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| Bramhand ka hissa Image Created by :WhatsApp AI |
मैं नहीं जानता मेरे..
पृथ्वी पर होने का किस्सा,
पर जानता हूँ..
मैं हूँ ब्रम्हांड का हिस्सा।
ये तारे, ये नदियाँ,
ये बहती हवाएँ,
ये अम्बर की गहराई,
ये अम्बर की गहराई,
सूनी दिशाएँ,
मेरी रगों में बहती है सृष्टि ,
जो इस ब्रह्मांड के..
मेरी रगों में बहती है सृष्टि ,
जो इस ब्रह्मांड के..
कण-कण में है बसी।
मिट्टी का पुतला हूँ,
मिट्टी का पुतला हूँ,
मिट्टी में मिलूँगा,
पर बनकर सुगन्ध..
पर बनकर सुगन्ध..
मैं फिर से खिलूँगा।
ये जीवन तो बस..
ये जीवन तो बस..
एक पड़ाव है छोटा,
न जनम मेरा पहला,
न जनम मेरा पहला,
न अंत है ये आखिरी..
अनंत से हूँ मैं अनन्त तक रहूँगा
यही किस्सा बार बार कहूंगा..
मैं रूप बदलता हूँ,
मैं वस्त्र बदलता हूँ,
मैं बनकर किरण रोज..
मैं बनकर किरण रोज..
अंधियारे से लड़ता हूँ।
न आग मुझे छुए,
न आग मुझे छुए,
न शस्त्र मुझे काटे,
मैं वो अंश हूँ जिसे कोई न बाँटे।
मैं आदि से पहले था,
मैं वो अंश हूँ जिसे कोई न बाँटे।
मैं आदि से पहले था,
मैं अंत के पार हूँ,
इस मरुभूमि में बहती ..
इस मरुभूमि में बहती ..
अमृत की धार हूँ।
काल का पहिया ..
काल का पहिया ..
मुझे बाँध न पाया,
मैंने तो बस ..
मैंने तो बस ..
इस धरा पर जनम पाया।
जब कुछ भी नहीं था,
जब कुछ भी नहीं था,
तब भी मैं ही था,
जब सब मिट जाएगा,
जब सब मिट जाएगा,
तब भी मैं रहूँगा।
एक अमर, अटूट, अजन्मा ..
एक अमर, अटूट, अजन्मा ..
अमर ज्योति हूँ,
मैं समय की लहरों में..
मैं समय की लहरों में..
बहता हुआ मोती हूँ।
आत्मा के रूप में ..
आत्मा के रूप में ..
न कभी मैं मिटूँगा,
अनंत काल से हूँ,
अनंत काल से हूँ,
अनंत काल तक रहूँगा।
मिट जाएगा एक दिन..
मिट जाएगा एक दिन..
यह सांसारिक किस्सा,
पर अमर सत्य है,
पर अमर सत्य है,
मैं हूँ ब्रम्हांड का हिस्सा।
Jpsb blog
कविता की विवेचना:
ब्रम्हांड का हिस्सा( Bramhand ka hissa)कविता की विवेचना निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के आधार पर की गई है:
लेखक का दृष्टिकोण और उद्देश्य (Writer's View & Purpose)
लेखक का दृष्टिकोण और उद्देश्य (Writer's View & Purpose)
यह कविता मानव अस्तित्व के सबसे गहरे आध्यात्मिक प्रश्न—"मैं कौन हूँ और यहाँ क्यों हूँ?"—को टटोलने के उद्देश्य से लिखी गई है। भौतिक संसार में मनुष्य अक्सर खुद को सीमित और नश्वर (मिटने वाला) समझकर भयभीत रहता है। लेखक का दृष्टिकोण इस संकीर्ण सोच से परे है। वह पाठक को यह याद दिलाना चाहता है कि हमारा जीवन केवल इस पृथ्वी और इस शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि हम उस विशाल और अनंत ब्रह्मांड का एक अभिन्न अंग हैं।
कविता का मूल भाव (Core Theme)
कविता की शुरुआत अज्ञानता की स्वीकारोक्ति से होती है, जहाँ भौतिक जन्म एक रहस्य है। परंतु, जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ती है, लेखक आत्मा और परमात्मा के अद्वैत संबंध को उजागर करता है। पंचभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) जिससे ब्रह्मांड बना है, वही मनुष्य के भीतर भी है। लेखक भगवद्गीता के संदेश (नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि) को आधुनिक संदर्भ में ढालकर समझाता है कि शरीर बदल सकता है, लेकिन चेतना अमर है।
लेखक के विचारों की सत्यता (Truth of the Writer's Thoughts)
अंत में, लेखक का यह विचार कि "मैं आत्मा के रूप में अनंत काल तक रहूँगा" केवल एक काल्पनिक दर्शन नहीं, बल्कि पूर्ण सत्य है।
• आध्यात्मिक सत्य: सनातन दर्शन और वैश्विक रहस्यवाद हमेशा से मानते आए हैं कि आत्मा अजन्मा और अविनाशी है। मृत्यु केवल शरीर का अंत है, चेतना का नहीं।
• वैज्ञानिक सत्य: आधुनिक विज्ञान का 'ऊर्जा संरक्षण का नियम' (Law of Conservation of Energy) भी यही कहता है कि ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही बनाया जा सकता है, वह केवल रूप बदलती है। हम सब 'स्टारडस्ट' (तारों की धूल) से बने हैं।
अतः लेखक का यह विचार पूरी तरह सत्य और प्रामाणिक है कि सांसारिक किस्सा खत्म होने के बाद भी, ब्रह्मांड के हिस्से के रूप में हमारा अस्तित्व अनंत काल तक कायम रहेगा।
कृपया कविता को पढे और शेयर करें.
इति...
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Author is a member of SWA Mumbai Copyright of poem is reserved

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