Monday, May 9, 2022

मेरी मां (Meri maa)

             
Meri Maa
Meri Maa 
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मेरी " माँ " 
मेरी ईश्वर भगवान है..
मेरी जान लाखो बार..
माँ पर कुर्बान है..
मुझे इस पृथ्वी पर..
जन्म दिया..
मेरी हर बात को सुना..
ईश्वर के सुझाये..
कई बेटों में से..
तुमने मुझे चुना..

"माँ" मेरी खास है..
मेरे दिल के सदा पास है..
मैं माँ का रहा विशेष..
लाडला उसकी..
आँखों का तारा..
मुझे जरा सी तकलीफ में..
दिया हमेशा..
अपने स्नेह प्यार का..
बहुत मजबूत सहारा..

अचानक माँ को आया..
भगवान का बुलावा..
ना चाहते हुये भी..
ईश्वर के पास चली गई..
मेरी सितारें सी चमक..
माँ के साथ जाती रही..
यह शरीर रूपी लास..
पृथ्वी पर बाकी रही..

कई बार..
बार बार याद आती हो..
"माँ" 
मैने पुकारा..
क्या तुमने नहीं सुना..
तुमने बीच रास्ते..
मुझे छोड़..
भगवान को क्यों चुना..
क्या भगवान के आगे..
तुम्हारी इच्छा ना चली..
माँ तुमने जरूर..
मांगी होगी ईश्वर से..
मेरी भली..


माँ तुम मिलोगी ना..
एक बार फिर..
तुम्हें याद कर करके..
आँखों में .. 
भर आता है नीर ..
माँ सदा..
अपने दिल में..
चरणों में मुझे रखना..
अनंत जन्मों तक ना खोना..
हर जन्म मेरी "माँ "होना..!!

_Jpsb 

कविता की विवेचना: 

मेरी माँ /Meri Maa कविता में लेखक अपनी माँ को बड़ी सिद्दत से  याद करता है, जो समय पहले ईश्वर के बुलावे पर स्वर्ग सिधार चुकी है. 

लेखक अपनी "माँ "से बेइंतहा प्यार करता है, मगर माँ अब सामने प्रत्यश रूप में नहीं है पर लेखक हमेशा माँ को अपने पास पाता है. 

इंसान का सब कुछ छिन जाये मगर माँ से कभी ना जुदा हो, माँ के बगैर बेटी बेटे का नूर चला जाता है और वो एक जिंदा लाश रह जाता है. 

वो बहुत भाग्यशाली हैं जिनकी माँ लंबी उम्र तक साथ रहती हैं, उन्हें संपूर्ण जीवन अमृत नसीब होता है, माँ का आशीर्वाद और भाग्य हमेशा जीवन में आयी बाधाओं को आसानी से दूर करता है. 

"मेरी माँ " कविता में माँ लेखक के लिए शक्ति पुंज है, आशीर्वाद है, छत्रछाया है, रक्षा कवच है, उत्साह, हेमंत है, माँ जीवन संचार है, माँ बिन जीवन बेकार है, माँ जीने की प्रेरणा है. 

कृपया कविता को पढे और शेयर करें. 
सभी को माँ का प्यार और आशीर्वाद सदेव मिले. 

_Jpsb 

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Saturday, May 7, 2022

बचपन याद आता है (Bachpan yaad aata hai)

              
बचपन याद आता है
बचपन याद आता है 
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बचपन में ख्वाहिश थी..
जल्दी बड़ा होना था ..
अपने सपनों के..
किसी बड़े शहर में..
डूबना और खोना था..
शहर गांव वालों को..
स्वर्ग सा दिखता था..

प्रकृति की गोद में ..
बसा अपना गाँव..
जंगल नजर आता था..
बात बात पर..
शहर का परिदृश्य..
उभर आता था ..
शहर का हर नजारा..
दिल को बहुत भाता था..

