Thursday, September 7, 2023

ईश्वर ही पक्का पता (Ishwar hi pakka pata)

Ishwar      - आध्यात्मिक कविता           
Ishwar pakka pata
Ishwar pakka pata
Image from:pexels.com 


हे प्रभु..
तेरे हुक्म से आया..
तेरे हुक्म से जाना है..
तुमसे रिश्ता..
सदियों पुराना है..
तेरे चरणों में ही मेरा.. 
पक्का पता ठिकाना है..

मुझे नहीं मालूम..
क्या है आत्मा का किस्सा..
मगर एहसास कि..
मैं हूँ  तुम्हारा हिस्सा ..
तेरे हुक्म बगैर संसार में..
पत्ता भी नहीं हिलता..
प्रकृति जीव जंतू..
पेड़ पौधे फल फूल..
तेरी ईच्छा से ही खिलता..

भाग्य में..
तुमने जो लिखा है ..
वही जीवन में है मिलता..
लगन मेहनत प्रेरणा..
तेरा ही आशिष है..
सफ़लता..
तेरी दी बक्षीस है..
तो इतराना कैसा..
इंशा ने बनाया पैसा..

पैसे की खनक..
जिंदगी की चमक..
ये चंद दिनों का..
मेला है..
तेरे बनाये भाग्य के..
खेल में..
इंसान खेला है..
संसार रूपी मंच पर..
अभिनय जारी है..
जिसका रोल खत्म..
उसकी जाने की बारी है..

मंदिर मस्जिद तपस्या..
क्या है इंसान के.. 
जीवन की समस्या..
तेरा नाम जप के..
तुझे पाना है..
मुझे पता है..
तुझ मैं हूँ समाहित..
एक तू ही प्रभु..
मेरा पक्का पता..
और ठिकाना है..

तेरी लीला..
समझ से बाहर है कि..
खुद से दूर क्यों किया ..
मेरे अन्दर जलता है..
तेरी तपस्या का दिया..
तुम से बिछडे हैं..
तुम में समाना है..
क्यों कि प्रभु..
तू ही मेरा..
पक्का पता..
और ठिकाना है..!!

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कविता की विवेचना: 

ईश्वर ही पक्का पता/Ishwar hi pakka pata कविता ईश्वर के अपने अन्दर होने के एहसास की परिणिति है. 

श्री कृष्ण भगवान ने स्वयं कहा कि वो हर जीव में मौजूद हैं, जब खुद से पूछते हैं कि कौन हू मैं तो यही आवाज आती है कि तू ईश्वर का ही एक हिस्सा है.

हम मोह माया और अपनी खुद्दारी की एक अलग दुनिया बना लेते हैं और दौलत पैसे के पीछे भागते नज़रं
आते हैं. जब कि पता है कि साथ कुछ नहीं जाना है. 

धन दौलत सफलता ईश्वर का आशिष और बक्षीस है, 
इसमे इतराना कैसा सब कुछ ईश्वर ही है, इंसान ने बनाया पैसा. 

"ईश्वर पक्का पता "एक आत्मा की आवाज़ है और यही सत्य है, सत्य था और सत्य रहेगा, ईश्वर का वास हर इंशा मे है अह्सास करें और अपने प्रभु पर सदेव विश्वाश करें. 

...इति..
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Saturday, August 5, 2023

अपने का सपना (Apne ka sapna)

Sapna  - समाजिक बंधन-कविता     
Apne ka sapna
Apne ka sapna
Image from: pexels.com 


रिश्तों में..
कोई तो हो अपना..
रहा जिंदगी भर..
यही एक सपना..
अपने से पाने को..
मन तरस गया..
नैनो से नीर..
बरस बरस गया..
तलाश अभी तक..
जारी है..
शायद मेरी ही..
मती मारी है..

काश कोई रिश्ता..
अपना होता..
मैं चैन की नींद सोता..
मेरा जन्म..
अधूरा सा लगाता है..
अपने किसी को..
पा लेता..
तो जन्म सफल होता..
अपने के लिये..
दिल मे जगह..
अभी तक खाली है..
जहां मैंने..
गमी बसा ली है..

