल संदेश यह है कि शिक्षा केवल एक बुनियादी अधिकार ही नहीं, बल्कि देश के विकास और प्रगति का सबसे सशक्त हथियार है।

कविता का भावविस्तार:-
वर्तमान समय में जब मासूम बच्चे अपने अधिकार और बेहतर भविष्य के लिए शिक्षा की मांग करते हैं, तो उनकी आवाज़ को दबाना या उन पर सख्ती बरतना अत्यंत चिंताजनक है। 

कविता स्पष्ट करती है कि राजनीति और भाषणबाज़ी से हटकर यदि सरकारें शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार करें, तो जनता और आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा उनका आभार मानेंगी।

 सच्चा नेतृत्व और लोकप्रियता सत्ता के दावों से नहीं, बल्कि जनहित के  महान कार्य से मिलती है।बच्चों के प्रति कड़ा रुख अपनाने के बजाय उनकी समस्याओं को सहहानुभूति से सुनना और सुलझाना समय की मांग है। 

शिक्षा में समाज के हर वर्ग के लिए समानता होनी चाहिए—चाहे बच्चा किसी गरीब का हो, अमीर का, नेता का हो या अभिनेता का। किसी को भी बेहतर पढ़ाई के लिए अपने देश को छोड़कर बाहर न जाना पड़े, यही हमारी व्यवस्था का सबसे बड़ा उत्कर्ष होगा।

सकारात्मक परिणाम एवं निष्कर्ष:-

कविता के अंतिम संदेश तक पहुँचते-पहुँचते सरकार को बच्चों की इस न्यायसंगत पुकार का अहसास होता है। सत्ता में बैठे नीति-निर्माताओं को यह स्पष्ट रूप से समझ आता है कि देश को दिशा देने वाली वास्तविक शक्ति केवल शिक्षित युवा ही हैं।

सरकार एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व निर्णय अगर लेती है, जिसके तहत शिक्षा को अल्प खर्च (न्यूनतम शुल्क) पर हर नागरिक के लिए सुलभ बनाया जाता है।

 देश के सभी सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया जाता है ताकि वे निजी संस्थानों से भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर सकें। इस बदलाव से हर बच्चे का सपना साकार होगा और एक सशक्त, शिक्षित और आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत होगी।

कविता की विवेचना:-

"शिक्षा देश निर्माण " ( Shiksha Desh nirmad) कविता भारतीय शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान चुनौतियों, सामाजिक असमानता और व्यवस्था की संवेदनहीनता पर एक तीखा प्रहार करती है। 

कविता का मुख्य स्वर आक्रोश और चेतना का है, जो यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे पहली और बुनियादी शर्त है।

कविता की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:-
• अधिकार और संघर्ष: मासूम बच्चों का शिक्षा की माँग करना और उसके बदले तंत्र की सख्ती का सामना करना समाज की एक विडंबनापूर्ण तस्वीर पेश करता है। कविता पूछती है कि जब शिक्षा हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, तो इसके लिए बच्चों को संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?

• राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल: कविता नेताओं और शासन प्रणाली को यह याद दिलाती है कि खोखले दावों या चुनावी वादों से बड़ा काम शिक्षा सुधार है। यदि सरकारें प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करती हैं, तो उन्हें जनता का स्वाभाविक समर्थन और सम्मान मिलेगा।

• समानता का संदेश: शिक्षा में किसी भी प्रकार का सामाजिक या आर्थिक भेदभाव नहीं होना चाहिए। चाहे गरीब का बच्चा हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का, सबको एक समान और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि देश की प्रतिभा को आत्म सम्मान और संतुष्टी मिले पढ़ाई के लिये बाहर (विदेश) न जाना पड़े।

कविता लिखने का उद्देश्य:-

कवि का मुख्य उद्देश्य सोए हुए शासन और समाज को जगाना है। कवि यह संदेश देना चाहता है कि बच्चों की जायज़ माँगों को दबाने के बजाय सरकार को सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारना चाहिए और शिक्षा को अल्प-खर्च पर हर नागरिक के लिए सुलभ बनाना चाहिए।

 अंततः" शिक्षा देश निर्माण "कविता एक ऐसे समतावादी भारत के निर्माण का आह्वान करती है जहाँ हर हाथ में सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा रूपी कलम हो।.

