भारतीय बेटी के बाबुल से रिश्ते पर कविता
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| Ye kaisa rishta Image Created by GemineAI |
बेटी जो है..
दिल का टुकड़ा..
चाँद सा उसका मुखडा..
चिड़िया सी चहचहाये ..
सब का मन लुभाये ..
बेटी जवान हुयी..
घर की आन बान शान हुयी..
शादी के रिश्ते..
आने लगे-कोई जचे..
कोई ना जचे -लडका देखने..
के ही परिवार में चर्चे..
पराये धन की कहावत..
बेटी को अक्सर..
बाबुल सुनाने लगे..
जो बहुत अपने से थे..
अब अनजाने लगे..
बेटी से पीछा लगे ऐसा..
घर वाले छुड़ाने लगे..
मात-पिता भाई-बहन..
की प्यारी थी..
सबकी राज दुलारी थी..
सीने से लगा..
माँ ने नाजो से पाला था..
अब क्यों दे रहे..
देश निकाला सा..
एक अनजान सा इंसान..
सब बोले..
अब यही है तेरा भगवान..
इसकी ही तू अपनी है ..
अब इसकी पत्नी है..
हम हुये पराये..
बेटी पराया धन ..
अपने घर जाये..
बचपन से जवानी तक..
मुझे सहेजा था..
मैं थी बाबुल का कलेजा सा..
किसी पराये की नजर..
कोई अनजाना स्पर्श..
लगा था जहर सा..
बुरी नजर कई बार उतारी थी..
अब एक अनजाने के हवाले..
जो हर तरह मुझे छुएगा..
मेरा मन हो ना हो..
मुझे खुश होना होगा..
उसके साथ सोना होगा..
उसकी सेवा मेरा बनाया फर्ज ..
जैसे पिछले जन्म का कर्ज..
मात -पिता अचानक ..
बदल गये मेरे..
आ गये नये मम्मी-पापा ..
यही है सास-ससुर का नाता..
मैं पतझड़ का बनी पत्ता..
जो अपनी साख से टूटा..
ना जाने कहाँ गिरेगा..
और क्या होगी उसकी दशा..
यही रीत बेटियों के लिये..
सदियों से चली आयी..
मेरी माँ भी..
किसी साख का पत्ता थी..
पिता के ..
परिवार का हिस्सा बनी ..
उसकी माँ से वो टूटी..
इसे कहते हैं गृहस्थी..
मैं भी अपनी बेटी को..
बहुत लाड प्यार कर..
चिड़िया सा पाळूगी ..
फिर जवान होने पर..
समझा बुझा..
घोंसले से निकालूँगी ..
चंद आँसू होंगे उसके..
और मेरे भी..
यही रीत है पुरानी..
हर बेटी की यही कहानी..
अच्छी है या बुरी है..
मगर रीत प्रेम से जुड़ी है..
गर मात-पिता ने..
रीत ना निभाई..
तो प्रेम लेता है अंगड़ाई..
फिर लैला-मजनू..
शिरी-फरहाद ;हीर- राझा..
पैदा होते हैं..
दोनों ही प्रेम में मरते..
मात-पिता रोते हैं..
भावनाओं की नदी बही हैं..
बाबुल के प्यार के बीच..
प्रेमी का प्यार भी सही है..
कभी कभी बेटी..
बाबुल के घर आयेगी..
लगेगी परायी सी..
उसे मेहमान सा एहसास..
कराया जाएगा..
एक औपचारिकता का रिश्ता..
निभाया जायेगा..
वो बेचारी ठगी सी..
बाबुल को ताकेगी ..
बाबुल की खुशी के लिये..
अपना मुँह सी लेगी..
दर्द चाहे जितना हो भरा..
कृत्रिम मुस्कान..
मुँह पर ला..
अच्छी हूँ पापा कह देगी..
बाबुल एहसास करायेगा..
घर अब वही है तेरा..
वही तेरा परिवार..
वहीँ तेरा साँझ सवेरा..
इस अनोखे रिश्ते को..
सारी दुनिया ने माना है..
संसार को एक करने बाना है..
बेटी तुम भी मान लो..
यही संसार है..
रिश्तों का व्यवहार है..
खुश रहो तुम सदा..
यही है बाबुल की दुआ..!!
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कविता की विवेचना:-
"ये कैसा रिश्ता" ( Ye kaisa rishta) कविता भारतीय समाज में बेटी के जन्म से लेकर उसकी विदाई और विवाह के बाद के जीवन की एक कड़वी, संवेदनशील और व्यावहारिक वास्तविकता को उजागर करती है।
कविता की शुरुआत में बेटी का अपने मायके में बचपन, उसका प्यार और लाड-प्यार दर्शाया गया है। लेकिन जैसे ही वह बड़ी होती है, "पराया धन" जैसी सदियों पुरानी कहावतें उसके अपने ही घर में बेगानापन घोल देती हैं।
कवि ने इस मानसिक द्वंद्व को बेहद स्पष्टता से उकेरा है कि जिस बेटी को जीवन भर हर अनजान स्पर्श और बुरी नजर से बचाया गया, विवाह के नाम पर वही बेटी अचानक एक अजनबी को सौंप दी जाती है।
कविता शाख से टूटे पत्ते के रूप में स्त्री की विवशता को दर्शाती है, जिसे हर स्थिति में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। आगे चलकर यह सामाजिक रीतियों और मानवीय भावनाओं (प्रेम) के बीच के संतुलन को भी रेखांकित करती है।
यदि समाज परंपरा और प्रेम के बीच तालमेल न बिठाए, तो यह सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाता है।
अंत में, मायके में मेहमान बन जाने का दर्द और चेहरे पर झूठी मुस्कान रखकर "सब ठीक है" कहने की नियति, भारतीय नारी के त्याग को बखूबी बयान करती है।
कवि का उद्देश्य:-
"ये कैसा रिश्ता" कविता के माध्यम से कवि का मुख्य उद्देश्य स्त्री जीवन के उस सबसे बड़े दर्द और विरोधाभास को सामने लाना है, जिसे समाज प्रायः "परंपरा" का नाम देकर अनदेखा कर देता है।
कवि पाठक को यह सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं कि कैसे एक ही पल में अपने ही माता-पिता और घर बेगाने हो जाते हैं।
कवि समाज की इस दोहरी मानसिकता पर सवाल उठाते हैं कि जो बेटी कभी "दिल का टुकड़ा" थी, वह अचानक "पराया धन" कैसे बन जाती है।
इसके साथ ही, कवि परंपराओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक संतुलन की पैरवी करते हैं, ताकि वैवाहिक रीतियाँ केवल एक औपचारिकता न बनकर प्रेम और सम्मान का आधार बनें।
अंततः "ये कैसा रिश्ता"कविता कवि का ध्येय स्त्री के त्याग, उसके मानसिक संघर्ष और एक नए जीवन में ढलने की उसकी अद्भुत क्षमता को सम्मान देना है।बेटियां समाज की आन बान शान हैं, त्याग बलिदान की प्रतिमूर्ति हैं.
कृपया कविता को पढे और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें.
....इति
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Author is a member of SWA Mumbai .
Copyright of poem is reserved .

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