Wednesday, December 17, 2025

आजादी का हिसाब (Aajadi ka Hisab)



आजादी का हिसाब - देश भक्ती कविता 
Aajadi ka hisab
Aajadi ka hisab
Image Generate by AI


आओ साथियो, बैठो ज़रा,
आजादी का हिसाब करें,
लाल किले की प्राचीरों से
निकले सपनों का हिसाब करें।

किसको मिली आज़ादी,
क्या पेट भर सकी भूखों का?
क्या खेतों तक पहुँची खुशहाली,
या रह गई चंद अमीरों की शोभा?

आज भी गरीब भूखा है, 
बच्चों का स्कूल नहीं..
खेतों में पसरा सूखा है..
दवा कहाँ दवाखाने ने लूटा है..

फांसी के फंदों से झूल गए जो, 
उन शहीदों ने सपने बोए थे,
उनकी कुर्बानी की कीमत में
 हम सब भी रोयें थे..

अंग्रेज़ गए, हुक्म बदला,
पर हुक्म चलाने वाले वही,
कल गोरे थे, आज देसी हैं,
पर ज़ंजीरें ढोने वाले वही।

क्या आजादी थी लीलामी ,
पूँजीवाद ने जो हथिया ली, 
लोकतंत्र का ले कर मंत्र..
गरीब को एक वोट थमा दी.

वोट एक खिलौना बना..
बदल गया जिसे भी चुना 
गरीबी मजबूरी नियति है 
गरीब के हिस्से गुलामी लिखी है. 


मज़दूर पसीना बेच रहा,
किसान आँसू उगाता है,
मुनाफ़ा मुट्ठी भर लोगों का
हर मौसम में बढ़ जाता है।

आजादी आई थी सबके लिए,
पर सब तक क्यों न पहुँची?
क्यों शिक्षा, रोटी, इलाज की
कीमत है आज भी है ऊँची?

संविधान की किताब खुली,
हर पन्ना बराबरी का हक बोले,
पर गलियों में सच्चाई देखो,
न्याय आज भी मौन डोले।

चुनावों की रंगीन सभाएँ,
नारों की भारी बारिश है,
वोट के बाद वही सन्नाटा,
जनता फिर भी खामोश है।

पर सुनो! इतिहास गवाही दे,
जब-जब जनता जागी है,
तब-तब सत्ता की दीवारों में
दरारें खुद-ब-खुद आ गई हैं।

आजादी कोई दान नहीं,
यह रोज़-रोज़ की लड़ाई है,
हक़, सम्मान और हिस्सेदारी—
यही इसकी सच्चाई है।

तो आओ फिर से कसम लें हम,
न डर से, न सौदेबाज़ी से,
आजादी का पूरा हिसाब
लेंगे मेहनत और साझेदारी से।

यह जनगीत है, आवाज़ बने,
हर गली, हर चौपाल में,
आजादी तब पूरी होगी
जब सबको इंसाफ़ मिले ...!!!

Jpsb blog 

कविता की विवेचना:

आजादी का हिसाब/Aajadi ka hisab कविता एक आम भारतीय के ख्वाब का टूटना है जो आजादी के के बाद के लिये उसने देखे थे. 

बड़े जोश उत्साह से शहादत दी थी शहीदों ने, इस उम्मीदों में कि 
हमारे भायी देशवासी आजादी का सुख भागेंगे, उन्हें क्या पता था 
यह आजादी एक लीलामी है, जो अंग्रेजो ने पूंजीवाद से समझोता कर उन्हें सौंप दी. 

अंग्रेजो से समझोता होते ही दो समुदायों के नेताओं ने दंगे भडकाय
लाखों लोग मरवाये ,देश के दो हिस्सों में बांट अपना स्वार्थ सिद्ध किया और राजा बन बैठे, भोली जनता ठगी सी रह गयी, लोगों के सदियों पुराने घर बार छुटे करोड़ पति रोड़ पति बन गया. 

मगर इन राजाओं का क्या बिगड़ा वे पहिले भी ऐश करते थे अब तो राजा बन गये, इस देश के भाग्य विधाता, गरीब से रहा वही अंग्रेजो वाला नाता, पहिले भी पुलिस के द्वारा कुचला जाता था आज भी कुचला जाता है, पहिले भी शिक्षा, इलाज से रोजगार से वंचित थे, आज भी वंचित हैं. 

क्या आजादी के पहले का एक भी भगत सिंह, सुभाषचंद्र, चंद्र शेखर आज़ाद नहीं बचा जो देश के हर नागरिक के बारे में सोचता.
हमारे साथ आजाद हुये देश तरक्की में हमसे सौ साल आगे निकल गये, चीन उसका उदाहरण है. 

हमारे यहां चंद पूँजीपतियों ने देश की ज्यादातर संपत्ति पर कब्जा अपने राजनीतिक मित्रों के सहयोग से कर लिया और देश उनकी मर्जी से चल रहा है, लोकतंत्र दिखाने के लिये बचा है. 

"आज़ादी का हिसाब" कविता इस देश की 80% आबादी जो सरकारी राशन पर निर्भर लाचार बेबस है की दुरदशा ब्यान करती है, कोई सुनने वाला नहीं, अब कब कोई भगत सिंह,चंद्र शेखर, सुभाष चंद्र बोस आयेगा..या फिर श्री राम, श्री कृष्ण, श्री बजरंग बली आयेंगे असली आजादी दिलाएंगे. 

...इति..

Jpsb blog
 www.jpsb.blogspot.com 
Author is a member of SWA Mumbai.
 Copyright of poem is reserved 




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