बड़े होते ही..
बड़े शहर की ओर..
शिद्दत से कूच किया..
वही अपना ठौर ठिकाना..
किसी तरह बना लिया..
अच्छा लगा..
सपना सच होता देखकर..
मिला बहुत सकूँ और चैन..
मिल गई..
जैसे मंजिल शांत हुआ..
मन था जो बेचैन..

कुछ सालों बाद..
अचानक सपना टूटा..
शहर लगा जैसे..
बैल के गले का खूँटा..
बिल्डिंगों का जंगल..
चारो ओर धूल पॉल्यूशन..
इंसानों की बेइंतिहा भीड़..
खडे होने की भी..
कहीं जगह नहीं..
जो बचपन में..
स्वर्ग नज़र आता था..
अब नरक लगने लगा..

तड़फ गये..
सुद्ध थंडी हवा को..
अब अपना गाँव..
बहुत याद आता है..
मन अपनी..
शहर आने की..
गलती पर..
बहुत ज्यादा पाश्चाताता है..
अब पता चला..
गाँव असली स्वर्ग है..

हमने स्वर्ग को..
ठुकराया है..
क्यों शहरी नरक को..
अपनाया है..
अब समय चक्र..
वापिस घुमाना चाहता हूं..
अपने बचपन में..
गाँव लौट जाना चाहता हूं..
बचपन का शकुन और..
अथाह आनंद याद आता है..

गाँव के आलोकित..
प्राकृतिक दृश्य..
धरती पर..
स्वर्ग का सा..
एहसास दिलाते हैं ..
गाँव के नजारे ..
अपनी ओर खींचते हैं..
अपनी प्राकृतिक..
बाहों में भीचते हैं..


हम अपने आप से..
पूछते हैं ..
कि क्यों बड़े हुए..
क्यों अपने पैरों पर..
खडे हुए..
हम बच्चे ही अच्छे थे..
खेल कूद मौज मस्ती..
और बातों के लच्छे थे..
अब जबरन..
जिंदगी ढ़ो रहे हैं..
मन ही मन..
बड़े होने पर..
छुप छुप कर रो रहे हैं..!!

_JPSB 

कविता की  विवेचना: 

बचपन याद आता है/Bachpan yaad aata hai कविता बचपन की मधुर सुहानी यादों से जुड़ी है ,जो कि अब शहर में रहकर बहुत याद आती हैं. 

गाँव  के स्वच्छंद प्राकृतिक वातावरण में गुजारा बचपन स्वर्ग सी यादों सा है, जब गाँव में रहते थे शहर के सपने सुहाने लगते थे.

लगता था शहर में बहुत अद्भुत चीज़ है जो हमसे छुट गई है, किसी भी तरह शहर की जिंदगी को पाना है जैसे स्वर्ग  में  जाना है. 

गाँव के उस अद्भुत प्राकृतिक वातावरण का एहसास नहीं था, दूर के ढोल सुहाने जैसे शहर का शरुर स्वार था कि कब जल्दी से बड़े हो और शहर में जा कर बस जाये. 

वो दिन भी आया बड़े हुये और शहर में आकर अपना ठौर ठिकाना बना लिया, जैसे सपना पूरा हुआ और सब कुछ पा लिया, कई शहर घुमे कुछ दिन मस्ती में झूमे. 

एक  दिन अचानक सपना जैसे टूटा शहर लगने लगा नरक सा  इतनी भीड़ इंसानों की, हर जगह लाइन बैठने को भी जगह नहीं.

धूल प्रदुषण सब ओर, पेड़ों का नामों निशान नहीं, पेड़ की थंडी छाव को तरसे, उम्मीद लगाये कब बादल आये और छम छम बारिश हो, चारों ओर हरियाली वातावरण मदमस्त हो. 

मगर ऐसा गाँव का वातावरण शहर में कहाँ, गाँव का मनोहर वातावरण गाँव  में ही मिल सकता  है.

