Sunday, December 28, 2025

धन धन गुरू गोबिंद सिंह (Dhan Dhan Guru Gobind Singh)

Guru Gobind Singh -वीर रस कविता 
Dhan Dhan Guru Gobind Singh
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Dhan Dhan Guru Gobind Singh 


धन धन गुरु गोविंद सिंह,
धर्म की खातिर
वार दिया परिवार,
मात-पिता और पुत्र चार।

बाल दिवस बन गया ..
बड़ा पर्व शहीदी...
 मांगी थी जब धर्म आज़ादी,
नन्हे तन, पर साहस विशाल,
जिनसे काँप उठा  काल

चार साहिबज़ादे अमर कहानी,
धर्म की मशाल, शौर्य की निशानी,
खेल-खेल में दे दी कुर्बानी 
सर उठा आजादी की ठानी 

बाबा अजीत, जुझार—रण में लड़े,
हँसते-हँसते दुश्मन से  जुझ पड़े,
बाबा ज़ोरावर, फतेह—बच्चे थे,
पर इरादे और धर्म के- पके थे, 

दीवारों में चिनवा लिया,
पर विश्वास न छोड़ा,
“वाहेगुरु” का नाम लिया,
वज़ीरखान का दंभ तोड़ा, 
इतिहास में हीरे सा जोड़ा।

 उनकी कुर्बानी की याद ,
बाल दिवस मना रहें आज, 
 बचपन उम्र नहीं पहचान,
साहस, सत्य और बलिदान,

विशाल अकाल थे उन 
उन बाल हृदयों के संकल्प,
धर्म, न्याय और मानवता थे 
उनके जीवन के आदर्श।

आओ प्रण लें इस पावन दिन,
साहिबज़ादों की राह चलें,
भय से नहीं, निडर जियें,
अन्याय के आगे अडिग रहें।

मोती राम मेहरा जी..
और याद आता उनका परिवार, 
जो उनका पिलाया दुध 
अमृत हो गया
शहीद हुआ उनका सारा परिवार  

दीवान टोडर मल ने 
बिछायी धरती पर सोने की मोहरे 
धरती बना दी अनमोल 
साहिब जादौ के आगे..
दोलत का क्या मोल .

धन धन गुरु गोविंद सिंह,
धन धन चारों लाल,
माता गुज़री का हृदय विशाल 
जिनकी शहादत से रोशन है,
भारत में सत्य और धर्म की मशाल..


कविता की विवेचना:

धन धन गुरु गोविंद सिंह/ Dhan dhan Guru Gobind singh कविता गुरु जी और उनके परिवार के चरणों में समर्पित है. 

ये अलौकिक शहादत है जो धर्म और सत्य के लिये दी गई, उनकी लड़ाई किसी राज्य धन दौलत के लिए नहीं थी, इस धरती पर धर्म और सत्य की विजय के लिये थी.

 धर्म चाहे किसका भी हो थोपा नहीं जा सकता और सत्य जो अटल है, कभी मिटाया नहीं जा सकता. 

परमात्मा एक है और वो सबका है, किसी एक का नहीं चाहे उसे किसी रूप में माना जाये यही अटल सत्य है. 

औरंगजेब इस सत्य को भूल खुद को ईश्वर की सता से ऊपर मान 
बैठा और लोगों पर जुल्म करने लगा ,जो धर्म वो कहे मानों  गुरु जी 
की उनकी लडाई इसी बात को लेकर थी.

 जो पाँचवें गुरू श्री अर्जुन देव जी की शहादत से शुरू हुयी और गुरू तेग बहादुर जी, गुरु जी के चार पुत्र चार साहिब जादे श्री बाबा अजीत सिंह, श्री बाबा जुझार सिंह, श्री बाबा जोरावर सिंह, श्री बाबा फतेह सिंह और गुरु जी की माता श्री गुजर कौर जी की शहीदी के बाद भी जारी रही रही. 

श्री गुरू तेग बहादुर जी साथ उनके अनुयायी भाई मती दास(आरी से काटा गया), भाई सती दास(रुई में लपेट कर जिन्दा जला दिया गया),भाई दयाळा जी(पानी में जिंदा उबाल दिया गया) को शहीद किया गया.