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Wednesday, August 5, 2026

महाशक्ति का मुखौटा (Mahashakti ka mukhota)

 महाशक्ति का मुखौटा
A poem on super power USA
   
Mahashakti ka mukhota
Mahashakti ka mukhota
Image Created by: MetaAI

शांति दूत का चोला ओढ़े,
कैसी यह परछाईं है?
कहीं प्रतिबंध की बेड़ी है,
कहीं बारूदी तन्हाई है।
लोकतंत्र का नाम भुनाकर,
अधिकारों को रौंदा जाता,
अपने ही व्यापारिक हित में,
नया युद्ध है थोपा जाता।
वियतनाम से लेकर इराक तक,
इतिहास गवाही देता है,
जिसने बदला रुख हवाओं का,
वह भारी कीमत भरता है।
बमों की बारिश करके जो,
अमन का पाठ पढ़ाते हैं,
मासूमों की चीखों पर ही,
अपनी सत्ता चमकाते हैं।
पर वक्त हमेशा बदलता है,
ताकत का घमंड भी टूटता है,
जब जागता है जन-मानस तब,
अन्याय का सूरज डूबता है।

महाशक्ति को एहसास हो,
शान्ति क्या होती है भास हो,
ना बनाओ दुनिया को बारूदी,
पता है तूने कितनों की उम्मीदें..
को आग लगा दी. 

बस करो अब तुमको है अनुरोध,
तुम्हारे नर संहार का है विरोध ,
धरती को और ना बरबाद करो,
हो विश्व का कल्याण ..
कुछ ऐसा ईजाद करो...!

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"महाशक्ति का मुखौटा " कविता एक अत्यंत सशक्त और मुखर काव्य-रचना है, जो आधुनिक वैश्विक राजनीति, भू-राजनीतिक स्वार्थों और विशेष रूप से अमरीकी राष्ट्रपति तथा वहाँ की नीतियों के दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार करती है।

(A poem on International Relation)

कविता का विस्तार:-

​वैश्विक मंच पर स्वयं को शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का रखवाला बताने वाला अमरीका हमेशा एक मसीहा के रूप में सामने आता है।

 लेकिन इस चमकदार मुखौटे के पीछे का कड़वा सच कुछ और ही है। जहाँ एक तरफ विश्व-कल्याण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कमजोर और संप्रभु देशों पर आर्थिक प्रतिबंधों और बारूद का बोझ थोप दिया जाता है।

 'लोकतंत्र की रक्षा' का नारा वास्तव में केवल एक रक्षा कवच है, जिसका इस्तेमाल अमरीका अपने व्यापारिक, सैन्य और ऊर्जा संबंधी हितों को साधने के लिए करता है।

​इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वियतनाम से लेकर इराक, अफगानिस्तान और लीबिया तक, जहाँ-जहाँ अमरीकी हस्तक्षेप हुआ, वहाँ केवल तबाही और तन्हाई ही हाथ आई। 

जो भी देश या नेतृत्व अमरीका की भू-राजनीतिक योजनाओं के आगे झुकने से इनकार करता है, उसे 'भारी कीमत' चुकानी पड़ती है।

 बेकसूर मासूमों की चीखों और लहू की नींव पर शक्ति का यह साम्राज्य खड़ा किया जाता है। बमों और मिसाइलों के साए में शांति का पाठ पढ़ाना एक भयावह विरोधाभास है। 

किंतु इतिहास का यह भी नियम है कि सत्ता और ताकत का अहंकार स्थायी नहीं होता। जब पीड़ित जनता का जन-मानस जागता है, तो इतिहास का रुख बदलता है और किसी भी अन्यायी महाशक्ति का सूरज अस्त होकर ही रहता है।