जो पहले बचपन में कदर ना करके गवाया था ,अब याद आता है मन  बहुत पाश्चाताता है. 

"बचपन याद आता है " कविता में लेखक शहर की जिंदगी से तंग आकर बचपन में लौट जाना चाहता है, उसे अपना गाँव वहाँ का वातावरण, महौल ,प्राकृतिक सौंदर्य बहुत याद आता है, इस उम्र में भी लेखक गाँव वापिस जाना चाहता है. 

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ब्रह्मांड और ज्ञान (Bramhand aur gyan)

           
Bramhand aur gyan
Bramhand aur gyan
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मैं तैरता हूं ब्रह्मांड में..
कोई ठौर नहीं मिलती..
ग्रहो तारों, आकाशगंगाओं..
की कोई नहीं गिनती..
अनंत ब्रह्माण्ड का..
अन्त कहाँ..
एक सौर यहां तो..
दुसरा सौर कहाँ..

किसका है ये चमत्कार..
कौन है रचनाकार..
ग्रह बने विचार..
तैर रहे हैं चारों तरफ..
अपनी मर्यादा में रहकर..
ब्रह्मांड में घूम रहे हैं..
सूरज तारों और..
प्रज्वलित ग्रहो की चमक में..
प्रफुल्लित झूम रहे हैं..

तैरते तैरते थक गया हूं..
पृथ्वी पर ..
आना नहीं चाहता..
और किसी ग्रह पर..
ठिकाना नहीं पाता..
क्या यह हकीकत है..
या मैं सपना देख रहा हूं..
मैं करोड़ों..
प्रकाश वर्षो दूर..
कैसे देख रहा हूं..

अद्भुत है सपना..
जो कि कुदरत की..
हकीकत है..
हमारा ज्ञान भी..
कितना सीमित है..
पृथ्वी पर..
पेट भरने..
थोडी मौज मस्ती..
जीने मरने..
तक ही अपनी सारी ऊर्जा..
खपा रहें हैं..

कूप मंडूक से..
सीमित ज्ञान पर ही..
खूब इतरा रहें हैं..
हकीकत में हमारा..
ब्रह्मांड और ईश्वर के..
बारे में ज्ञान..
शून्य है..
हम इंसान..
सीमित ज्ञान विज्ञान..
के दायरे में गुम हैं..

इससे ज्यादा..
हो भी नहीं सकता..
क्यों कि यही है..
ईश्वर की इच्छा..
इतने से..
सीमित ज्ञान होने पर भी ..
इंसान ने..
पृथ्वी पर उद्यम मचाया..
अगर ज्ञान..
विस्तारित किया..
तो फिर क्या होगा..

ईश्वर को भविष्य दिखा..
अगर और ज्ञान..
इंसान ने पाया..
तो यह कई ग्रहो को..
तहस  नहस कर देगा..
इस ब्रह्मांड को..
दुखों से भर देगा..
इसके लिए..
ज्ञान का..
सीमित दायरा ही अच्छा ..

जो दिया गया..
इंसान को सम्भाल..
नहीं पाया..
और ज्ञान ये इंसान..
क्या लेगा..
इससे तो..
यह भी छीन लेना चाहिए..
ईश्वर ने बहुत सोचा..
कि इंसान को..
ज्ञान के नाम पर..
शून्य देना  चाहिये..!!
   

_JPSB  

कविता की विवेचना:

ब्रम्हांड और ज्ञान/Bramhand aur gyan कविता ईश्वर कि आलोकित कृति ब्रम्हांड के बारें में इंसान का ज्ञान ना के बराबर है. 

ईश्वर ने इंसान के ज्ञान का विस्तार क्यों नहीं किया, क्यों इतने सारे रहस्य बने हुये हैं,  शायद भगवान इंसान को परख रहा है कि दिए हुये ज्ञान का इंसान किस प्रकार उपयोग करता है. 