गुरू गोविंद सिंह जी को उनके 40 सिखों के साथ मुग़लों की दस लाख सेना ने घेर लिया गया, गुरू जी ने पाँच पांच करके सिखों को उस युद्ध के में किले से भेजा उनमें उनके दो बड़े साहिब जादे बाबा अजीत सिंह जी और बाबा जुझार सिंह भी थे, दस लाख के सेना से 40 सिख योद्धा लडे ,सवा लाख से एक लडा.

उनके छोटे दो साहिब जादे बाबा फतेह सिंह और बाबा जोरावर सिंह और गुरु जी की माता जी माता गुज़र कौर उनसे सिरसा नदी पार करते समय बाढ़ के कारण उनसे बिसर गये, जिन्हें गुरू ज़ी का रसोइया गांगुराम अपने घर ले गया मगर उसने कुछ धन के लालच में मुगल सेना से गिरफ्तार करवा दिया, जिन्हें दिवार में जिन्दा चिनवा दिया गया माता गुज़री जी की भी क़ैद मे शहादत हो गई. 

कैद के दौरान साहिब जादौ को श्री मोती राम मेहरा जी ने चोरी से दूध पिलाया जो मुगलों को पता चल गया मोती राम मेहरा जी और उनके सारे परिवार को कोल्हू मे पीस कर शहीद कर दिया गया. 

साहिब जादौ और माता गुज़री जी के अंतिम संस्कार से रोका गया, संस्कार की जमीन के लिये दीवान टोडर मल जी ने खड़ी सोने की मोहरे ज़मीन पर बिछायी तब संस्कार की जमीन दी गई. 

बाद में धर्म के लिये असंख्य सिख शहीद किये गये, भाई तारू सिंह जी ने अपनी खोपड़ी उतरवा ली पर धर्म नहीं बदला ,श्री बन्दा सिंह बहादुर और उनके 70 सिखों को शहीद किया गया .

और उनके पांच साल के पुत्र श्री अजय सिंह जी को बन्दा सिंह बहादुर जी के सामने श्री अजय सिंह जी का दिल निकाल कर श्री बन्दा सिंह बहादुर जी के मुह में दिया गया और शहीद किया गया बाद मे बन्दा जी बहादुर जी को बहुत ज्यादा यातना देने के बाद शहीद किया गया. 

"धन धन गुरु गोविंद सिंह " कविता में श्री गुरू गोविंद सिंह जी को धर्म और सत्य के लिये अपने परिवार को शहीदी के लिये कोटी कोटी नमन की कोशिश है, जो अलौकिक है जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता फिर भी कोशिश है. 

कृपया इस शहादत को अपने बच्चों को बताये और उन्हें सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे. 

...इति 
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Wednesday, December 17, 2025

आजादी का हिसाब (Aajadi ka Hisab)



आजादी का हिसाब - देश भक्ती कविता 
Aajadi ka hisab
Aajadi ka hisab
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आओ साथियो, बैठो ज़रा,
आजादी का हिसाब करें,
लाल किले की प्राचीरों से
निकले सपनों का हिसाब करें।

किसको मिली आज़ादी,
क्या पेट भर सकी भूखों का?
क्या खेतों तक पहुँची खुशहाली,
या रह गई चंद अमीरों की शोभा?

आज भी गरीब भूखा है, 
बच्चों का स्कूल नहीं..
खेतों में पसरा सूखा है..
दवा कहाँ दवाखाने ने लूटा है..

फांसी के फंदों से झूल गए जो, 
उन शहीदों ने सपने बोए थे,
उनकी कुर्बानी की कीमत में
 हम सब भी रोयें थे..

अंग्रेज़ गए, हुक्म बदला,
पर हुक्म चलाने वाले वही,
कल गोरे थे, आज देसी हैं,
पर ज़ंजीरें ढोने वाले वही।

क्या आजादी थी लीलामी ,
पूँजीवाद ने जो हथिया ली, 
लोकतंत्र का ले कर मंत्र..
गरीब को एक वोट थमा दी.