मन उदास है..
कभी लगता है..
कोई दिल के..
बहुत पास है..
कह दू उसे..
दिल की कुछ बातें..
नहीं कटती अकेले..
विरान रातें..
आंखे बोझिल हैं..
कोई नहीं दिखता..
अपनी परसाई के अलावा..
अपने कहीं ओझल हैं..

क्या यह जिन्दगी..
एक धोखा है..
या अपनों की..
तलाश का..
एक और मोका है..
सारी उम्र बीत गई..
कई रातें आई..
और रीत गई..
अभी तक ना मिला..
कोई अपनों में अपना..
क्या यू ही..
मर जाऊँगा..
लिये अधूरा सपना..

एक दिन..
भगवन सपने में आये ..
गीता के बचन..
याद दिलाये..
तुम हो मुझमे समाये..
तुम आत्मा हो..
एक किस्सा हो..
जन्मों जन्मों तक..
मेरा ही हिस्सा हो..
रिश्ते नाते..
मैंने ही बनाये और..
कभी जोड़े कभी तोड़े हैं..
जो तुम्हें..
अपने से लगते..
अपने थोडे हैं..

अपने अपने से..
लगते जो..
तुम्हारे मन को..
धोखा है वहम है..
तुम एक सच्ची आत्मा हो..
यही बस अहम है..
अकेले आये थे..
अकेले ही जाना है..
फिर क्यों..
तरस तरस..
अपनों को पाना है..
महाभारत में..
अपने अपनों से..
लड मरे..
जब कि स्वयं ईश्वर थे..
 सामने खडे..

अच्छा ही है..
दुनिया में कोई..
अपना नहीं..
अपना सा रिश्ता..
खो गया कहीं..
अपने के..
मिल जाने से..
मोह बढ़ता..
जीने की चाह जगती..
असानी से ना मरता..
विरह अग्नि..
ना होती बाकी..
ईश्वर की..
याद ना आती..
अपने के अभाव में..
एक आस है..
ईश्वर दिल के ..
बहुत पास है..

तेरे आँखों में..
जो सपने हैं..
प्रभु सदा से हैं..
और थे..
वही तेरे अपने हैं ..
उन्हीं ने तुम्हें..
इस धरा पर भेजा ..
निकाल अपना कलेजा ..
क्यों अपने की..
तलाश में..
व्यर्थ समय गवाता है..
तेरा अपना ही है..
जो यह विधाता है..
विधाता की प्रीत में ..
रम जा..
ईश्वर का स्नेह प्यार..
सदा पा..!!


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कविता की विवेचना: 

अपने का सपना/Apne ka sapna कविता आज के व्यवसायिक युग में अपनत्व कहीं खो  गया है, सब कुछ पैसा ही हो गया है. जैसे महौल को इंगित करती है. 

कोई रिश्ता अपना ना रहा, लहू, लहू को नहीं पहचानता पैसा ना हो तो कोई आपको नहीं जानता.

रिश्तों का स्वर्ग सा आनंद कहीं खो गया है, अब सोशल मीडिया अपना हो गया है, सब अपने आप आप मे गुम हैं. 

ऐसे में रिश्तों की क्या जरूरत है, अपना सा दिखता कोई नहीं सब अकेले अकेले निकल पडे, इसलिये  अपने की खोज छोड़ो भगवान से नाता जोड़ों वही हमारे अपने हैं. 

आखिर भगवान के पास ही जाना है, वो ही पक्का ठिकाना है, वही से आये थे ईश्वर ने अपने रिश्ते निभाए हैं. 

इतिहास गवाह है महाभारत में अपने ही अपनों से लड मरे, भाई ने भाई को मारा, पितामह भी अपने प्रिय अर्जुन के हाथों मरे, वहाँ तो श्री कृष्ण भगवान स्वयं मौजूद थे.उन्होंने भी होनी को होने दिया ताकि संदेश जाये यहां कोई नहीं किसी का अपना, अपना बनाना है एक सपना और सपने कभी सत्य नहीं होते. 