कविता की विवेचना:-

​"महाशक्ति का मुखौटा " ( Mahashakti ka Mukhota)
कविता अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कड़वे यथार्थ और महाशक्तियों की आक्रामक विदेश नीति का एक यथार्थवादी विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
  • ​विषय-वस्तु एवं प्रतीक विधान: कविता में 'शांति दूत का चोला' और 'मुखौटा' जैसे प्रतीकों के माध्यम से अमरीकी राष्ट्रपति की उस कूटनीति पर व्यंग्य किया गया है, जो मानवता का नाम लेकर युद्ध और तबाही को बढ़ावा देती है। 'वियतनाम से लेकर इराक' के उल्लेख से कविता को एक ऐतिहासिक और प्रामाणिक धरातल मिलता है।
  • ​शिल्प और भाषा-शैली: कविता की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। इसमें रोष, आक्रोश और क्रांति का स्वर है। 'बमों की बारिश' और 'मासूमों की चीखें' जैसे शब्द बिंब सीधे पाठक की चेतना को झकझोरते हैं।
  • ​मूल संदेश एवं उद्देश्य: "महाशक्ति का मुखौटा "कविता का मुख्य उद्देश्य महाशक्ति (USA) के दंभ को आईना दिखाना और यह चेताना है ,कि वास्तविक महाशक्ति वह नहीं जो विनाश करे, बल्कि वह है जो अपनी अकूत सामर्थ्य, धन और तकनीक का उपयोग विश्व-कल्याण, गरीबी मिटाने और वास्तविक शांति स्थापना में करे। महाशक्ति का कर्तव्य विश्व में विनाश फैलाना नहीं, बल्कि मानवता का संरक्षण करना है।

​"महाशक्ति का  मुखौटा "कविता अंतिम पंक्तियों में आशावादी दृष्टिकोण अपनाती है कि अंततः न्याय और जन-शक्ति की ही विजय होती है।

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Saturday, July 25, 2026

कॉकरोच ( Kackroch)

छात्रों के द्वारा delhi में मौजूदा विरोध प्रदर्शन, उनकी पीड़ा और भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को शामिल करके यहाँ कॉकरोच कविता में विस्तार दिया गया है:

KACKROCH-A Hindi Poem on Student protest

Kackroch
Kackroch Protest
Image Created by:GemineAI












​जज साहब ने आकलन किया,
छात्रों को कॉकरोच कह दिया।
कॉकरोच अपना हक मांगने लगे,
लगता है उन्हें वो गए ठगे।

​उनके भविष्य का हो रहा सौदा,
मुरझा रहा बचपन रूपी पौधा।
इनके भविष्य के साथ हो रहा खिलवाड़,
सुन ले अंधी-बहरी सरकार इनकी पुकार!

​सड़कों पर आज उतरे हैं वो युवा,
जिनके सपनों का हर पन्ना हुआ धुआँ ,
धांधली, पेपर लीक..
और भ्रस्टाचार  की मार,
कब तक सहेगा देश का होनहार?

​हाथों में तख्तियाँ,
आँखों में अश्क और ज्वाला है,
यह सिर्फ विरोध नहीं,
समझे बात सरकार, 
छात्र मांग रहे अपना अधिकार ..

हक की लड़ाई ही आजादी है।
सरकार की अव्यवस्था ने ही,
यह स्थिति ला दी है,
​लाठियाँ की बौछार,
आशु गैस की मार,
नन्हें मासूम बच्चे बच्चियों का ..
क्यों रहे सर फाड़ ..

जुल्म अंग्रेजों सा अपनों से ..
सह कर भी न्याय की उम्मीद ,
उन्होंने नहीं छोड़ी है ..
सरकार अपनी है ,
अंग्रेजों की थोड़ी है ..
करो बच्चों से अच्छा व्यवहार..

शिक्षा का व्यापार ना होने दे ,
सपने मासूमों के नीलाम ना होने दे ,
छात्र नीव है इस देश की ..
इसे कमजोर ना होने दे,
ना बिछाये कांटे इनकी राह में..
इन्हें सुनहरे  सपनों में खोने दे ..

​कोचिंग माफिया चारो ओर..
और दलालों का जाल है,
मेहनती छात्रों का आज बुरा हाल है।
डिग्रियाँ बिक रही हैं क्या मोल ?
प्रतिभाएँ रो रही भविष्य डावं डोल ..

स्कूल धडा धड बंद कर ..
व्यवस्था चैन की नींद सो रही है।
बच्चे किये शिक्षा से वंचित..
ताज्जुब कोई नहीं चिंचित..
कह रहे अनपढ़ भारत होगा विकसित..

विश्व गुरु होने का सपना..
बिना शिक्षा के कैसे होगा अपना..
क्या यह किसी ने विचारा है..
या यह सिर्फ एक खोखला नारा है..
नारे को सार्थक करें ..
शिक्षा सुधार ईमानदारी से करे..

