Sunday, August 16, 2026

प्यार कहाँ है (Pyar kahan hai)

प्यार कहाँ ?💕
प्यार तलाशती कविता..क्या प्यार मिला?
   
Pyar kahan ?
Pyar kahan ?💕
Image Created by: GemineAI 


मिला ना मुझे..
कोई प्यार कभी..
जब कि मैंने..
तलाश बहुत की..

सोचा था..
कभी ना कभी..
मिलेगा कोई ..
जो चाहेगा..
मुझे भी..

मगर सिर्फ ..
प्यार की कदर कहाँ..
प्यार के साथ..
धन का रिश्ता..
क्या वो प्यार है..

चलो कर लो..
एक सुलह..
सौदा कर लो..
प्यार का..
कह दो इसे शादी..

क्या ये सौदा..
कभी निभा..
प्यार इसमें..
कहाँ था..
प्यार का बन्धन..
किसने कहा..

तब भी इससे..
एक परिवार बना..
बेटा-बेटी का..
संसार बना..
हम माता-पिता हुये..

प्यार का रिश्ता..
हमारी संताने..
प्यार को पहचाने..
माता-पिता का प्यार..
उन पर था सरोबार..

यह प्यार तो..
सच्चा था..
प्यार हमारा बच्चा था..
बच्चों के सपने..
कितने लगे अपने..

लंबी दूरी..
लंबा इंतजार..
कहाँ प्यार का इजहार..
क्या हम दोनों में था..
बच्चों के रूप में पनपा..

आज बच्चे ही..
हमारा प्यार है..
यही तो..
संसार है..
प्यार कहाँ?
घूम फिर जवाब मिला..!

🥀Jpsb blog 🥀


कविता की विवेचना:-

​"प्यार कहाँ है "( Pyar kahan hai)कविता मानव जीवन की एक गहरी और व्यावहारिक सच्चाई को उजागर करती है। कवि की यह यात्रा रोमांटिक प्रेम की असफलता से शुरू होकर वात्सल्य (माता-पिता के प्रेम) की पूर्णता तक पहुँचती है।

​शुरुआत में, कवि जीवनसाथी के रूप में सच्चे प्रेम की तलाश में भटकता है, लेकिन उसे केवल निराशा हाथ लगती है। 

कवि इस कड़वे सच पर चोट करता है कि आधुनिक समाज में प्रेम की कदर कम और धन-संपत्ति का मोल अधिक है। 

जब सच्चा भावनात्मक लगाव नहीं मिलता, तो विवाह महज़ एक "सौदा" या "समझौता" बनकर रह जाता है।

 कवि यहाँ समाज में विवाह की गिरती मर्यादा और उसमें मौजूद व्यावसायिकता पर सवाल उठाता है।

​लेकिन कविता का असली सौंदर्य और मोड़ इसके दूसरे भाग में आता है। भले ही दो आत्माओं के बीच वह रोमांटिक प्रेम न पनप पाया हो, लेकिन उस समझौते (विवाह) के परिणामस्वरूप संतान का जन्म होता है। 

बच्चे के रूप में जब माता-पिता को निस्वार्थ प्रेम देने का अवसर मिलता है, तब उन्हें प्रेम की वास्तविक परिभाषा समझ आती है।
 जो प्यार वे दुनिया या साथी में खोज रहे थे, वह वात्सल्य के रूप में उनके अपने बच्चों में प्रस्फुटित होता है। 

बच्चे ही माता-पिता का संसार बन जाते हैं। कविता यह संदेश देती है कि प्रेम केवल दो प्रेमियों के बीच का आकर्षण नहीं है, बल्कि त्याग, निस्वार्थ सेवा और अपने बच्चों के प्रति समर्पण ही प्रेम का सबसे पवित्र और सच्चा रूप है।

​कवि का उद्देश्य:-

​इस कविता को लिखने का मुख्य उद्देश्य पाठक को प्रेम के सच्चे और वास्तविक रूप से परिचित कराना है। 

कवि समाज को यह समझाना चाहता है कि धन और स्वार्थ पर टिके विवाह या संबंध कभी आंतरिक तृप्ति नहीं दे सकते। 

सच्चा प्रेम बाहर की दुनिया में ढूँढने के बजाय निस्वार्थ रिश्तों में झलकता है। कवि का उद्देश्य निराश दिलों को यह दिलासा देना भी है कि यदि जीवनसाथी के रूप में रोमांटिक प्रेम न भी मिले, तो भी जीवन खाली नहीं रहता—माता-पिता का बच्चों के प्रति निष्काम वात्सल्य ही ईश्वर का सबसे सच्चा और महान प्रेम है।

"प्यार कहाँ है " कविता प्यार तलाशती है,प्रेमी प्रेमिका तो नहीं मिला मगर वात्सल्य प्रेम सच्चा मिला जो प्यार की तलाश का जवाब था.

कृपया कविता को पढे और शेयर करें. 

...इति 

🥀Jpsb blog
 jpsb.blogspot.com 
Author is a member of SWA Mumbai.
Copyright of poem is reserved. 

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