"अपने का सपना " कविता निहित करती है, अकेले आये थे अकेले ही जाना है, भगवान के पास ही तुम्हारा ठिकाना है, किसी से कोई आस मत रखो, भगवान पर विश्वास रखो और उनको बना लो अपना, जबकि वो तो पहिले से ही तुम्हारे हैं, थे और अनंत काल तक रहेंगे, तुम खुद समझो वो तुमसे नहीं कहेंगे. 

तो ईश्वर के हो जाओ और जीवन आनंद पाओ. 

...इति...

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Saturday, July 8, 2023

आँचल सी रहो (Aanchal si raho)

Aanchal  प्रेम कविता              
Aanchal si raho
Aanchal si raho
Image from:pexels.com 


तुम मेरे ख्यालों में..
नदी सी बहों ..
हवा के झोंकों से..
कुछ कुछ कहो..
मेरे दिल में..
आँचल सी रहो..

मचलता है मन..
रूबरू होने को..
सपनों में दिखती हो..
ओझाल होने को..
दिल करता है..
आंखे बंद कर..
तेरा दीदार करू..
बाते हजार करू..

कल्पना के घोड़े..
दौड़ता हूँ..
कभी बहुत पास..
कभी दूर हो जाता हूँ..
नजदीकियां भाती हैं..
तेरी याद..
चलचित्र सी आती है..
शकुन पहुंचाती है ..

तुम पक्षी बन..
कहीं उड़ चली..
ना भायी मेरी गली..
उजड़ गया..
मेरा आशियाना..
रुसवाई था..
सिर्फ एक बहाना..
तुझे भाया..
परवाना बेगाना..

कैसे रास्ता रोक लू..
कैसे तुझे टोक दू..
अधिकार की डोर को..
तूने ही तो तोड़ा है..
मुझे अंजान..
मंजिल की ओर..
मोड़ा है..
कौन आया..
हमारे बीच रोड़ा है..

कचरें सामान सी..
तेरी यादे..
क्यों ढोता हूँ..
फेक दू कूड़ेदान में..
मगर फिर..
भावुक होता हूँ..
किसी पुरानी..
दिल की अलमारी में..
यादों को संजोता हूँ..

किसी अनजान..
मोड पर..
सारे बंधन तोड़ कर..
खडा हूँ अकेला..
सूना सूना लगे..
इस दुनिया का मेला..
इस मेले में..
खो जाऊँगा..
फिर भीड़ का..
हिस्सा हो जाऊँगा..
भुला नहीं तुझे..
मगर भुलायुंगा ..!!

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कविता की विवेचना: आंचल सी रहो/ Aanchal si raho कविता किसी चाहने वाले का दिल का गुबार है. 

सच्ची चाहत आज कल कहाँ रही, मगर अगर कोई धोखे से सच्चा चाहने वाला मिल गया तो उसकी कदर नहीं की ज़माने ने. उसे ना समझ ही समझा आज के तथाकथित समझदारी ज़माने ने. 

सच्चे चाहने वाले को अक्सर धोखा ही मिला है, इस भौतिक वादी युग में चाहत की कीमत कहाँ,जमाना
पूछता है, चाहत तो तेरी ठीक है पर दौलत कहाँ. 

प्यार काफी नहीं आज के जमाने में प्यार के साथ जरूरी है पैसा तो निभ ही जागेगा,तू हो चाहे जैसा. 
पैसे की खनक बेवफ़ा बना देती है. 

कसूर उनका नहीं है ज़माने का जिसने प्यार को पैसे से तोला और दौलत को प्यार का मापदंड बना दिया. 

"आँचल सी रहो " कविता में लाख ठुकराए जाने के बाद भी प्रेमी प्रेमिका की यादें संजोये रखना चाहता है, चाहते हुये भी नफरत नहीं कर पाता, और दिल को एक कोना अपने प्यार को दे देता है. 

... इति...

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Thursday, July 6, 2023

अनाड़ी (Anadi)

अनाड़ी       - प्रेम त्रिकोण-बेवफाई-कविता 
Anadi
Anadi
Image from : pexels.com 



सीख लिया है मैंने..
आंसुओ को पीना..
ग़म में..
सिसकते सिसकते जीना..
अच्छा हुआ तू..
बेगानी हुयी..
यही खत्म कहानी हुयी..