अभी भी समय है..
हुक्मरान होश में आएं,
युवाओं के जनाक्रोश को समझ जाए..
और राजनीति से उठकर..
सार्थक कदम देशहित में उठाये..
अपने भारत देश को महान बनाये..!!!
जय हिंद!

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भारत शिक्षा सुधार का अब एक ही नारा हो:
उत्तम शिक्षा का अधिकार हमारा हो..

• ​शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाज़ारीकरण पूरी तरह बंद हो!
• ​आज़ाद भारत में हर नागरिक के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बिल्कुल मुफ्त या नाममात्र (न्यूनतम) खर्च पर उपलब्ध हो!
​जब पढ़ेगा देश का हर बच्चा बिना किसी आर्थिक बोझ के,तभी सही मायने में भारत महान और सशक्त बनेगा।



कविता की विवेचना:-

Kackroch (कॉकरोच) कविता भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, बाज़ारीकरण और युवा पीढ़ी के न्यायपूर्ण संघर्ष का एक अत्यंत संवेदनशील और आक्रोशपूर्ण खाका खींचती है। 

"कॉकरोच कविता "की शुरुआत न्यायपालिका की टिप्पणी Kackroch से होती है, जो छात्रों के आक्रोश की तात्कालिक वजह बनती है।

 कवि ने बहुत ही मार्मिक ढंग से दर्शाया है कि कैसे धांधली, पेपर लीक, कोचिंग माफिया और दलालों के तंत्र ने होनहार युवाओं के सपनों को धुएँ में बदल दिया है।

​कॉकरोच कविता की मुख्य संवेदनाएँ एवं संदेश:-

• ​सड़कों पर उतरा आक्रोश: "कॉकरोच कविता" सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं के जज्बे को सलाम करती है। लाठियों आंसू गैस पानी की बौछारों के बीच भी उनका यह संघर्ष सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है।

• ​शिक्षा का बाज़ारीकरण: "शिक्षा कोई व्यापार नहीं" पंक्तियों के माध्यम से कवि ने उस व्यावसायिक तंत्र पर कड़ा प्रहार किया है जहाँ चंद रुपयों के खातिर प्रतिभाओं का सौदा होता है और डिग्रियाँ नीलाम की जाती हैं।

•  ​समाधान और दृष्टि:"कॉकरोच कविता "केवल समस्या को नहीं रेखांकित करती, बल्कि इसका अंत भारत में एक बुनियादी और क्रांतिकारी सुधार के नारे के साथ होता है!

"मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा"। जब देश का हर बच्चा बिना आर्थिक बोझ के पढ़ेगा, तभी वास्तविक अर्थों में भारत सशक्त बनेगा।

​विम्बों और भाषा की दृष्टि से "कॉकरोच कविता" में "मुरझा रहा बचपन रूपी पौधा" तथा "आँखों में अश्क और ज्वाला" जैसे प्रयोग कविता को गहरा और प्रभावशाली बनाते हैं।

​लेखक का कविता लिखने का उद्देश्य:-

​"कॉकरोच कविता" को लिखने का मुख्य उद्देश्य देश की लचर और भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को आवाज़ देना है। 

कवि शासन-प्रशासन (हुक्मरानों) और समाज का ध्यान छात्रों की पीड़ा, पेपर लीक, कोचिंग माफिया तथा शिक्षा के बढ़ते बाज़ारीकरण की ओर आकर्षित करना चाहता है।

इसके साथ ही, "कॉकरोच कविता "युवाओं में न्याय के प्रति उम्मीद जगाने और हर भारतीय नागरिक के लिए मुफ़्त व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की वकालत करने के लिए रची गई है।

छात्रों को Kackroch कहना वो भी भारत की संविधान रक्षा करने वाली संस्था द्वारा,  युवाओं और देश के भविष्य साथ घृणित मज़ाक है!

आखिर  इनका सार्थक जवाब हमारे देश की इसी संस्था,संसद और सिस्टम को जिम्मेदारी से देना चाहिये.
यही Kackroch कविता का संदेश और आग्रह है .

