प्यार विचित्र है- एक प्रेम कविता
मेरा प्यार है आजाद..
किसी नियम से..
बंधा नहीं..
ना कहीं सीखा..
स्वभाविक स्वकेन है..
ईश्वर की देन है..
ना आलिंगन..
ना गुलाब का फूल..
ना हांथ में हांथ..
तुम में खोया खोया..
जैसे हवा में धूल..
तेरा नूरानी चेहरा..
याद है मुझे..
बाकी सब गया भूल..
तुम्हारे पसंद के रंग..
दिल उड़ती पतंग ..
तितलियां रंग बिरंगी..
खुश हैं फूलों के संग..
तेरी पसंद का इत्र..
है ना प्यार विचित्र..
क्या तुम्हें है पता..
मुझे है तुम्हारी..
कितनी परवाह..
तुम्हारी पसंद की काफ़ी..
मुझे भी है भाती..
सोता हू तो..
सपने में भी तुम आती..
मेरी आत्मा..
ढूँढती है परमात्मा..
तुम मिल जाती हो..
तुम से आत्मा को..
कैसे दूर रखूं..
तुमसे मिलने को बेचैन है..
खो ना जाये कहीं..
जो तेरे दिल में चैन है..
मुझे पता है..
तुम्हारी पसंद ना पसंद..
कैसे नियम हैं..
मेरे दिल के..
तुमसे मिलते जुलते..
तेरी यादों की ठौर..
मेरी सांसो की डोर..
मन का ख्याल शांत..
एक सीमित दायरा..
जिसमें डोल रहा..
प्यार हमारा..
घुटन भी ना हो..
और रहे जैसे..
समुद्र का किनारा..
कभी कोई आघात..
पहुँचाया हो तुम्हें..
अनजाने में..
सज़ा के लिये..
हाजिर हूँ मैं सदा..
कभी भी आजमा ले..
ये जान तुम्हारे हवाले..
मेरा दिल भरा पडा है..
तुम्हारी परवाह..
तारीफ़ के सलीको से..
कैसा तुम्हें जहान चाहिये..
चलो बना दूँ मैं..
भरा पूरा रंग बिरंगे ..
फूलों के बगीचों से..
प्यार विचित्र है..
कैसा बना दिल में..
मोहब्बत का चित्र है..
मैं कहता हूँ प्रिया..
तू कहती मुझे मित्र है..
प्रिय कहो..
एक दूसरे के दिल में रहो..!!
🥀Jpsb blog
'प्यार विचित्र है' कविता प्रेम के उस अलौकिक और अनूठे रूप को दर्शाती है जो पारंपरिक सीमाओं, नियमों और सांसारिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त है।
कविता की विवेचना:-
'प्यार विचित्र है' ( Pyar vichtra hai)शीर्षक से रचित यह कविता प्रेम की गहन, स्वाभाविक और अध्यात्म से जुड़ी अनुभूति को अभिव्यक्त करती है।
कवि का प्रेम शारीरिक आकर्षण, स्पर्श या उपहारों (जैसे आलिंगन या गुलाब) का मोहताज नहीं है; बल्कि यह ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक सहज और निश्छल भावना है।
प्रेम की यह स्थिति हवा में उड़ी धूल की तरह प्रिय में पूरी तरह लीन हो जाने की है, जहाँ प्रेमी को प्रिय के नूरानी चेहरे के अलावा संसार की अन्य सभी बातें भूल जाती हैं।
कविता में प्रिय की पसंद-नापसंद, उसके पसंदीदा रंग, कॉफ़ी और इत्र को अपनी जीवनशैली में ढालने का सुंदर वर्णन है। यह समर्पण केवल बाहरी न होकर आत्मिक स्तर पर है।
कवि अपनी आत्मा को प्रिय में खोजता है और उसे परमात्मा के समान दर्जा देता है। प्रेम यहाँ एक ऐसी स्थिति में है जहाँ न तो घुटन है और न ही असीमित स्वतंत्रता, बल्कि यह 'समुद्र के किनारे' की तरह एक शांत और संतुलित दायरे में बहता है।
कविता के अंत में एक मार्मिक विरोधाभास सामने आता है—प्रेमी अपने प्रिय को 'प्रिया' मानकर संपूर्ण समर्पण और जीवन न्योछावर करने को तैयार है, जबकि दूसरी ओर से उसे केवल 'मित्र' का संबोधन मिलता है।
इसके बावजूद, प्रेमी के मन में कोई शिकायत नहीं है, बल्कि वह इस अनूठे रिश्ते में भी एक-दूसरे के दिल में रहने की पवित्र कामना रखता है।
कविता का उद्देश्य:-
इस कविता का मुख्य उद्देश्य प्रेम को सांसारिक और औपचारिक बंधनों से ऊपर उठाकर उसकी विशुद्ध, आत्मिक और निस्वार्थ प्रकृति को उजागर करना है।
कवि यह संदेश देना चाहता है कि सच्चा प्रेम केवल पाने या भौतिक अभिव्यक्तियों (जैसे उपहार या स्पर्श) तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह प्रिय की खुशी, उसकी पसंद-नापसंद की परवाह करने और उसके प्रति पूर्ण समर्पण का नाम है।
यह कविता प्रेम में स्वतंत्रता और सम्मान के संतुलन को दर्शाती है, जहाँ बिना किसी घुटन के एक दायरा बना रहता है। जब प्रेम में कोई स्वार्थ नहीं होता, तो प्रिय द्वारा 'मित्र' कहे जाने पर भी समर्पण भाव कम नहीं होता।
अंततः, यह रचना पाठक को यह समझाती है कि प्रेम ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है, जो आत्मा को शांति देता है और रिश्ते की परिभाषा से परे जाकर भी निस्वार्थ बना रहता है।
स्लोगन
"नियम और बंधनों से मुक्त जहाँ निष्काम भाव का प्रवाह है, वही सच्चा और विचित्र प्रेम का एहसास है।"
...इति
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Author is a member of SWA Mumbai .
Copyright of poem is reserved.

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