खत्म हुआ सिलसिला..
रिश्ता निभाने का..
ढकोसला था प्यार तेरा..
बोझ था ज़माने का..
जीते जी टूट गया बंधन..
मर कर टूटना ही था..
सात पल ना निभे..
सवाल कहाँ..
जन्मों जन्मों निभाने का..

जन्म से पहले..
तुम कहां थे..
और मैं था कहाँ..
और मरने के बाद..
जाओगे कहाँ..
जब कुछ पता नहीं..
तो ग़म किस बात का..
अकेले ही..
इस दुनिया में है..
आना जाना..
कभी पिछले..
जन्म के रिश्ते को..
किसी ने ना पहचाना..

अच्छा हुआ मैंने..
ना ली साँसे उधार तेरी..
हिम्मत ना थी..
इन्हें लौटाने की..
मेरी सांसों का..
एहसास होगा तुम्हें भी..
रख लो..
अब जरूरत नहीं..
इन्हें लौटाने की..
मेरी जिंदादिली..
याद दिलाती रहेगी..

नजरों में बसाया था..
"तुम्हें..."
अब किरकिरी सा..
चुभता है..
कोई दवा नहीं मिल रही..
इसे मिटाने की...
तुम मेरी नजरों से ..
हट जाओ दूर..
मुझे आखों में..
जहान बसाना है..
जरूरत नहीं अब..
तेरी तस्वीर बसाने की..

मेरी धडकने ..
तुम साथ ले गये..
"बेधडक.."
नहीं समझी.. 
औपचारिकता भी ..
इन्हें वापिस लौटाने की..
छल के हर लिया..
दिल विल मन मेरा..
कितना स्वार्थी है..
स्वभाव तेरा..

खरीदी करने..
निकले तुम ..
थोडा सा दिल..
थोडा सा मन..
थोडा सा यार..
थोडा सा प्यार..
सब लिया उधार..
था सब अनमोल..
मगर किया तूने..
तोल मोल..
नापा, नफा नुकसान ..
सद्बुद्धि दे तुम्हें भगवान..

अचानक तुझे..
प्यार के बाजार में..
सौदा नया जचा ..
पुराने में अब..
इंट्रेस्ट ना बचा..
मैं सौदा बन..
अवाक रह गया..
और तुम बने..
चतुर व्यापारी..
सारी दिल की दौलत..
तेरे सामने हारी..
सच है दुनिया वालों..
मैं निकला अनाड़ी..!!

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कविता की विवेचना: 

अनाड़ी/Anadi कविता एक सच्चे प्रेमी बनाम एक व्यापारिक दृष्टी कोण वाली तथाकथित आधुनिक प्रेमिका की कहानी है.

एक तरफ प्रेमी अपना सर्व अपने प्यार के लिये लुटाने को तैयार है और प्रेमिका इसे एक अच्छे या बुरे सौदे के रूप में जांच परख रही है, साथ ही इससे और बेहतर सौदे की भी उसे तलाश है. 

जब तक मन चाहा सौदा नहीं मिलता, पुराने को और जांचा परखा जा रहा है, और किसी तरह काम चलाया जा रहा है. 

जैसे ही किसी सलाहाकार ने सलाह दी, नया सौदा समझाया, पुराने को तोड़ने में पल भी ना लगाया, और बेरहमी से तोड़ दिया रिश्ता पुराना, दिल पर क्या 
बितेगी हाल भी ना जाना. नये सौदे के साथ हो लिये.

"अनाड़ी " कविता आज के भौतिक वाद ज़माने को रेखांकित करती है  जहा भावनाऔ का कोई मोल नहीं 
कोई त्याग कुर्बानी अब कोई प्यार में नहीं करता, हर कोई दौलत और भौतिक सुखों के लिये मरता, उसके लिये चाहे मर्यादित सीमा लाघनी पडे. 
किसी से दिल ना लगाना, कब हो जाये बेगाना..

...इति...

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