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आत्मा, परमात्मा और भाग्य
आत्मा है ज्योति, अमर उजियारा,p
देह में बसता ईश दुबारा।
शुद्ध, अचल, निर्लेप, निरंतर,
साक्षी बनता सुख-दुख अंदर।
परमात्मा है अनंत सागर,
जहाँ नहीं कोई भय या आगर।
वो ही स्रोत सभी विचारों का,
वो ही अंत सभी व्यवहारों का।
भाग्य तो बस एक दर्पण है,
कर्मों का निर्मल पर्यायन है।
जो बोया हमने विचारों में,
वो ही खिलता है संसारों में।
आत्मा जब परमात्मा में लय पाती,
तभी सृष्टि की सच्ची थाती।
ना भाग्य शेष, ना माया बंधन,
बस प्रेम, प्रकाश और चिर आनंदन।
परमात्मा की कृपा जब बरसे,
तो भाग्य के द्वार स्वयं ही तरसे।
निर्मल आत्मा बनती पात्र वही,
जिस पर दृष्टि पड़े प्रभु सरीखी।
जिनके मन में करुणा, शांति, सत्य,
उनका जीवन बनता शुभ न्यत्य।
कर्म पवित्र तो फल मधुरतम,
कृपा से बदलता भाग्य अमरतम।
आत्मा की निर्मलता जब जागे,
तो अंधियारे में प्रकाश भागे।
परमात्मा की छाया में जो जीता,
वो ही सच्चे सुख का रस पीता...
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कविता की विवेचना:
"परमात्मा आत्मा और भाग्य" कविता मे निर्मलता तथा परमात्मा की कृपा से भाग्य के उत्तम होने की भावना दर्शायी गयी है.
परमात्मा की कृपा सिर्फ भगवान के शरणागत में ही निहित है, सच्चे मन से जिसने नाम जपा भगवान के तप में तपा और आत्मा पवित्र सुद्ध कर ली उसने भगवान की लड पकड़ ली, वो परमात्मा का अपना हो गया.
परमात्मा की कृपा अपनों पर सदेव बरसती है, भाग्य का उदय स्वतः ही हो जाता है जहां तुम्हारे साथ विधाता है.
"परमात्मा आत्मा और भाग्य " कविता में यह स्पष्ट किया गया है, नाम जप परमात्मा की शरण आत्मा को पवित्र कर देती है और भाग्य सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है, लोक परलोक सब सुधर जाता है...एक ही जादू नाम जाप करो दिन रात भाग्य की होगी बरसात.
....इति...
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