वोट एक खिलौना बना..
बदल गया जिसे भी चुना 
गरीबी मजबूरी नियति है 
गरीब के हिस्से गुलामी लिखी है. 


मज़दूर पसीना बेच रहा,
किसान आँसू उगाता है,
मुनाफ़ा मुट्ठी भर लोगों का
हर मौसम में बढ़ जाता है।

आजादी आई थी सबके लिए,
पर सब तक क्यों न पहुँची?
क्यों शिक्षा, रोटी, इलाज की
कीमत है आज भी है ऊँची?

संविधान की किताब खुली,
हर पन्ना बराबरी का हक बोले,
पर गलियों में सच्चाई देखो,
न्याय आज भी मौन डोले।

चुनावों की रंगीन सभाएँ,
नारों की भारी बारिश है,
वोट के बाद वही सन्नाटा,
जनता फिर भी खामोश है।

पर सुनो! इतिहास गवाही दे,
जब-जब जनता जागी है,
तब-तब सत्ता की दीवारों में
दरारें खुद-ब-खुद आ गई हैं।

आजादी कोई दान नहीं,
यह रोज़-रोज़ की लड़ाई है,
हक़, सम्मान और हिस्सेदारी—
यही इसकी सच्चाई है।

तो आओ फिर से कसम लें हम,
न डर से, न सौदेबाज़ी से,
आजादी का पूरा हिसाब
लेंगे मेहनत और साझेदारी से।

यह जनगीत है, आवाज़ बने,
हर गली, हर चौपाल में,
आजादी तब पूरी होगी
जब सबको इंसाफ़ मिले ...!!!

Jpsb blog 

कविता की विवेचना:

आजादी का हिसाब/Aajadi ka hisab कविता एक आम भारतीय के ख्वाब का टूटना है जो आजादी के के बाद के लिये उसने देखे थे. 

बड़े जोश उत्साह से शहादत दी थी शहीदों ने, इस उम्मीदों में कि 
हमारे भायी देशवासी आजादी का सुख भागेंगे, उन्हें क्या पता था 
यह आजादी एक लीलामी है, जो अंग्रेजो ने पूंजीवाद से समझोता कर उन्हें सौंप दी. 

अंग्रेजो से समझोता होते ही दो समुदायों के नेताओं ने दंगे भडकाय
लाखों लोग मरवाये ,देश के दो हिस्सों में बांट अपना स्वार्थ सिद्ध किया और राजा बन बैठे, भोली जनता ठगी सी रह गयी, लोगों के सदियों पुराने घर बार छुटे करोड़ पति रोड़ पति बन गया. 

मगर इन राजाओं का क्या बिगड़ा वे पहिले भी ऐश करते थे अब तो राजा बन गये, इस देश के भाग्य विधाता, गरीब से रहा वही अंग्रेजो वाला नाता, पहिले भी पुलिस के द्वारा कुचला जाता था आज भी कुचला जाता है, पहिले भी शिक्षा, इलाज से रोजगार से वंचित थे, आज भी वंचित हैं. 

क्या आजादी के पहले का एक भी भगत सिंह, सुभाषचंद्र, चंद्र शेखर आज़ाद नहीं बचा जो देश के हर नागरिक के बारे में सोचता.
हमारे साथ आजाद हुये देश तरक्की में हमसे सौ साल आगे निकल गये, चीन उसका उदाहरण है. 

हमारे यहां चंद पूँजीपतियों ने देश की ज्यादातर संपत्ति पर कब्जा अपने राजनीतिक मित्रों के सहयोग से कर लिया और देश उनकी मर्जी से चल रहा है, लोकतंत्र दिखाने के लिये बचा है. 

"आज़ादी का हिसाब" कविता इस देश की 80% आबादी जो सरकारी राशन पर निर्भर लाचार बेबस है की दुरदशा ब्यान करती है, कोई सुनने वाला नहीं, अब कब कोई भगत सिंह,चंद्र शेखर, सुभाष चंद्र बोस आयेगा..या फिर श्री राम, श्री कृष्ण, श्री बजरंग बली आयेंगे असली आजादी दिलाएंगे. 

...इति..

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