याद रहे आप भी कभी युवा थे,  युवाओं को आशीर्वाद प्यार और स्नेह के साथ सही मार्गदर्शन और शिक्षा का अधिकार दे ,यही उनका मूल भूत हक है..
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...इति 


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Sunday, July 19, 2026

ब्रह्मांड का हिस्सा (Brahmand ka hissa)

 ब्रह्मांड  का हिस्सा-अध्यात्मिक कविता 
Bramhand ka hissa
Bramhand ka hissa
Image Created by :WhatsApp AI
























मैं नहीं जानता मेरे..
पृथ्वी पर होने का किस्सा,
पर जानता हूँ..
मैं हूँ ब्रम्हांड का हिस्सा।

ये तारे, ये नदियाँ, 

ये बहती हवाएँ,
ये अम्बर की गहराई, 
सूनी दिशाएँ,
मेरी रगों में बहती है सृष्टि ,
जो इस ब्रह्मांड के..
कण-कण में है बसी।

मिट्टी का पुतला हूँ, 
मिट्टी में मिलूँगा,
पर बनकर सुगन्ध..
मैं फिर से खिलूँगा।
ये जीवन तो बस.. 
एक पड़ाव है छोटा,
न जनम मेरा पहला, 
न अंत है ये आखिरी..

अनंत से हूँ मैं अनन्त तक रहूँगा 
यही किस्सा बार बार कहूंगा..
मैं रूप बदलता हूँ,
मैं वस्त्र बदलता हूँ,
मैं बनकर किरण रोज..
अंधियारे से लड़ता हूँ।
न आग मुझे छुए,
न शस्त्र मुझे काटे,
मैं वो अंश हूँ जिसे कोई न बाँटे।

मैं आदि से पहले था, 
मैं अंत के पार हूँ,
इस मरुभूमि में बहती ..
अमृत की धार हूँ।
काल का पहिया ..
मुझे बाँध न पाया,
मैंने तो बस ..
इस धरा पर जनम पाया।

जब कुछ भी नहीं था, 
तब भी मैं ही था,
जब सब मिट जाएगा, 
तब भी मैं रहूँगा।
एक अमर, अटूट, अजन्मा ..
अमर ज्योति हूँ,
मैं समय की लहरों में..
बहता हुआ मोती हूँ।

आत्मा के रूप में ..
न कभी मैं मिटूँगा,
अनंत काल से हूँ,
अनंत काल तक रहूँगा।
मिट जाएगा एक दिन..
यह सांसारिक किस्सा,
पर अमर सत्य है, 
मैं हूँ ब्रम्हांड का हिस्सा।

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कविता की विवेचना: 

ब्रम्हांड का हिस्सा( Bramhand ka hissa)कविता की  विवेचना निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के आधार पर की गई है:

लेखक का दृष्टिकोण और उद्देश्य (Writer's View & Purpose)

"ब्रम्हांड का हिस्सा" कविता मानव अस्तित्व के सबसे गहरे आध्यात्मिक प्रश्न—"मैं कौन हूँ और यहाँ क्यों हूँ?"—को टटोलने के उद्देश्य से लिखी गई है। भौतिक संसार में मनुष्य अक्सर खुद को सीमित और नश्वर (मिटने वाला) समझकर भयभीत रहता है। लेखक का दृष्टिकोण इस संकीर्ण सोच से परे है। वह पाठक को यह याद दिलाना चाहता है कि हमारा जीवन केवल इस पृथ्वी और इस शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि हम उस विशाल और अनंत ब्रह्मांड का एक अभिन्न अंग हैं।

कविता का मूल भाव (Core Theme):-

 "ब्रम्हांड का हिस्सा" कविता की शुरुआत अज्ञानता की स्वीकारोक्ति से होती है, जहाँ भौतिक जन्म एक रहस्य है। परंतु, जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ती है, लेखक आत्मा और परमात्मा के अद्वैत संबंध को उजागर करता है। पंचभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) जिससे ब्रह्मांड बना है, वही मनुष्य के भीतर भी है। 

लेखक भगवद्गीता के संदेश (नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि) को आधुनिक संदर्भ में ढालकर समझाता है कि शरीर बदल सकता है, लेकिन चेतना अमर है।

लेखक के विचारों की सत्यता (Truth of the Writer's Thoughts):-
अंत में, लेखक का यह विचार कि "मैं आत्मा के रूप में अनंत काल तक रहूँगा" केवल एक काल्पनिक दर्शन नहीं, बल्कि पूर्ण सत्य है।