इंसान इस परीक्षा में फैल हुआ है, पृथ्वी पर विनाश और महाशक्ति बनने की होड़ जारी है, इस होड़ में  इंसान ने इंसान को मारा और दूसरे जीवों का अस्तित्त्व खतरे में डाल दिया. 

क्या ईश्वर ने जो दिमाग और ज्ञान इंसान को दिया गलत किया नहीं देना चाहिए अब भी दिया हुआ ज्ञान वापिस ले लेना चाहिए, तब ही पृथ्वी की सभी समस्याओं का हल निकल जायेगा हर जीव  शांति से जी पायेगा. 

" ब्रम्हांड और ज्ञान " कविता इंसान के ब्रम्हांड के बारे में ज्ञान की शून्यता के  विषय पर प्रकाश डालती है कि अगर भगवान ने यह ज्ञान इंसान को दिया होता तो इंसान कई गृहों को  नुकसान पहुंचाता जैसा कि इंसान पृथ्वी को नुकशान पहुंचा रहा है. 

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Thursday, May 5, 2022

पुराने दोस्त (Purane Dost)

              
Purane Dost
Purane Dost 
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दिल के  ज़ख़्म..
हरे हो जायेंगे..
जब पुराने दोस्त..
सामने खडे हो जायेंगे..
जब तक..
ताना ना मारे दोस्त कैसा..
दिल पर चोट देकर..
लगाये मरहम और पैसा..

जब तक ना दे तकलीफ..
दोस्त प्रतीत नहीं होता..
दर्द दे और गले लगाए..
मिलते ही अच्छा मौका..
दोस्तो का हक है..
लडना झगड़ना ..
जब तक तकरार ना हो..
दोस्ती का मजा कहां..

दोस्ती में..
लुका छुपा कर ऑपचारीक.. 
बात नहीं होती..
बुरा लगे तो दोस्त..
सुनाये खरी खोटी..
हक से..
लडना रूठना..
मनाने पर..
तुरंत मान जाना..
फिर कुछ ना पूछना..

दिल पर चोट कर कर..
सीसे से पत्थर बना दिया ..
फिर उस पत्थर से..
आईना टकरा दिया..
आईने में साफ़ दिखती है..
सूरत यार की..
कभी यादें धुंधली ना होती..
दोस्त के प्यार की..

दोस्ती एक..
अनोखा प्यारा रिश्ता है..
खून के रिश्तों से..
ज्यादा टीकता है..
दोस्त..
कितना भी हो खफा..
नाजुक मौके पर..
निभाता है पूरी वफा..

कोई गिला सिकवा ..
शिकायत दिल में..
दबी नहीं रहती..
दोस्त सामने आया तो..
कडवी बात भी..
हक से कह दी..
दोस्ती का..
बहुत ऊंचा मुकाम है..
इसलिए दोस्ती का ..
बहुत ऊंचा नाम है..!! 

_JPSB 

कविता की विवेचना: 
पुराने दोस्त/Purane Dost कविता दोस्ती के अनोखे प्यारे बंधन और रिश्ते को रेखांकित करती है. 

दोस्त ताना मार दिल दुखायेगा भी फिर मरहम लगा गले लगायेगा भी, दोस्त बार बार अपने अधिकारों की सीमा परखने के लिए लडता झगड़ता है. 

दोस्त दोस्त के नजदीक रहना चाहता है अपना हक जताना चाहता है इसलिए रूठता भी है ताकि दोस्त उसकी अहमियत को समझे और उसे मनाए. 

दोस्तो के बीच कोई ऑपचारीकता नहीं होती चुभने वाली बात भी सीधे कह दी जाती है, बुरा मनाने का कोई दर या दबाव नहीं होता. 

"पुराने दोस्त " कविता दोस्ती के अनुपम अनोखे प्यार का लघु वर्णन है दोस्ती की गहराईया अनंत हैं, सच्चे दोस्त इसे समझते हैं. 

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_Jpsb 

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