• आध्यात्मिक सत्य: सनातन दर्शन और वैश्विक रहस्यवाद हमेशा से मानते आए हैं कि आत्मा अजन्मा और अविनाशी है। मृत्यु केवल शरीर का अंत है, चेतना का नहीं।

• वैज्ञानिक सत्य: आधुनिक विज्ञान का 'ऊर्जा संरक्षण का नियम' (Law of Conservation of Energy) भी यही कहता है कि ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही बनाया जा सकता है, वह केवल रूप बदलती है। हम सब 'स्टारडस्ट' (तारों की धूल) से बने हैं।

अतः लेखक का यह विचार पूरी तरह सत्य और प्रामाणिक है कि सांसारिक किस्सा खत्म होने के बाद भी, ब्रह्मांड के हिस्से के रूप में हमारा अस्तित्व अनंत काल तक कायम रहेगा।

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इति...

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Sunday, March 8, 2026

एक फाइल बदनाम (Ek file badnaam)


Sunday, February 22, 2026

काले अंग्रेज (Kaale Angrej)

Kaale Angrej- Aazadi ki Politics
Kaale Angrej
Kaale Angrej 
Image Generate by AI

अंग्रेज यानि गोरे..
गिनती में थे थोड़े..
तब भी भारत पर..
राज कर गये..
भारतीय क्यों इनसे..
डर गये जीते जी मर गये..

भारत को अपना..
गुलाम बनाया..
हमारे लोगों द्वारा ही..
हम पर चाबुक चलाया..
कुछ ग़द्दार जो इनसे मिले..
भारतीयों पर अत्याचारों के..
जारी रहे सिलसिले..

क्या हम बुजदिल थे ..
या थे स्वार्थी निकम्मे..
कभी मुगल तो कभी अंग्रेज..
हमे झुकाते रहे..
हम पर हुकूम चलाते रहे..
हमारे देश पर अपना ..
परचम लहराते रहे ..

और हमने माना उन्हें..
अपना माई बाप..
अपने पर ही शासन करने में..
दिया उनका साथ..
गुलामी को गौरव माना..
अपने अन्दर के गद्दारों को..
नहीं पहचाना..

सालों लंबी गुलामी..
क्यों सही, क्यों कोई..
जिन्दा साँस ना रही..
गुलामी में सुविधा तलाश ली..
घुट्टी घुट्टी साँस ली..
यही हमारी आदत बनी..
जो अब भी जारी है..

कुछ बहादुर जागे भी थे..
राणा शिवा जी के..
मुगलों को खदेड़ने के..
पक्के इरादे थे..
मगर कुछ ग़द्दार..
जनता सोई रही बेख़बर..
तो बहादुरी भी रही बेअसर..

गुरु तेगबहादुर और..
गुरु गोबिंद सिंह ने..
वार दिया परिवार..
चार साहिब जादे..
माता गुज़री की शहीदी..
मुग़लों की कब्र की..
आखिरी कील थी..

उत्तर भारत में..
बंदा सिंह बहादुर ने..
मुगलों को सबक सिखाया था..
पंजाब में अपना ..
राज बनाया था..
मराठा राज शिवा जी ने..
भगवा फहराया था..

औरंगजेब महाराष्ट्र में..
डफन हुया, मुघल राज..
तभी खत्म हुआ..
किसी तरह मुगलों से..
पीछा छुटा तो..
अंग्रेजों ने गाड़ दीया खूँटा..
दो सौ साल फिर..
अंग्रेजों ने जमकर लूटा..

बुजदिली और थी गद्दारी..
अंग्रेजो की गुलामी स्वीकारी..
अपना गिरेबान अंग्रेजो को..
पेश किया, गुलाम फिर..
ये देश किया, जमीर क्यों..
सोता रहा, देश सिसक सिसक..
रोता रहा, हमारा तिरंगा..
यूनियन जैक का भार..
ढोता रहा, मान खोता रहा..

1857 में ग़ुलामी का..
एहसास हुआ हमारे..
हमारे वीरों को तब..
मंगल पांडे ने सेना में..
चिनगारी सुलगाई थी..
और वीरों के साथ..
झाँसी वाली रानी ने भी..
जान की बाजी लगायी थी..

एक बार फिर जोश से..
वीर भारतीय जागे थे..
करतार सिंह साराभा ने..
आज़ादी की अणख जगायी..
छोटी उम्र में शहीदी पायी..
फिर और वीर आये आगे..
सुभाष, चंद्रशेखर,भगत सिंह..
अंग्रेजों के आड़े आये..

भारत मा पर किया सर्व ..
कुर्बान,  बहादुरी से दी थी..
अपनी जान..
अंग्रेज इनकी बहादुरी देख..
डर से कापे थे..
तभी अपने बिस्तर बांधे थे..
आजाद ना किया भारत तो..
मारे जायेगे..
1947 को अंग्रेज भागे थे..

अंग्रेजो की गुलामी से 
मिली निजात..
फिर सुरू हो गई..
काले अंग्रेजो की बात..
आज़ादी चंद अमीरों..
और नेताओं को ही मिली..
आम आदमी गया ठगा ..
गुलाम ही रहा..

गोरे अंग्रेजो के हथकंडे..
काले अंग्रेजो ने बखूबी अपनाये..
फूट डालो राज करो..
एक अच्छा फंडा था..
पुलिस को जुल्म के अधिकार..
ऐसे ही चलेगी देसी सरकार..
लोकतन्त्र का झुनझुना..
जनता को थमाया..
तुम्हारा ही राज है बताया..

जनता झुनझुना बजा..
खुश होती रही..
अब अच्छा होगा अब अच्छा होगा..
बाँट जोहती रही..
अमीर और अमीर होते गये..
नेता अमीरी के बीज बोते गये..
मिल जुल् अपने हक के..
सब नियम बनाये..
जनता को पंच वर्षी ..
योजना में उलझाये..

आज तक जारी है..
वो ही कहानी पूरानी..
राजनीति,  सत्ता, चुनाव..
संसद में हंगामा..
मौज मस्ती पिकनिक..
जनता उम्मीद से..
बाट जोहती है..
अब कुछ अच्छा होगा..
रोज सोचती है..

गुलामी की जंजीरें..
जारी जारी हैं..
जनता राजनेताओ ..
से हारी है..
उनका है हक पे जोर..
जनता बेवस कमजोर ..
क्या करे बेचारी..
बेरोजगार गरीब..
भूख की लाचारी..
चारों ओर से गयी मारी..

हमारे साथ जो भी देश..
हुये आजाद..
हमसे कई गुना उनकी..
हालत अच्छी है आज..
अच्छी शिक्षा, अस्पताल..
अच्छा प्रशासन ,रोज़गार..
उन में देशों आई जैसे बहार..
सुनहरा है उनका संसार..
हम अंधकार में डूबे..
पता नहीं क्या सत्ता के मनसुबे..


क्या एक बार फिर..
गुलामी की तैयारी है..
पहिले इंग्लैण्ड के थे..
अब अमेरिका की बारी है..
क्यों कि हमारे भेदिओ की..
अमेरिका से यारी है..
अब गुलाम हुये तो..
फिर ना छूटेगे ..
सपने आजाद भारत के..
बुरी तरह टूटेगे ..


भगवान पर है..
जनता का पूरा भरोसा..
सुनहरा पल होगा कौनसा..
जब राम फिर अवतार लेगे..
एक एक अपराधी का..
हिसाब है उनके पास..
नरक बनाया है..
उनके लिये खास..
जन्मों जन्म सड़ना होगा..
खामियाजा अपराधों का..
भरना होगा..
 

माफी की गुंजाईश..
अभी भी बाक़ी है..
गलतियों का कर ले सुधार..
भगवान शायद हो जाये उदार..
देश और जनता की..
निस्वार्थ करें सेवा..
देश को विश्व का बेहतरीन..
देश बनाने का करें काम..
जैसे अमेरिका, चीन,जापान ..


भारत का भी होगा सम्मान..
अगर भ्रष्टाचार ख़त्म हो..
राजनीति से ऊपर उठ..
वतन का हो ध्यान..
पक्ष विपक्ष मिल करे काम ..
एक दूजे का सम्मान करें..
ईमानदारी से देश हित साधे..
गलत को गलत कहे..
भारत माता की मिल जय कहे..
भिन्न भाषा धर्म तब भी ..
सब भारतीय मित्र हैं..
इसी में हम सबका अस्तित्व है..!!


कविता की विवेचना:-

काले अंग्रेज/Kaale Angrej कविता आजादी के संजोये सपनों की टूटती दास्तान है. 
आजादी के दिवानों ने सोचा था, अंग्रेज जाएंगे तो हम अपने देश को दुनिया का सबसे अच्छा देश स्वर्ग बनायेंगे, देश का आखरी नागरिक भी संपन्न होगा, गरीबी का इस देश में नामों निशान ना होगा.
 
मगर सपना टूटा आजादी के बाद सत्ता गिने चुने अमीर और राजनेताओं ने हथिया ली, आम नागरिक को अलग कर सिर्फ अपने बारे में ही सोचा अपने लिये ही योजनाएँ बनायी. 

सत्ता पर कैसे काबिज रहना है  अंग्रेजों की नीतियां ही अपनायी, ब्लकि अंग्रेजों की राज करने की नीतियों का गहन अध्ययन किया. 
जैसे फूट डालो राज करो, शिक्षा को नाम मात्र की डिग्री तक रखो मगर क्लर्क से आगे का ज्ञान मत दो, पुलिस के अधिकार अंग्रेजो वाले ही रहने दो जो कि आम जनता को कुचलते हैं, चाहें पुलिस किसी को जान से मारे जो आज भी जारी है. 

देश की सारी सम्पदा पूंजीपतियों के हाथ रहें, पूंजीवाद को आज़ादी के बाद अपनाया गरीब का सारा हक खाया,  आज़ादी का गरीब को कोई लाभ नहीं मिला पहेले भी जलालत झेलता था आज भी झेलता है. 

जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सच होती नजर आती है, 
आपराधिक पर्वती के लोग राजनीति में पैठ जमा मंत्री बन रहे हैं.
मीडिया न्याय व्यवस्था, प्रशासन सब सत्ता पक्ष के पैरोकार हैं. 

अमेरिका जैसे अमीर देश अपना हुक्म मनवा रहे हैं और हम मजबूरी में मान भी रहें हैं, आज के AI जुग में हमारा सारा डिजिटल संसार अमेरिका पर निर्भर है, वह चाहें तो हमारी सारी व्यवस्था जब चाहें ठप्प कर दे,गूगल, फेस बुक, मेल, व्हॉट ऐप सब उनका है, कॉम्प्युटर ऑपरेटिंग सिस्टम उनका हैं, हमारा क्या है, अब तो हमारी रक्षा प्रणाली पर भी उनकी निगरानी है. 

"काले अंग्रेज " कविता भारत के आम जनता की विवशता दर्शाती है कि कि कैसे पहिले भी आम जनता गुलाम थी आज भी गुलाम है, गरीबी और जलालत की जिंदगी जीने को मजबूर उसकी आज़ादी अनंत काल के लिये हो गयी दूर. 

हा भारत की जनता का भगवान पर अटूट विश्वास है, एक दिन राम भगवान, कृष्ण भगवान जरूर आयेंगे बेइमानो भ्रस्टाचारियो को नर्क पहुचा कठोर सज़ा देंगे माफ़ी भी ना होगीं नसीब. 

भगवान आने से पहिले ही जमीर जाग जाये सब अच्छा हो जाये तों कितना अच्छा हो.

भारत खनिज सम्पदा, उपजाऊ भूमी, समुद्री तट से भरपुर सभी प्राकृतिक सम्पदा से लबालब देश है, ईमानदारी हो, भ्रस्टाचार ख़त्म हो जाये तो विश्व का नंबर 1 देश बनने से कोई नहीं रोक सकता.

सही नीतियां होती तो बन जाता था, चीन हमारे समकक्ष था हमसे सालों आगे जा चुका है, विश्व की मॅन्युफॅक्चरिंग हब बन गया है, अमरीका जैसे देश को आंख दिखाने की स्थिति में है, हम भी ज्यादा तर समान चीन का वापर रहें हैं. 

अब भी हम अंदरुनी राजनीति से निकल कर देश के लिये काम करें तो बहुत जल्दी आये हुये गैप को भर सकते हैं. आओ भगवान से सब मिलकर प्रार्थना करें और अपने देश को विकास की ओर ले जाये...सभी देश वासियों को हार्दिक शुभकामनाएं..!!

...इति..

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